Shankaracharya Avimukteshwar : खुद को शंकराचार्य कैसे साबित करेंगे अविमुक्ततेश्वरानंद महाराज?

Shankaracharya Avimukteshwar : उत्तर प्रदेश के माघ मेले के दौरान मौनी अमावस्या के पावन स्नान को लेकर ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और प्रशासन के बीच जारी विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। स्नान के समय उनके समर्थकों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की की स्थिति बन गई, जिसके चलते स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद स्नान से वंचित रह गए। इस घटना को लेकर उन्होंने पुलिस और प्रशासन के खिलाफ धरने पर बैठ गए हैं। अब माघ मेला प्रशाशन ने आधी रात को अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के शिविर में जाकर नोटिस थमाया है, जिसमें उनसे पूछा गया है कि वो शंकराचार्य कैसे बने?

अविमुक्तेश्वरानंद को मिला नोटिस 

माघ मेला प्रशासन द्वारा दिए गए नोटिस के बाद अब अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को 24 घंटे में यह जवाब देना है कि वो शंकराचार्य कैसे और कब बने? प्रशासन ने उन्हें शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया है। यह मामला इसलिए भी गंभीर हो गया है क्योंकि माघ मेला सनातन परंपरा का एक बड़ा पर्व है, जिसमें संतों और आचार्यों का विशेष सम्मान होता है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर इस स्थिति क्यों बनी। क्या यह सिर्फ भीड़ प्रबंधन की लापरवाही थी या इसके पीछे कोई और कारण भी हैं- इस पर चर्चा तेज हो गई है।

नोटिस में सुप्रीम कोर्ट का दिया हवाला 

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को एक मुखर और विवादित संत माना जाता है। वह समय-समय पर सरकार और व्यवस्थाओं पर अपने साफ और बोल्ड विचार व्यक्त करते रहे हैं। इसी वजह से उनके और प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति बनी हो सकती है। इस पूरे मामले में एक नया मोड़ तब आया जब प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस जारी किया। नोटिस में सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले का हवाला देते हुए पूछा गया कि वह खुद को ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य किस आधार पर बता रहे हैं। मेला प्राधिकरण ने 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा है, और फिलहाल प्रशासन ने उन्हें शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया है।

हालांकि, प्रशासन का कहना है कि यह सब कानून व्यवस्था और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार किया जा रहा है।

36 घंटे से अविमुक्तेश्वरानंद पालकी से बाहर बैठे हैं? 

गौरतलब है कि पिछले करीब 36 घंटे से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिविर के बाहर पालकी पर बैठे हैं। उनके समर्थकों का आरोप है कि माघ मेले के दौरान उनके शिष्यों के साथ अभद्र व्यवहार किया गया, जिसकी वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं। वहीं, प्रशासन का कहना है कि उन्होंने नियमों और निर्देशों के तहत कार्रवाई की है।

2006 में स्वामी स्वरूपानंद से ली थी दीक्षा

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का परिचय दें तो उन्होंने 2006 में स्वामी स्वरूपानंद से दीक्षा ली थी। वह खुद को ज्योतिष पीठ का 46वां शंकराचार्य बताते हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ था। दीक्षा से पहले उनका नाम उमाशंकर उपाध्याय था। उन्होंने वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की डिग्री प्राप्त की है। छात्र राजनीति में भी वे सक्रिय रहे हैं और 1994 में छात्रसंघ चुनाव जीत चुके हैं।

इससे पहले राम मंदिर को लेकर विवाद में रहें थे 

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इससे पहले भी कई विवादित बयानों को लेकर चर्चा में रहे हैं। उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में हिस्सा न लेने का निर्णय लिया था। साथ ही, केदारनाथ से 228 किलोग्राम सोना गायब होने का आरोप भी लगाया था। 2008 में उन्होंने गंगा नदी को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की मांग को लेकर अनशन किया था। राजनीतिक रूप से भी वे चर्चा में रहे हैं, जब 2024 के लोकसभा चुनाव में वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ उम्मीदवार खड़ा किया गया था।

अब इस मामले में उठ रहें ये सवाल

  • क्या यह मामला सिर्फ प्रशासन और न्यायिक आदेशों का है,
  • या फिर संत-परंपरा और प्रशासन के बीच बढ़ते टकराव का संकेत है?
  • इस पूरे विवाद की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?

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