End-of-Life Signs: किसी भी गंभीर बीमारी के आखिरी चरण में मरीज के बॉडीऔर व्यवहार में कई प्रकार के बदलाव देखे जाते हैं।जिसको End-of-Life Signs भी हम कहते हैं अमेरिकन कैंसर सोसायटी के द्वारा दी जाने वाली जानकारी के अनुसार इन संकेतों को समझना मरीज और परिवार दोनों के लिए इमोशनल और प्रैक्टिकल रूप से बहुत जरूरी होता है।
अंतिम समय में शरीर में धीरे-धीरे आने वाले बदलाव
जब किसी व्यक्ति का अंतिम समय करीब होता है तो शरीर की ऊर्जा तेजी से कम होने लगती है। पेशेंट अधिकतर समय अपने बिस्तर पर ही रहता है और चलने फिरने में पूरी तरह असमर्थ हो जाता है। उनका खाना पीना भी लगभग बंद हो जाता है जो इस प्रक्रिया का सामान्य सा हिस्सा बताया जाता है ना की कोई भी असामान्य स्थिति।
ये भी पढ़े: मेथ ड्रग का खतरा बढ़ा, Silicon Valley स्टडी में Heart Attack से सीधा कनेक्शन…
मरीज की मानसिक स्थिति और चेतना में क्या है परिवर्तन
इस लेवल में मरीज की जागरूकता में बदलाव देखने को मिलता है कई बार व्यक्ति ज्यादा सोने लगता है या फिर आसपास की चीजों को पहचानने में उसे कठिनाई होने लगती है। कुछ मामलों में से बेचैनी सा देखा जाता है जबकि कभी-कभी अचानक स्पष्ट बातचीत करने की स्थिति भी हो जाती है।
अंतिम समय में सांस लेने के पैटर्न में बदलाव
End-of-Life Signs मैं सबसे जरूरी बदलाव सांस लेने में दिखाई देता है व्यक्ति की सांस कभी तेज और कभी धीमी देखने को मिल सकती है या फिर बीच-बीच में रुक भी सकती है। गले से आवाज आना जिसे डेथ रैटल कहा जाता है यह भी एक नॉर्मल सा संकेत होता है। यह शरीर के सिस्टम के धीमा होने का संकेत देता है।
शरीर के तापमान और रक्त प्रवाह में क्या है असर
किसी व्यक्ति का जब अंतिम समय करीब आता है तो उसके हाथ पैर ठंडा पड़ने लगते हैं और त्वचा का रंग भी धीरे-धीरे बदल सकता है। यह इसलिए होता है क्योंकि शरीर में ब्लड का प्रवाह धीरे-धीरे कम हो जाता है। ब्लड प्रेशर गिरना और शरीर का कमजोर होना इस प्रक्रिया का ही एक हिस्सा है।
ये भी पढ़े: भारत में पुरुषों में तेजी से बढ़ रहा है Oral Cancer, ICMR स्टडी ने जताई चिंता
केयरगिवर्स के लिए क्या है जरूरी सलाह
मरीज की देखभाल करने वालों के लिए यह समय एक चुनौती पूर्ण समय होता है डॉक्टर के द्वारा सलाह दी जाती है कि इस दौरान मरीज को आराम देना सबसे जरूरी होता है। जबरदस्ती खाना या पानी देने के बजाय इसकी सुविधा और इमोशनल जरूरत पर ध्यान देना जरूरी है। संत माहौल और किसी अपने के साथ रहने से मरीज को सहारा मिल सकता है।

