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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, ओबीसी क्रीमी लेयर तय करने में माता-पिता की सैलरी अकेला आधार नहीं

OBC Creamy Layer Exclusion Criteria: सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने ओबीसी क्रीमी लेयर के निर्धारण को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने स्पष्ट किया कि किसी अभ्यर्थी को क्रीमी लेयर में रखने या बाहर करने का फैसला केवल माता-पिता या अभिभावकों की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता; इसके लिए माता-पिता के पद, सामाजिक स्थिति और 1993 के दिशानिर्देशों में निर्धारित अन्य मानदंडों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है, क्योंकि केवल आय पर आधारित निर्धारण से समानता के सिद्धांत का उल्लंघन होता है और यह आरक्षण की मूल भावना के विपरीत है।

OBC Creamy Layer Exclusion Criteria: सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के क्रीमी लेयर निर्धारण को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उम्मीदवार के क्रीमी लेयर में आने या न आने का फैसला केवल माता-पिता की आय (सैलरी) के आधार पर नहीं किया जा सकता। माता-पिता के पद, सामाजिक स्थिति और सरकारी दिशानिर्देशों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

फैसले की मुख्य बातें

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने केंद्र सरकार की कई अपीलों को खारिज कर दिया। ये अपीलें उन हाईकोर्ट के फैसलों के खिलाफ थीं, जिनमें यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा पास करने वाले कुछ ओबीसी उम्मीदवारों को आरक्षण का लाभ देने का आदेश दिया गया था। सरकार ने इन उम्मीदवारों के माता-पिता की सैलरी को आधार बनाकर उन्हें क्रीमी लेयर में डाल दिया था, जिससे वे आरक्षण से वंचित हो गए। इनमें ज्यादातर मामलों में माता-पिता सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू), बैंकों या समान संस्थानों में कार्यरत थे।

अदालत ने कहा कि 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम (ओएम) के अनुसार क्रीमी लेयर का निर्धारण मुख्य रूप से माता-पिता के पद (जैसे ग्रुप ए/बी अधिकारी) पर आधारित है। सैलरी और कृषि आय को इसमें शामिल नहीं किया जाता। 2004 के एक स्पष्टीकरण पत्र को मुख्य नीति पर हावी नहीं माना जा सकता।

भेदभाव पर सख्त टिप्पणी

पीठ ने केंद्र के तर्क को खारिज करते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को पद के आधार पर छूट मिलती है, लेकिन पीएसयू या निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों को केवल सैलरी के आधार पर आरक्षण से बाहर करना असंवैधानिक है। यह समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन है और “हॉस्टाइल डिस्क्रिमिनेशन” के समान है।

उम्मीदवारों को बड़ी राहत

सुप्रीम कोर्ट ने इन यूपीएससी उम्मीदवारों को बड़ी राहत देते हुए सरकार को निर्देश दिया है कि वह 6 महीने के भीतर उनके दावों पर दोबारा विचार करे। यदि आवश्यक हो, तो इन उम्मीदवारों को नियुक्ति के लिए अलग से पद सृजित किए जाएं।

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