सितारे पैदा होते हैं, बनाए नहीं जाते – अभिनेत्री श्यामा !

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Death Anniversary Of Actress Shyama:वो कहती थीं सितारे पैदा होते हैं, बनाए नहीं जाते।
उनका कॉन्फिडेंस उनके चेहरे पे दिखता था एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि मुझे एक्टिंग सीखने की ज़रूरत नहीं पड़ी क्योंकि वो मेरे अंदर पहले से थी और इसका मुझे भरोसा था ।
जी हां ये थीं ‘ आर पार ‘और ‘ बरसात की रात’ जैसी फिल्मों से अपनी खास जगह बनाने वाली’ ‘श्यामा ‘जिनका असली नाम था ,खुर्शीद अख़्तर , फिल्मों से जुड़ने पर निर्देशक विजय भट्ट ने उन्हें ‘श्यामा ‘नाम दिया था।

All About Actress Shyama In Hindi:

छोटी सी उम्र में की फिल्में :-

7 जून 1935 को ब्रिटिश भारत के लाहौर, पंजाब में एक मुस्लिम अरैन परिवार में पैदा हुईं श्यामा 1940 के दशक में लाहौर से मुंबई आ गईं चूंकि वो अभिनेत्री और गायिका नूरजहां की रिश्तेदार थीं इसलिए उनका फिल्मों से नाता बहोत कम उम्र से जुड़ गया और सबसे पहले वो नूरजहाँ जी के शौहर शौकत हुसैन रिज़वी की ,”ज़ीनत” और “मीराबाई ” जैसी कुछ फ़िल्मों में ही नज़र आईं ,1945 की फ़िल्म ‘ज़ीनत ‘में एक क़व्वाली में कोरस में नज़र आईं थीं  कहते हैं उनके वालिद फिल्मों को अच्छा नहीं समझते थे और वो फिल्मों में जाने के भी ख़िलाफ़ थे इसलिए श्यामा ने उनसे छुपाकर फिल्मों में काम किया पर जब उन्हें पता चला तो वो नाराज़ भी हुए लेकिन फिर श्यामा की माँ और बहन के समझाने पर मान गए।

बेबी ख़ुर्शीद से बनीं श्यामा :-

इन फिल्मों के बाद श्यामा उस वक़्त ‘बेबी ख़ुर्शीद ‘के नाम से मशहूर हो गई थीं शायद उनकी उम्र उस समय कुछ नौ बरस की रही होगी लेकिन जब उन्होंने ‘बीते दिन (1947), परवाना (1947) और जलसा (1948) जैसी फिल्मों में काम किया तो उनके साँवले सलोने सुन्दर से चेहरे को देखकर निर्देशक विजय भट्ट ने उन्हें प्यारा सा नाम दिया ‘श्यामा’

श्यामा के फ़िल्मी करियर ने तब उड़ान भरी जब अभिनेत्री बेगम पारा के कहने पर, आईएस जौहर ने अपनी फ़िल्म ‘श्रीमतीजी ‘(1952) की नायिका के रूप में उन्हें चुन लिया और बस उसके बाद से ही श्यामा को धड़ाधड़ कई फिल्में मिलीं जिसमें ,अरेबियन नाइट्स फ़िल्म ‘गुल सनोबर ‘(1953) में उन्होंने भावी सुपरस्टार शम्मी कपूर के साथ मुख्य भूमिका निभाई और  ‘शेख चिल्ली‘ (1956), ‘छू मंतर‘ (1956), ‘लाल-ए-यमन ‘(1956), और ‘सूरज और चंदा ‘(1973) सहित कई अन्य फंतासी फिल्मों के साथ-साथ ‘लाल बांग्ला ‘(1966) और ‘मिलन ‘(1967) जैसी थ्रिलर फिल्मों में भी नज़र आईं।


उन्होंने गुरु दत्त की क्लासिक ‘आर पार’ और बाद में ‘बरसात की रात’ में अहम किरदार निभाए , जिसे उनके सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में गिना जाता है इस तरह उन्होंने क़रीब 150 से अधिक फ़िल्मों में अभिनय किया, जिनमें से ज़्यादातर में उन्होंने मुख्य भूमिकाएँ निभाईं और 1952 – 1960 के दौरान, 80 से ज़्यादा फ़िल्मों में काम किया।

