Was Jesus Indian Origin: क्या ईसा मसीह भारतीय थे (Was Jesus Christ an Indian) क्या जीजस क्राइस्ट का जन्म भारत में हुआ था (Was Jesus Christ born in India)? ऐसे तमाम सवालों से इंटरनेट भरा हुआ है क्योंकी ईसा मसीह के कफ़न (the shroud of Jesus Christ) जिसे ट्यूरिन का कफ़न (Shroud Of Turin) कहा जाता है उसपर पर हुई नई रिसर्च में कुछ ऐसा ही खुलासा हुआ है. जिसमे 40% भारतीय DNA पाया गया (Indian DNA In Shroud Of Turin) है. इस नए शोध ने ईसाई धर्म के इतिहास को पूरी तरह बदल डाला है.
ट्यूरिन का कफ़न क्या है?
What Is Shroud Of Turin: माना जाता है कि ट्यूरिन का कफ़न असल में ईसा मसीह का कफ़न है. उनकी मौत के बाद इसी लेलिन के कपड़े में लपेटकर उन्हें दफनाया गया था. इस पर एक आदमी की हल्की इमेज दिखती है और लोग मानते हैं कि वह छवि किसी और की नहीं बल्कि ईसाई धर्म के संस्थापक ईसा मसीह की है. यह छवि पेंट की हुई नहीं है बल्कि उस शख्स के मृत शरीर से निकली ऊर्जा से बनी है तो बिलकुल किसी फोटोग्राफ के नेगेटिव जैसी दिखाई देती है. इसपर कई शोध हुए और यह साबित नहीं हुआ कि इसमें बनी छवि किसी ने बनाई है.
ट्यूरिन के कफ़न का इतिहास
History Of Shroud Of Turin: यूरोप के मध्यकालीन समय में, लगभग 1354 के आसपास, फ्रांस के एक छोटे से चर्च में एक अजीब सा कपड़ा लोगों के सामने आया। यह कोई साधारण कपड़ा नहीं था। यह वही कपड़ा था जिसे आज हम Shroud of Turin के नाम से जानते हैं। इस लंबे, पुराने लिनन कपड़े पर एक आदमी की हल्की-सी छवि उभरी हुई थी—सामने और पीछे दोनों तरफ। उस आदमी के शरीर पर घावों के निशान थे, सिर पर कांटों जैसे घाव, हाथ-पैर में कीलों जैसे निशान… और लोगों ने तुरंत इसे Jesus Christ से जोड़ दिया।
लेकिन कहानी यहीं से शुरू होकर उलझती चली जाती है। इस कपड़े का 1354 से पहले कोई पक्का इतिहास नहीं मिलता। जैसे यह अचानक इतिहास में प्रकट हो गया हो। कुछ लोगों ने इसे चमत्कार कहा, तो कुछ ने इसे धोखा। धीरे-धीरे यह कपड़ा फ्रांस से इटली पहुँचा और अंततः ट्यूरिन शहर में स्थापित कर दिया गया, जहाँ आज भी यह Cathedral of Saint John the Baptist में सुरक्षित रखा हुआ है।
समय बीतता गया, लेकिन इस कफ़न का रहस्य और गहराता गया। 1532 में एक भयंकर आग लगी, जिसमें यह कपड़ा भी जलने से बचते-बचते बचा। उसमें छेद पड़ गए, किनारों पर जलने के निशान बन गए। बाद में इसे सिला गया, लेकिन आग के निशान आज भी उस इतिहास की गवाही देते हैं—जैसे यह कपड़ा खुद अपनी कहानी सुनाना चाहता हो।
फिर 20वीं सदी आई, और विज्ञान ने इस रहस्य को पकड़ने की कोशिश की। 1978 में वैज्ञानिकों की एक टीम ने इसका गहराई से अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि इस पर बनी छवि किसी पेंट या रंग से नहीं बनी है। कोई ब्रश स्ट्रोक नहीं, कोई पारंपरिक रंग के सबूत नहीं। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि यह छवि एक “फोटोग्राफिक नेगेटिव” की तरह व्यवहार करती है—जब इसे नेगेटिव में देखा गया, तो चेहरा और शरीर की आकृति और भी साफ और जीवंत दिखाई देने लगी। यह ऐसी तकनीक थी, जो मध्यकाल में संभव ही नहीं मानी जाती।
लेकिन विज्ञान ने एक और मोड़ दिया। 1988 में कार्बन डेटिंग की गई और परिणामों ने सबको चौंका दिया। रिपोर्ट के अनुसार, यह कपड़ा 1260 से 1390 के बीच का है—यानी उस समय का, जब यह पहली बार इतिहास में दिखा। इससे यह शक और गहरा गया कि शायद यह असली नहीं, बल्कि मध्यकाल में बनाई गई कोई कलाकृति है। हालांकि, कुछ वैज्ञानिकों ने इस टेस्ट पर भी सवाल उठाए—कहा गया कि सैंपल उस हिस्से से लिया गया था, जिसे बाद में रिपेयर किया गया था।
क्या जीजस भारतीय थे?
