उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए लाए गए UGC Equity Regulations 2026 पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्या कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने केंद्र सरकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि भारत की एकता का प्रतिबिंब हमारे संस्थानों में दिखना चाहिए।
भेदभाव के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने समाज में बढ़ती प्रतिगामी सोच पर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि आजादी के 75 साल बाद क्या हम एक वर्गहीन समाज बनने के बजाय पीछे की ओर जा रहे हैं? बेंच ने स्पष्ट किया कि शिक्षण संस्थानों में भेदभाव किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि नियम ऐसे होने चाहिए जो समाज को जोड़ने का काम करें, न कि विभाजित करने का।
‘अमेरिका जैसे हालात न हों’ – जस्टिस सूर्या कांत
अदालत ने वैश्विक संदर्भ देते हुए एक बड़ी चेतावनी दी। पीठ ने कहा, “हमें उम्मीद है कि भारत में अमेरिका जैसी स्थिति पैदा नहीं होगी, जहां एक समय अश्वेतों और श्वेतों के लिए अलग-अलग स्कूल हुआ करते थे।” कोर्ट ने हॉस्टलों में अलग-अलग व्यवस्था करने के विचार को सिरे से खारिज कर दिया। जजों ने अपने छात्र जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि हम सभी हॉस्टलों में साथ रहे हैं और आज के समाज में अंतरजातीय विवाह भी सामान्य बात है।

UGC Equity Regulations 2026 का विवाद क्या है?
13 जनवरी को अधिसूचित किए गए इन नए नियमों के तहत हर उच्च शिक्षा संस्थान में ‘इक्विटी कमेटी’ बनाना अनिवार्य किया गया था। इन समितियों का काम भेदभाव की शिकायतों की जांच करना और समानता को बढ़ावा देना था। हालांकि, याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यूजीसी ने जाति आधारित भेदभाव की जो परिभाषा तय की है, वह समावेशी नहीं है। इसमें कुछ श्रेणियों को सुरक्षा के दायरे से बाहर रखा गया है, जो संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।
क्षेत्रीय संस्कृति और रैगिंग का मुद्दा
कोर्ट ने उत्तर-पूर्व और दक्षिण भारत से आने वाले छात्रों के साथ होने वाले व्यवहार पर भी चिंता जताई। बेंच के अनुसार, अक्सर छात्र अपनी विशिष्ट संस्कृति के साथ संस्थानों में आते हैं, लेकिन उनके प्रति अनभिज्ञ लोग उन पर आपत्तिजनक टिप्पणियां करते हैं। इस तरह के व्यवहार को रैगिंग का सबसे बुरा रूप बताया गया। कोर्ट ने आगाह किया कि नियमों में खामियों का फायदा शरारती तत्व उठा सकते हैं।
सामान्य वर्ग के छात्रों की चिंताएं
आलोचकों और कुछ छात्र संगठनों का दावा है कि UGC Equity Regulations 2026 में भेदभाव की परिभाषा को केवल SC, ST और OBC तक सीमित कर दिया गया है। उनका तर्क है कि इससे सामान्य वर्ग के उन छात्रों को संस्थागत सुरक्षा नहीं मिल पाएगी, जो स्वयं किसी पूर्वाग्रह या भेदभाव का शिकार हो सकते हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि ये नियम एकतरफा हैं और सभी छात्रों के लिए समान सुरक्षा तंत्र सुनिश्चित नहीं करते।
रोहिल्ला वेमुला और पायल तड़वी मामले का संदर्भ
गौरतलब है कि ये नए नियम सुप्रीम कोर्ट के पिछले निर्देशों के बाद तैयार किए गए थे। अदालत रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी। रोहित और पायल, दोनों ने ही कथित तौर पर जातिगत उत्पीड़न के कारण आत्महत्या कर ली थी। साल 2012 के पुराने नियमों को केवल ‘सलाह’ माना जाता था, जबकि 2026 के नए नियमों को कड़ाई से लागू करने का प्रावधान था।
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