Rewa Diwali Utsav: विंध्य और बघेलखंड की धरती पर भी दीवाली अत्यंत उत्सवपूर्वक मनाई जाती रही है। सयाने लोग बताते हैं, पहले इसका स्वरूप आज से बहुत भिन्न था। आज जहाँ हर त्योहार पर बाज़ारवाद हावी है, वहीं पहले इसमें आत्मिक और सांस्कृतिक सादगी का अद्भुत मेल था। रीवा और विंध्य क्षेत्र में दीवाली पर्व से संबंधित सबसे प्रचलित कथा रामजी का लंका विजय के बाद अयोध्या आगमन था, चूंकि उस दिन अमावस्या की रात्रि थी, जिसके बाद नगरवासियों ने अपने प्रिय रामराजा के आगमन पर घरों में दीप जलाकर उनका स्वागत किया था, प्राचीन समय से ही यह क्षेत्र कौशल प्रांत से ही संबंधित था और इसे श्रीराम का सानिध्य भी प्राप्त था। इसीलिए बघेलखंड और रीवा की दीवाली पर सबसे ज्यादा प्रभाव अवध की संस्कृति का ही है।
दीवाली का इतिहास
प्रारंभिक काल में यह पर्व कृषि से संबंधित था, आगे चलकर व्यापार भी इसमे शामिल हो गया, अर्थात नई फसल के आगमन, भंडारण करने और नए बही-खातों के प्रारंभ से। साथ में यह पर्व राम जी के अयोध्या आगमन, यम-यमी पूजा, कुबेर, धन्वंतरि और लक्ष्मी-गणेश पूजन से भी जुड़ हुआ था। सम्राट हर्ष के नाटक नागानंद में इसे दीपप्रतिपदोत्सव कहा गया है, जबकि संस्कृत कवि राजशेखर ने अपने ग्रंथ काव्यमीमांसा में इसे दीपमालिका नाम से उल्लेखित किया है। यहाँ तक कि अलबेरूनी जैसे विदेशी यात्रियों ने भी अपने ग्रंथों में इस पर्व का विस्तृत वर्णन किया है। इसके साथ ही कई पुराणों में इससे संबंधित बहुत सारी कथाएं प्रचलित है।
दिवाली को बघेलखंड में क्या कहा जाता था
जीतन सिंह की किताब रीवा राज्य दर्पण में उल्लेख मिलता है, कि बघेलखंड में दीवाली को “दिया-दीवारी” कहा जाता था। और तब इसे मुख्यतः व्यापारियों का त्योहार माना जाता था, क्योंकि इस दिन वे अपने नए बही-खाते प्रारंभ करते थे। कायस्थ वर्ग के लोग कलम-पूजन करते थे। आज की तरह उस समय घरों में लक्ष्मी-गणेश की पूजा प्रचलित नहीं थी, लेकिन दीपोत्सव की परंपरा उतनी ही प्राणवान थी। लक्ष्मी गणेश पूजन के साथ ही धन-तेरस, भाई-दूज और गोवर्धनपूजा जैसे त्योहार यहाँ प्रचलित नहीं थी।
रीवा में कैसे मनाई जाती थी दीवाली | Rewa Diwali Utsav
खैर धार्मिक रीति-रिवाज भले ही आज से भिन्न रहा हो, लेकिन दीपोत्सव पर्व बड़े उत्साह से यहाँ मनाया जाता था।
यहाँ कार्तिक मास के प्रारंभ के साथ ही घरों में मिट्टी के दीपक जलने लगते थे। पूरे घर की सफाई, छुही-गोबर से लिपाई-पुताई की जाती थी। कार्तिक अमावस्या की रात दीपक केवल घरों में ही नहीं, बल्कि कुआँ-तालाब, गौशाला, देवालय और ग्राम-देवताओं के स्थानों पर भी जलाए जाते थे। पहला दीपक देवताओं के नाम से प्रज्वलित होता था और अंतिम दीपक घूरे अर्थात कचरे के ढेर पर जलाया जाता था। सुबह बाकी दीपक इकट्ठे कर लिए जाते थे, लेकिन घूरे वाला दीप वहीं रहने दिया जाता था, यह मान्यता थी कि वह नकारात्मकता और अंधकार को अपने साथ ले जाता है।
चित्रकूट में दीपदान की महिमा
बघेलखंड में कातिक अमावस के दिन अर्थात दीवाली के दिन दीपदान भी किया जाता है, इसी परिप्रेक्ष्य में चित्रकूट में देशभर से लोग दीपदान करने के लिए आते हैं। मान्यता है भगवान राम ने मंदाकिनी नदी में पितरों के तर्पण स्वरूप दीपदान किया था, तभी से दीपदान करने का प्रारंभ हो गया। बताया जाता है रीवा में भी राजशाही के जमाने से ही कई घाटों में दीपदान किया जाता था, रीवा किले को दीपमालाओं से सजाया जाता था, राज्याधिकारी राजकोष और लिपिक वर्ग ग्रंथों का पूजन किया करते थे।
