Sonam Wangchuk Hunger Strike: “क्या भूख हड़ताल लोकतंत्र में नैतिक संघर्ष है… या सरकार को झुकाने की कोशिश? इस सवाल का जवाब खोजने के लिए हमें 77 साल पीछे चलना होगा, जब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में ‘Grammar of Anarchy’ की बात कही थी…”
हमें अपने सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए संवैधानिक तरीकों को दृढ़ता से अपनाए रखना चाहिए। इसका अर्थ है कि हमें सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह जैसी विधियों को त्याग देना चाहिए। जब सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए कोई संवैधानिक मार्ग उपलब्ध नहीं था, तब इन असंवैधानिक तरीकों का कुछ औचित्य था। लेकिन जहाँ संवैधानिक रास्ते खुले हों, वहाँ इन असंवैधानिक तरीकों का कोई औचित्य नहीं रह जाता। ये तरीके अराजकता के व्याकरण के अलावा और कुछ नहीं हैं, और जितनी जल्दी इन्हें छोड़ दिया जाए, उतना ही हमारे लिए बेहतर होगा।
आज 77 साल बाद एक बार फिर डॉ अंबेडर के इस कथन को सोशल मीडिया में शेयर किया जा रहा है, दिल्ली में सोनम वांगचुक की 19 दिन से चल रही भूख हड़ताल से जोड़ा जा रहा है.
यह कहा जा रहा है कि भले ही शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का अहम हिस्सा है मगर सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल या यह तरीका असंवैधानिक है, ब्लैकमेलिंग है। यह वैसा ही हठ है कि मेरी बात मानों वरना में कुँए में कूद जाऊंगा, खुद को आग में झोंक दूंगा या भूखे रहकर जान दे दूंगा। अंबेडकर ने ऐसे ही सत्याग्रह को अराजकता को निमंत्रण कहा था क्योंकी अगर ऐसे ही भूख हड़ताल के दम पर सरकारों को मांगे पूरी करने के लिए मजबूर किया जाता रहा तो फिर आगे जाकर न जानें ऐसी कितनी मांगे पूरी करनी पड़ जाएंगी जो न तो लोकतंत्र के लिए सही होंगी न संवैधानिक। कहने का मतलब ये है कि आज सोनम वांगचुक शिक्षा मंत्री को पद से हटाने के लिए भूख हड़ताल कर रहे हैं तो कल कोई प्रधान मंत्री, CJI, सेना प्रमुख को हटाने के लिए धरने पर बैठने लग जाएगा।
वांगचुक की भूख हड़ताल के बीच लोग मणिपुर की इरोम शर्मीला की चर्चा भी हो रही है जो नवंबर 2000 से अगस्त 2016 तक यानी 16 साल तक भूख हड़ताल पर रहीं। इन 16 सालों में उन्होंने अन्न का एक दाना नहीं खाया, मनमोहन सरकार ने इनकी नाक में एक नली डालकर दूध और पोषक तत्व देकर उनको जिंदा रखती रही. इरोम के अनशन के दौरान ज्यादातर समय कांग्रेस सत्ता में रही बीजेपी भी आई पर दोनों सरकारों ने इस बात को नहीं माना कि अनशन करने के कारण देश का कानून बदल दिया जाए. इरोम शर्मीला जो मणिपुर से AFSPA हटाने की मांग को लेकर इतने सालों से भूख हड़ताल पर रहीं, उन्हें भी यह यकीन हो गया था कि जनता उनके साथ है मगर जब 2017 में उन्होंने मणिपूर से कांग्रेस के मुख्य मंत्री ओकराम इबोबी सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा तो उन्हें सिर्फ 90 वोट मिले।
ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो जब किसी ने अपनी मांगों को लेकर लंबी भूख हड़ताल की हो। पर्यावरणविद् और आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर जीडी अग्रवाल, जिन्हें बाद में स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के नाम से जाना गया, उन्होंने गंगा नदी की अविरल धारा और उस पर बन रही जलविद्युत परियोजनाओं को रोकने की मांग को लेकर कई बार अनशन किया। 2018 में उनका अंतिम अनशन 111 दिनों तक चला। उन्होंने सरकार को कई पत्र भी लिखे, लेकिन उनकी प्रमुख मांगें पूरी नहीं हुईं। 11 अक्टूबर 2018 को अनशन के दौरान उनका निधन हो गया।
इरोम शर्मिला हों, जीडी अग्रवाल हों या आज सोनम वांगचुक—इन तीनों उदाहरणों से एक बात साफ होती है भारतीय लोकतंत्र का अनुभव बताता है कि भूख हड़ताल एक शक्तिशाली नैतिक और राजनीतिक दबाव का माध्यम हो सकती है, लेकिन किसी भी सरकार को केवल अनशन के कारण कानूनी रूप से निर्णय बदलने के लिए बाध्य नहीं करती। आखिरकार किसी भी मांग पर फैसला सरकार, संसद, अदालत और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए ही होता है, न कि केवल अनशन के कारण।
यही वजह है कि 1949 में डॉ. आंबेडकर द्वारा कही गई बात आज भी बहस का विषय बनी हुई है। सवाल वही है—क्या लोकतंत्र में नैतिक दबाव से बदलाव होना चाहिए, या केवल संवैधानिक संस्थाओं और राजनीतिक प्रक्रिया के माध्यम से? इस सवाल का जवाब आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना 77 साल पहले था।

