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शहडोल की बनास नदी बनी प्रवासी पक्षियों का ठिकाना, खूबसूरत कॉर्मोरेंट और चक्रवाक के झुंड ने बिखेरे रंग

शहडोल की बनास नदी में प्रवासी कॉर्मोरेंट और चक्रवाक पक्षियों के झुंड का सुंदर दृश्य

शहडोल की बनास नदी में प्रवासी पक्षियों का बसेरा, कॉर्मोरेंट–चक्रवाक के झुंड आकर्षण

Shahdol’s Banas River has become a haven for migratory birds: शहडोल । मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में बहने वाली बनास नदी इन दिनों विदेशी मेहमानों से गुलजार है। साइबेरिया, मध्य एशिया और उत्तरी गोलार्ध की कड़ाके की सर्दी से बचने हजारों किलोमीटर की यात्रा करके प्रवासी पक्षी यहां पहुंच गए हैं। नदी के शांत तट इन दिनों कॉर्मोरेंट और खूबसूरत चक्रवाक यानी ब्राह्मणी बत्तख की चहचहाहट व कलरव से जीवंत हो उठे हैं। सुबह सूरज निकलते ही कारी-गोरी घाट, हथवार गांव और आसपास के इलाकों में पक्षियों को निहारने के लिए प्रकृति प्रेमियों और फोटोग्राफर्स का जमावड़ा लगने लगा है।

प्रस्तुत कर रहे मनमोहक दृश्य

पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार इस बार बनास नदी में कॉर्मोरेंट यानी बड़ी काली जल कौवे की संख्या सबसे अधिक है, जो पानी में गोता लगाकर मछलियां पकड़ते मनमोहक दृश्य प्रस्तुत कर रहे हैं। वहीं लाल-नारंगी रंग की चक्रवाक जोड़ों में दिख रही हैं, जिनका भारतीय संस्कृति और साहित्य में विशेष स्थान है। महाकवि कालिदास ने इन्हें प्रेम और वियोग का प्रतीक माना है, तो आदि शंकराचार्य ने नर्मदा अष्टक में “चक्रवाक नमस्तुभ्यं” कहकर इनका स्मरण किया है।

अक्टूबर से अप्रैल तक रहते हैं ये मेहमान

बतादें कि “हर साल अक्टूबर-नवंबर में ये पक्षी आते हैं और मार्च-अप्रैल तक यहीं रहते हैं। बनास नदी का स्वच्छ जल और शांत वातावरण इन्हें बहुत पसंद है। इनके आने से पूरा इलाका जीवंत हो जाता है।”लोगों से खास अपील
स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता और पक्षी प्रेमी इन प्रवासी मेहमानों की सुरक्षा के लिए लोगों से विशेष अपील कर रहे हैं कि तेज आवाज न करें, पटाखे न जलाएं, पक्षियों के करीब जाकर फोटो न खींचें, दूर से ही आनंद लें, प्लास्टिक और कचरा नदी में न फेंकें और इनका शिकार या अंडे नुकसान पहुंचाना पूरी तरह प्रतिबंधित है। ये नन्हे मेहमान हर साल हम पर भरोसा करके हजारों किलोमीटर दूर से आते हैं। इन्हें सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है, ताकि आने वाले सालों में भी बनास नदी इनके स्वागत के लिए तैयार रहे।

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