शास्त्रीय संगीत का रॉकस्टार

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Ustad Vilayat Khan Birth Anniversary :सितार के महानायक कहे जाने वाले उस्ताद विलायत खाँ ऐसे सितारवादक थे जो अपनी बेबाकी के लिए भी याद किए जाते हैं अपने हुनर के लिए उनके दिल में शिद्दत और इज़्ज़त का इतना आला मुक़ाम था ,कि जब भारत सरकार ने उन्हें 1964 में पद्मश्री और 1968 में पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित करना चाहा तो उन्होंने ये कहकर ये सम्मान लेने से मना कर दिया कि भारत सरकार ने हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में उनके योगदान को सही समय पर सम्मानित नहीं किया गया फिर जनवरी 2000 में उन्हें फिर से देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था. लेकिन, इस बार भी उन्होंने कहा कि वो कोई भी ऐसा पुरस्कार स्वीकार नहीं करेंगे जो अन्य सितार वादकों को उनसे पहले मिल चुका हो।


आठ बरस की उम्र में की पहली रिकॉर्डिंग –

अब के बांग्लादेश में गौरीपुर जगह पर 1928 में पैदा हुए ,उस्ताद विलायत खाँ संगीतज्ञ परिवार से ताल्लुक रखते थे उनके वालिद प्रख्यात सितार वादक उस्ताद इनायत हुसैन ख़ाँ,थे जो जल्दी ही इस दुनिया से चले गए और उनके गुज़र जाने के बाद विलायत जी ने अपने नाना और मामू से सितार बजाना सीखा और महज़ आठ बरस की उम्र में पहली बार उनके सितारवादन की पहली रिकॉर्डिंग हुई ,भारत में उनका जीवन कोलकाता में गुज़रा लेकिन वो ज़्यादातर विदेश में ही रहते थे और उनका दूसरा घर न्यू जर्सी रहा।

उनकी पीढियाँ आज भी छेड़ रही हैं सितार के तार :-

उस्ताद विलायत खाँ ने पाँच दशकों से भी अधिक समय तक अपने सितार का जादू बिखेरा। उनकी पिछली कई पुश्तें सितार से जुड़ी रहीं और उनके पिता इनायत हुसैन ख़ाँ से पहले उस्ताद इमदाद हुसैन ख़ाँ भी जाने-माने सितारवादक थे। उस्ताद विलायत ख़ाँ के दोनों बेटे, शुजात हुसैन ख़ाँ और हिदायत ख़ाँ ,उनके भाई इमरात हुसैन ख़ाँ और भतीजे रईस ख़ाँ भी जाने माने सितार वादक हैं और उनकी ही तरह अपनी कला का परचम लहरा रहे हैं।

आज भी हैं उनकी बादशाहत बरक़रार:-

कई पीढ़ियों से चले आ रहे संगीत के इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए उस्ताद विलायत खान ने अपनी परंपरा को ऐसे ऊंचे मक़ाम पर पहुंचा दिया जहां उनकी संगीत की समझ या फिर सितार पर पकड़ का कोई सानी नहीं था।
ज़माना उनकी सितार की धुनों पे झूमने को मजबूर हो गया, देश ही नहीं विदेशों में भी लोग उनके हुनर के कायल हो गए।शास्त्रीय संगीत की दुनिया में आज भी उस्ताद विलायत खान की बादशाहत बरक़रार है।

“आफताब-ए-सितार” और “भारत सितार सम्राट”

जब भी शास्त्रीय संगीत की बात चलती है तो सितार का ज़िक्र ज़रूर होता है और सितार के साथ उस्ताद विलायत ख़ान का ज़िक्र लाज़मी तौर पर होता ही है क्योंकि उन्हें भारतीय शास्त्रीय संगीत की सबसे महान हस्तियों में से एक माना जाता है उन्होंने अपने सितार वादन में गायन शैली को अपनाते हुए अपनी एक अलग पहचान बनाई है, उनकी कला के कायल भारत के पांचवें राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद भी थे, जिन्होंने विलायत खान को “आफताब-ए-सितार” यानी “सितार का सूरज ” सम्मान दिया था, और उस्ताद विलायत ख़ान ये सम्मान पाने वाले एकमात्र सितार वादक बन गए थे ,इसके अलावा उन्हें ‘भारत सितार सम्राट’ की उपाधि भी प्राप्त हुई।

आज़ादी के बाद विदेश में शो करने वाले पहले कलाकार –

उस्ताद विलायत खाँ के बारे में एक बात ये भी मानी जाती है कि वो भारत के पहले ऐसे संगीतकार थे, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के बाद 1951 में इंग्लैंड जाकर अपना संगीत का कार्यक्रम पेश किया था । अपनी कला को पूरी पुर जोशी से दुनिया के सामने पेश करते हुए उन्होंने सितार को बुलंदियों पर पहुंचा दिया और अपनी धुनों से सबको मंत्र मुग्ध कर दिया पर एक दिन उनका सितार ख़ामोश हो गया। उन्हें फेफ़ड़े का कैंसर हो गया था ,जिसकी वजह से 13 मार्च 2004 को उन्होंने इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह दिया ,उनके वालिद उस्ताद इनायत हुसैन ख़ाँ के पास ही उन्हें दफनाया गया।

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