सूरन की सब्जी का महत्व
बघेलखंड में दीवाली के दिन सूरन के पकवान जैसे- कढ़ी, आचार, चटनी और मसलहा इत्यादि बनाने की प्रथा थी, जो आज बिल्कुल लुप्त हो चुकी है। दरसल सूरन लंबी अवधि की कंद होती है, जिसे एक बार गाड़ा जाता था, तो उसे साल-दो साल बाद ही खोदा जाता है। इसी लंबी अवधि के कारण लोग यह भूल जाते हैं इसे कहाँ पर रखा गया था, इसीलिए बरसात के बाद जब कंद के ऊपर पौधे आते हैं, तभी स्थान की पहचान होती थी। इसीलिए चूंकि सूरन की खुदाई इसी समय होती थी, इसीलिए उससे संबंधित पकवान भी इसी समय कातिक के महीने में दीवाली के समय बनाए जाते थे। सूरन स्वाद में बड़ा स्वादिष्ट होता है पर थोड़ा खुजली देने वाला कंद होता है, इसीलिए इसे बिही के पत्तों के साथ पहले उबाला जाता था, फिर पकवान बनाए जाते थे। हालांकि अवध प्रांत से अलग यहाँ उसके मसलहे से ज्यादा कढ़ी खाई जाती है।
उड़द दाल का बरा
लेकिन यहाँ पर दीवाली के दिन सबसे ज्यादा महत्व उड़द की दाल का बरा का था। पहले के समय में कहते हैं दीवाली के दिन तवा नहीं चढ़ता था, माने रोटी नहीं खाते थे, बल्कि उर्दा की दाल का बरा बनाया जाता था. यहाँ कहते भी थे-
“अरसी के तेल, खरखसी के बरा, जे ना खाय दिवारी का बरा उया काहे का अउतरा”
अर्थात अरसी के तेल के साथ बने उर्दा के दाल के बरे जो दीवाली में नहीं खाता, उसका जन्म लेना ही एकदम व्यर्थ है।
दीवाली में जागरण की प्रथा
सयाने बताते हैं पहले यहाँ दीवाली जगाने की प्रथा होती थी, संभवतः दीवाली जगाने से तात्पर्य इस रात्रि में देर तक जगना होता रहा होगा। इसीलिए यहाँ पर पहले दीवाली की रात में कौड़ी-चन्दा खेलने की प्रथा थी, जो मुख्यतः स्त्रियों द्वारा खेला जाता था, जब कि पुरुष समाज द्वारा पाँसा खेला जाता था, इसको खेलने की भावना शायद मनोरंजन रही होगी, लेकिन आज के समय में यह जुआ के कुप्रथा के रूप में प्रचलित हो गया है, जो समाज के लिए अत्यंत घातक है। कहा जाता है कई आदिम समुदायों द्वारा जागरण कर्मा, शैला इत्यादि लोकनृत्य करके और गीतों को गाकर भी किया जाता था।
दीवाली के दिन अनुमान की धारणा
बघेलखंड की लोकसंस्कृति में दीवाली के दिन के अनुमान की एक धारणा प्रचलित है, कहावत के रूप में कहा जाता है- “जेहिं दिन नाग नहाए, ओहीं दिन तीज दीवारी फाग।” अर्थात जिस दिन नागपंचमी होती है, उसी दिन तीजा, दिवाली और होली का पर्व भी यहाँ मनाया जाता है। हालांकि सटीक रूप से यह धारणा सत्य हो, ऐसा बिल्कुल नहीं है, लेकिन फिर भी अनुमानतः ऐसा हो जाता है। अब देखिए इस वर्ष ही नागपंचमी 29 जुलाई मंगलवार को था, इसी तरह तीज भी 26 अगस्त को मंगलवार के दिन ही है, हालांकि दीवाली पर 20-21 को लेकर विद्वानों में मतभेद है, इसीलिए दीवाली इस वर्ष कहीं-कहीं मंगलवार को भी मनाई जा रही है, इसी तरह इस हिंदू नववर्ष में पड़ने वाला होली पर्व भी इस वर्ष 3 मार्च मंगलवार के दिन है।
दीवाली की दार्शनिकता
यह पर्व कार्तिक मास की अमावस्या की रात्रि को मनाया जाता है, और चूंकि यह रात्रि वर्ष की सबसे स्याह रात मानी जाती है, इसलिए इसे महारात्रि भी कहा गया है। शायद इसी कारण इस रात्रि के अंधकार को दूर करने के लिए हमारे पुरूखों ने दीपोत्सव की शुरुआत की होगी। इसी तरह अपने संसार रूपी जिंदगी में कलुषित अंधकारों को दूर करने के लिए, मन रूपी घर के अंदर विचारों का एक दीपक हमें जलाना चाहिए, प्रकाश चाहे थोड़ा सा ही हो, अंधेरे को चीरेगा जरूर।