सर्वर्श्रेष्ठ अभिनेत्री चुनी गईं:-

श्यामा को ,’आर पार’ (1954), ‘बरसात की रात’ (1960) और (1951) ‘तराना’ के बाद ‘मिलन’ , ‘भाई-भाई’ (1956), ‘मिर्ज़ा साहिबान ‘(1957),’भाभी’ (1957) और ‘शारदा’ (1957) में उनके बेमिसाल अभिनय के ज़रिए पहचान मिली और’ शारदा ‘में शानदार अभिनय के लिए , उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार दिया गया ।

अभिनय की माला में गीतों को हूबहू पिरोने में था महारत हासिल:

50 के दशक के उत्तरार्ध की वो ऐसी चहीती अभिनेत्री थीं जो संगीत निर्देशकों और कवियों की लय और गीत के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील थीं। उन पर फिल्माए गए गाने जैसे “ऐ दिल मुझे बता दे”, “ओ चांद जहां वो जाए”, “ऐ लो मैं हारी पिया”, “देखो, वो चांद छुप के करता है क्या इशारे”, “छुपा कर मेरी आंखों को”, “सुन सुन सुन सुन ज़ालिमा” और “जा रे का रे बदारा” इसी बात के उदाहरण हैं। कुछ और दिलचस्प किरदारों में उन्होंने अपने अभिनय की अमिट छाप छोड़ी जिसमें उनकी1959 की फिल्म ‘ दो बहनें ‘ भी याद आती है जिसमें आपने ऐसी जुड़वाँ बहनों का किरदार निभाया, जो एक दूसरे से बिल्कुल जुदा और अपोज़िट नेचर की थीं।

जॉनी वॉकर के साथ कई बार स्क्रीन शेयर किया :-

श्यामा ने हास्य अभिनेता जॉनी वॉकर की कई फिल्मों में उनके साथ मुख्य भूमिकाएँ निभाईं, जिनमें ‘जॉनी वॉकर ‘ ‘दुनिया रंग रंगीली ‘ ‘मिस्टर क़ॉर्टून एमए ‘, ‘खोटा पैसा ‘और ‘मिस्टर जॉन ‘ छू मंतर , आर पार , मुसाफिर खाना , और खेल खिलाड़ी का ,जैसी फिल्मों में काम किया था इसलिए अभिनेत्री अमिता के बाद जॉनी वॉकर उनके क़रीबी दोस्तों में शामिल थे।
इसके बाद, श्यामा ने राजेश खन्ना की ‘मास्टरजी’ और ‘अजनबी ‘,’सावन भादों’ और ‘दिल दिया दर्द लिया ‘,जैसी कई और फिल्मों में यादगार भूमिकाएँ निभाईं।

राज़ थी शादी :-

1953 में उनकी शादी सिनेमेटोग्राफर फली मिस्त्री से हुई थी। उनके पति बॉम्बे, भारत के पारसी ( जोरास्ट्रियन ) थे लेकिन उन्होंने शादी को 10 साल तक सबसे छुपा कर रखा क्योंकि उन्हें डर था कि अगर उनकी शादी के बारे में सबको पता चल गया तो श्यामा का करियर प्रभावित होगा; उन दिनों, ऐसा माना जाता था कि शादी होते ही महिला सितारों की फैन फॉलोइंग कम हो जाती है। उनके पहले बच्चे, उनके सबसे बड़े बेटे के जन्म से कुछ समय पहले ही शादी का खुलासा हुआ था। दंपति के तीन बच्चे हुए, दो बेटे, फारुख और रोहिन, और एक बेटी शिरीन।

पति के जाने के बाद उनकी परेशानी आई सबके सामने :-

फली मिस्त्री की मृत्यु 1979 में हुई, उसके बाद वे मुंबई में ही रहीं। ऐसा लगता था कि उनकी शादी अच्छी चल रही थी और वे एक-दूसरे के साथ बहोत खुश थे लेकिन सन 2013 को कथित तौर पर श्यामा ने कहा, “मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी हमेशा से फली थे ।” कुछ साल बाद श्यामा 14 नवंबर 2017 को 82 वर्ष की उम्र में हमें छोड़कर चली गईं,पर पीछे छोड़ गईं अपने चाहने वालों के लिए उनकी बेमिसाल अदाकारी और दिलकश मुस्कुराहट का खज़ाना लुटाती फिल्मों की सौग़ात।

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