Santan Saptami 2025 : संतान सप्तमी व्रत 29 या 30 अगस्त को – कब मनाएं – धार्मिक मान्यता के अनुसार, संतान सप्तमी की बड़ी ही विधि-विधान पूर्वक पूजा-आराधना की जाती है। व्रत वैदिक पंचांग के अनुसार, इस संतान सप्तमी की तिथि की शुरुआत 29 अगस्त, रात 8:25 के लगभग शुरू होगी जबकि इस तिथि का समापन अगले दिन 30 अगस्त, रात 10:46 के लगभग समाप्त होगी । अतः इसके अनुसार 2025 में संतान सप्तमी व्रत 30 अगस्त 2025, रविवार को मनाया जाएगा क्संयोंकि सनातनी मान्यताओं के अनुसार जो तिथि ब्रह्म मुहूर्त को स्पर्श करती है वह अत्यंत शुभ होती है यही वजह है कि इस बार संतान सप्तमी का व्रत 30 अगस्त को रखा जाएगा। माताएं इस व्रत को अपनी संतानों के उज्ज्वल भविष्य और उसकी सफल जीवन में सुख समृद्धि, स्वास्थ्य, यश-कीर्ति की मंगलकामना के लिए करती है।
क्या है दुबड़ी सातें
हिंदी पंचांग में हर तिथि, हर वार का अत्यधिक महत्व शास्त्रों में बताया गया है। उसी तरह ही भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को संतान सप्तमी और दुबड़ी सातें कहा जाता है इसी प्रकार भाद्रपद माह में आने वाली इस संतान सप्तमी का बड़ा अधिक महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, संतान सप्तमी के दिन माता दुबड़ी महारानी और शीतला माता की विधि-विधान पूर्वक पूजा-आराधना की जाती है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से व्रत करने से संतान का स्वास्थ्य, भाग्य और जीवन खुशियों से भर जाता है। रीवा के आचार्य नरोत्तम शास्त्री के अनुसार इस दिन गर्म खान-पान से परहेज़ करना चाहिए, माताओं को गेहूं के आंटे और गुड़ के पुआ बना कर उन्हें पूर्णतः ठंडा करके माता दुबड़ी को समर्पित करना चाहिए और फिर माता के साथ पुआ भी पूजें फिर सूर्यास्त के बात ठंडे दूध-दही के साथ पारण करें।

चांदी की चूड़ी का पूजन और महत्व
इस दिन चांदी की चूड़ी की विशेष पूजा होती है । यह तत्कालीन समय में बचत व संग्रह का एक सकारात्मक तरीका होता था। महिला वर्ष में एकबार अनिवार्य रूप से चांदी की चूड़ी खरीदतीं थी जिससे बाजार भी समृद्ध होते थे वहीं एक महिलाओं को एक ज़ेवर खरीदने का अवसर मिलता था। जबकि संतान सप्तमी को ठंडी चीजों का महत्व बताया गया है, जबकि चांदी, चंद्रमा का प्रतिनिधित्व करती है और चंद्रमा शीतलता का। इसलिए इस दिन सूर्य की नहीं बल्कि दिन में ही चांदी की चूड़ी को चंद्रमा का स्वरूप मानकर चूड़ी की पूजा होती है जिसे महिलाओं के पुआ के साथ दिया जाता है और वो इसे अगली संतान सप्तमी तक पहनती हैं।
संतान सप्तमी व्रत का महत्व
संतान सप्तमी व्रत संतान और उसकी मंगलकामना के लिए रखा जाता है। इस व्रत में गौरी-गणेश सहित माता दुबड़ी महारानी की विधिवत पूजा की जाती है। संतान सप्तमी के दिन की पूजा में गर्म चीजों का परहेज़ माना जाता है। संतान की सुख-समृद्धि के लिए इस व्रत को सबसे उत्तम माना जाता है मान्यता है कि इस दिन का व्रत करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है और संतान दीर्घायु होती है और उनके सभी दुखों का नाश होता है।
दुबड़ी महारानी का स्वरूप
दुबड़ी महारानी का उल्लेख संतान सप्तमी व्रत की कथाओं में जनश्रुतियों के आधार पर माना गया है जो माता संतान लक्ष्मी,माता पार्वती के स्वरूप मानकर कथा की बूढ़ी माई दुबड़ी महारानी की स्थापित कर पूजा जाता है। दुबड़ी महारानी को साफ पाटे पर पानी का पत्ता रखकर उसपर घी व सिंदूर से दुबड़ी महारानी की आकृति बनाई जाती है और उनसे ही संतान की रक्षा की महिलाएं प्रार्थना करतीं हैं।