भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जो पर्दे पर सिर्फ अभिनय नहीं करते, बल्कि दर्शकों के साथ एक भावनात्मक रिश्ता जोड़ लेते हैं। सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) एक ऐसा ही नाम थे, जिन्हें आज उनके 40वें जन्मदिन पर पूरा देश याद कर रहा है। इंजीनियरिंग की किताबों से निकलकर अभिनय की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने वाले सुशांत ने कम समय में ऐसे किरदार निभाए, जो आज भी भारतीय सिनेमा की अमूल्य धरोहर हैं।
टीवी से बॉलीवुड तक का असाधारण सफर सुशांत सिंह राजपूत का सफर ‘पवित्र रिश्ता’ के मानव के रूप में शुरू हुआ था, लेकिन उनकी आंखों में बड़े पर्दे के सपने थे। उन्होंने साबित किया कि अगर प्रतिभा और समर्पण हो, तो बाहरी व्यक्ति भी बॉलीवुड में अपनी जगह बना सकता है। उनकी पहली फिल्म ‘काय पो छे!’ से लेकर आखिरी फिल्म ‘दिल बेचारा’ तक, उन्होंने हर प्रोजेक्ट में अपनी एक अलग छाप छोड़ी।
क्रिकेट की पिच पर ‘धोनी’ बनकर जीता सबका दिल सुशांत के करियर का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव नीरज पांडे की फिल्म ‘एमएस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी’ थी। यह कहना गलत नहीं होगा कि उन्होंने इस फिल्म में महेंद्र सिंह धोनी का किरदार निभाया नहीं, बल्कि उसे जिया था। धोनी के ट्रेडमार्क ‘हेलीकॉप्टर शॉट’ को सीखने के लिए की गई उनकी महीनों की मेहनत पर्दे पर साफ दिखी। इस फिल्म ने उन्हें रातों-रात सुपरस्टार बना दिया और हर भारतीय के घर का हिस्सा बना दिया।

ब्योमकेश बख्शी और प्रयोगधर्मी सिनेमा
एक तरफ जहाँ सुशांत कमर्शियल फिल्में कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी’ जैसी फिल्मों के जरिए अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दिया। 1940 के दशक के कलकत्ता की पृष्ठभूमि में उन्होंने एक युवा जासूस की घबराहट, उसकी बुद्धिमत्ता और उसकी कमजोरियों को बेहद बारीकी से पर्दे पर उतारा। यह उनकी प्रयोगधर्मी सोच का ही नतीजा था कि उन्होंने लीक से हटकर किरदार चुने।
सुशांत सिंह राजपूत के करियर की कुछ बेहतरीन फिल्में:
| फिल्म | किरदार का नाम | विशेषता |
| काय पो छे! | ईशान भट्ट | दोस्ती और क्रिकेट का जुनून |
| सोनचिरैया | लखना | चंबल के बागी की अंतरात्मा की लड़ाई |
| छिछोरे | अनिरुद्ध (अनी) | हार और जीत के बीच जीवन का सबक |
| केदारनाथ | मंसूर | सादगी और निस्वार्थ प्रेम की मिसाल |
सोनचिरैया: अभिनय की पराकाष्ठा अभिषेक चौबे की फिल्म ‘सोनचिरैया’ में सुशांत ने ‘लखना’ का किरदार निभाया। चंबल के डकैतों पर आधारित इस फिल्म में सुशांत का ट्रांसफॉर्मेशन हैरान कर देने वाला था। किरदार की गहराई को समझने के लिए वह कई दिनों तक उसी परिवेश में रहे। भले ही यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर वैसी सफलता न पा सकी, लेकिन समीक्षकों की नजर में यह सुशांत के करियर का सबसे परिपक्व प्रदर्शन था।
छिछोरे: युवाओं के लिए एक प्रेरणा ‘छिछोरे’ सुशांत की उन फिल्मों में से एक है जो हमेशा प्रासंगिक रहेगी। एक ऐसे पिता का किरदार जो अपने बेटे को असफलता से लड़ना सिखाता है, सुशांत ने बेहद संजीदगी से निभाया। कॉलेज के दिनों की मस्ती और अधेड़ उम्र की जिम्मेदारियों के बीच का संतुलन उनकी वर्सेटिलिटी का प्रमाण था।
दिल बेचारा: एक अधूरा लेकिन खूबसूरत अंत सुशांत की आखिरी फिल्म ‘दिल बेचारा’ ने हर प्रशंसक की आंखों को नम कर दिया। मैनी के किरदार में उनकी मुस्कुराहट और जीवन के प्रति उनका नजरिया उनके असल व्यक्तित्व की झलक देता था। फिल्म का संवाद “जन्म कब लेना है और मरना कब है, यह हम डिसाइड नहीं कर सकते, पर कैसे जीना है वो हम डिसाइड कर सकते हैं” आज भी उनके प्रशंसकों के कानों में गूंजता है।

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