Santan Saptmi Vrat 2025 : संतान सुख-दीर्घायु व आरोग्य प्रदान करने वाला पर्व

Santan Saptmi Vrat 2025 : संतान सुख-दीर्घायु व आरोग्य प्रदान करने वाला पर्व – भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को संतान सुख की प्राप्ति, संतान की दीर्घायु एवं आरोग्य की कामना के लिए संतान सप्तमी व्रत रखा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, स्वास्थ्य और उन्नति के लिए करती हैं। भविष्य पुराण में वर्णित इस व्रत का संबंध भगवान सूर्यदेव, शिव-पार्वती और लक्ष्मी-नारायण की पूजा से है। भारत के विभिन्न हिस्सों में यह पर्व क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार मनाया जाता है। इस व्रत की विशेषता यह है कि इसके पालन से जहां संतान की रक्षा होती है वहीं संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वालों को भी उत्तम फल प्राप्त होते हैं।

व्रत का महत्व – संतान सप्तमी व्रत को भविष्य पुराण में अत्यंत फलदायी बताया गया है। इस दिन भगवान सूर्य को अर्घ्य देकर, लाल वस्त्र पहनकर, लाल पुष्प और गुड़-आटे का भोग अर्पित किया जाता है। यह व्रत न केवल संतान प्राप्ति के लिए, बल्कि संतान की सुख-समृद्धि व आरोग्य के लिए भी किया जाता है।

संतान सप्तमी व्रत की पूजा विधि – Puja Vidhi
पूजन का समय – व्रत प्रात: से लेकर दोपहर तक रखा जाता है,पूजा सूर्योदय के बाद की जाती है।

आवश्यक सामग्री – पाटे पर लाल या पीला सूत का कपड़ा और पान के पत्ते पर सिंदूर व शुद्ध घी से बनाई हुई माता दुबड़ी की तस्वीर , लाल फूल विशेषकर गुड़हल का, शुद्ध घी का दीपक,गुड़ और गेहूं के आटे से बनाया गया सवाया भोग के लिए सात पुआ ,सात आसें और अठवाई ,ठंडा गाय का दूध ,ठंडा दही,गंगाजल ,चांदी की चूड़ी ,कलावा, नारियल, सुपारी, धूप, दीप,लाल वस्त्र और आसन,श्रृंगार का सामान ,सात गांठ से बने हुए जोड़ा गड़ा ,सात-सात दूर्वा से बने सात बंडल ,मौसमी फल व श्रीफल आदि।

पूजन विधि – व्रतधारी प्रात: स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान सूर्य को तांबे के लोटे में जल और लाल फूल से अर्घ दें। स्थानीय शिवपार्वती के ,गणेश के या किसी भी देवी मंदिर जाकर अपने घर संतान सप्तमी व्रत का संकल्प लें और भगवान को निमंत्रण दें। फिर सवाया लगाकर { जैसे सवा कटोरी या सवा ग्लास नापकर आटा गुड़ से साने } और सात पुआ और सात आसें { मतलब सादा पूड़ी बना कर चारों तरफ से गुझिया की तरह गोठी हुई डिजाइन दर पूड़ी } बनाएं और ठंडा होने दें तब तक चौकी पर भगवान सूर्य, शिव-पार्वती और लक्ष्मी-नारायण की प्रतिमा व कलश के पास पान पर बनी दुबड़ी माता का चित्र स्थापित करें। इसके बाद भगवान सूर्य को घी का दीप दिखाएं और लाल फूल अर्पित करें। गुड़ और आटे का भोग फल , अर्पित करें। शिव-पार्वती और मां दुबड़ी की पूजा कर उन्हें गढ़ा,चांदी की चूड़ी ,दूध – दही व पुआ – आसें और अठवाई की पूजा करने के बाद अर्पित करें। घर के बच्चों को भी पूजा के बाद कलावा कलाई पर बांधें सा – परिवार व्रत की कथा श्रद्धापूर्वक सुनें या पढ़ें। आरती के बाद परिवार की बुजुर्ग महिलाओं का आशीष लें और उन्हीं से अपने हाथ में चांदी की चूड़ी पहनें और गढ़ा बंधवाएं जिसे अगली संतान सप्तमी आने तक पहने और गढ़ा सात दिनों के बाद चाहें तो उतार कर बहते पानी में प्रवाहित करें या किसी गमले में डाल दें।

संतान सप्तमी व्रत की कथा “नंबर एक” – Vrat Katha
माता देवकी और श्रीकृष्ण जन्म – पौराणिक कथा के अनुसार, जब कंस माता देवकी के सभी पुत्रों को जन्म लेते ही मार देता था, तब लोमश ऋषि ने उन्हें संतान सप्तमी व्रत करने का सुझाव दिया। माता देवकी ने विधिपूर्वक यह व्रत किया, जिससे श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। श्रीकृष्ण ने आगे चलकर कंस के अत्याचारों से पृथ्वी को मुक्ति दिलाई।

रानी चंद्रमुखी और रूपमती की पुनर्जन्म कथा नंबर – दो – अयोध्या के प्रतापी राजा नहुष की रानी चंद्रमुखी और उनकी सहेली रूपमती ने सरयू तट पर संतान सप्तमी व्रत देखा और व्रत करने का निश्चय किया, पर रानी इसे भूल गईं। मृत्यु के बाद दोनों ने अनेक योनियों में जन्म लिया। अगली बार जन्म लेकर रूपमती ब्राह्मण कन्या बनीं और पूर्व जन्म की याद के कारण व्रत किया, जिससे उन्हें आठ संतानें प्राप्त हुईं। वहीं रानी चंद्रमुखी, इस जन्म में ईश्वरी नामक राजकन्या बनीं, लेकिन संतान प्राप्त नहीं हुई। ईर्ष्या में उन्होंने रूपमती के बच्चों को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया, लेकिन असफल रहीं। अंततः उन्होंने गलती स्वीकार कर रूपमती से क्षमा मांगी और व्रत किया, जिससे उन्हें भी संतान सुख प्राप्त हुआ।

संतान सप्तमी व्रत के नियम – Vrat Niyam – व्रत सूर्योदय से लेकर दोपहर तक रखें,पूजा करते समय व्रती को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। व्रत में चढ़ाए हुए पुआ का ही पारण करें ,इसके अलावा चाय – दूध ,दही व सीजनल फल लेना चाहिए।घर में शुद्धता एवं शांत वातावरण बनाए रखें ,कथा श्रवण के बाद ही व्रत पूर्ण मानें अंत में स – परिवार आरती करें। इस व्रत को श्रद्धा, संयम और नियमपूर्वक करना चाहिए।

विशेष – संतान सप्तमी व्रत न केवल एक धार्मिक परंपरा है बल्कि माता-पिता की संतान के प्रति अटूट श्रद्धा और प्रेम का प्रतीक भी है। यह व्रत जीवन में संतान सुख, उनके स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना करने वालों के लिए विशेष फलदायक है। श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया यह व्रत निश्चित ही जीवन को सुख-समृद्धि से भर देता है।

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