हाल ही में किए गए DNA विश्लेषण से संकेत मिलता है कि यह कफ़न, संभवतः भारतीय मूल का हो सकता है।इटली के University of Padova के शोधकर्ताओं ने 1978 में कफ़न से एकत्रित सामग्री का विश्लेषण किया और पाया कि इस कपड़े पर मौजूद लगभग 40% मानव DNA भारतीय वंश (Indian lineage) से संबंधित है। इससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि कफ़न को बुनने में इस्तेमाल किया गया धागा प्राचीन भारत के सिंधु घाटी क्षेत्र से आया हो सकता है।
वैज्ञानिक Gianni Barcaccia ने सबसे पहले 2015 में यह प्रस्ताव रखा था कि इस लिनन का संबंध भारत से हो सकता है। अब उन्होंने और उनकी टीम ने उसी सामग्री पर दोबारा अध्ययन किया और पाया कि इस कफ़न में मध्यकालीन और आधुनिक काल के DNA की व्यापक विविधता संरक्षित है।
मानव DNA के अलावा, शोधकर्ताओं को इसमें पालतू जानवरों (जैसे बिल्ली और कुत्ते), कृषि पशुओं, जंगली जानवरों (जैसे हिरण और खरगोश) के साथ-साथ कुछ मछलियों—जैसे ग्रे मुललेट, अटलांटिक कॉड और रे-फिन्ड मछलियों—के भी आनुवंशिक अंश मिले।
संभव है कि रोमन लोगों ने सिंधु घाटी क्षेत्र से लिनन या धागा आयात किया हो, जिससे इस कफ़न में भारतीय DNA के अंश आए हों। यह भी संभव है कि सदियों के दौरान इस कफ़न को भारतीय मूल के लोगों ने छुआ हो, जिससे DNA स्थानांतरित हो गया हो।
शोधकर्ताओं ने यह भी कहा, “यह कफ़न कई लोगों के संपर्क में आया है, जिससे इसके मूल DNA की पहचान करना मुश्किल हो जाता है।”
उन्होंने आगे कहा, “ट्यूरिन के कफ़न पर पाए गए DNA संकेत देते हैं कि यह कपड़ा भूमध्यसागरीय क्षेत्र में व्यापक रूप से इस्तेमाल या संपर्क में रहा है और यह भी संभव है कि इसका धागा भारत में तैयार किया गया हो।”
ट्यूरिन के कफ़न का इतिहास काफी जटिल है। इसका पहला प्रमाण 1354 में फ्रांस में मिलता है। तब से यह इटली के ट्यूरिन शहर स्थित Cathedral of Saint John the Baptist में रखा गया है, जहां यह लाखों लोगों को आकर्षित करता है और इसकी प्रामाणिकता को लेकर आज भी तीखी बहस जारी है।
बात सिर्फ कफ़न के कपड़े की नहीं है बात उस कफ़न में पड़े खून के धब्बों की है जिससे कफ़न में एक इंसान का चित्र बना. ऐसे दावे किए जा रहे हैं कि जीजस एक इंडियन ओरिजिन थे जिन्होंने वेस्ट देशों में सनातन और बौद्ध धर्म से सीख लेकर मानवता का सन्देश दिया।
क्या ईसा मसीह भारत आए थे?
Did Jesus Christ Went to India: बाइबल में ईसा मसीह के बचपन के 18 सालों का समय गायब है जब वे 12 से 30 की उम्र के थे तब का. इन 18 सालों को लॉस्ट ईयर (Lost Year Of Jesus Christ) कहा जाता है. 19वीं सदी में रूसी लेखक Nicolas Notovitch ने यह दावा किया जब वे लद्दाख की Hemis Monastery गए थे तब उन्हें ईसा (Issa) नामक व्यक्ति के बारे में एक पाण्डुलिपि मिली जिसमे लिखा था कि ईसा मसीह भारत आए और उन्होंने सनातन धर्म के वेदों और बौद्ध धर्म का ज्ञान लिया। उन्होंने भारत से ही योग, ध्यान, अहिंसा और अध्यात्म सीखा और वापस जाकर यही उपदेश अपने देश में दिया। हालांकि बाइबल में उनके भारत आने का कोई प्रमाण नहीं मिलता मगर भविष्यपुराण में एक श्लोक है जिसे लोग जीजस से जोड़ते हैं.
एकदा तु शकाधीशः शालिवाहन भूपतिः।
हिमतुङ्गं समासाद्य म्लेच्छाचार्यं ददर्श ह॥
स श्वेतवस्त्रं दधतं गौराङ्गं सुमनोहरम्।
को भवानिति तं प्राह स होवाच मुदान्वितः॥
ईशपुत्रं च मां विद्धि कुमारीगर्भसम्भवम्।
म्लेच्छधर्मस्य वक्तारं सत्यव्रतपरायणम्॥
इसका अर्थ है:
राजा शालिवाहन हिमालय में एक गोरे, सफेद वस्त्र पहने संत से मिलते हैं।
जब वो पूछते हैं “आप कौन हैं?”, तो वह व्यक्ति कहता है: मुझे ईश्वर का पुत्र जानो, मैं कुंवारी के गर्भ से पैदा हुआ हूँ, और म्लेच्छ धर्म (विदेशी धर्म) का उपदेशक हूँ, सत्य का पालन करता हूँ।”
इसी “ईशपुत्र” और “कुमारी गर्भ” वाली लाइन को लोग Jesus Christ से जोड़ते हैं।
लेकिन ऐसा माना जाता है कि भविष्यपुराण में लिखी कई बातें बाद में जोड़ी गई हैं.

