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यमुना प्रसाद शास्त्री: वह नेत्रहीन जननायक जिसने रीवा के राजा-रानी को हराया

Yamuna Prasad Shastri Biography Hindi Mein: भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में विंध्यक्षेत्र के राजनैतिक परिदृश्य में एक ऐसे अद्वितीय और विरल नक्षत्र का उदय हुआ, जिनका जीवन संघर्ष, सत्य-अहिंसा, सुचिता और सर्वहारा वर्ग के हितों के प्रति पूर्णतः समर्पित था। नेत्र विहीन होने के बाद भी उन्हें अपनी विशाल दूरदृष्टि,अदम्य जनसंघर्ष, वैचारिक प्रतिबद्धता और जनसेवा के प्रति अटूट निष्ठा ने उन्हें ऐसा जनाधार दिया, जिसके बल पर दो लोकसभा चुनावों में उन्होंने क्रमशः रीवा राजपरिवार के प्रभावशाली महाराज और महारानी को भी पराजित करके ऐतिहासिक चुनावी जीत दर्ज की। हम बात कर रहें दिग्गज समाजवादी नेता और रीवा से दो बार सांसद रहे पंडित यमुना प्रसाद शास्त्री की। लोकतंत्र के प्रबल समर्थक शास्त्री जी का सम्पूर्ण जीवन सामाजिक-समरसता, वंचित तबके के उत्थान और सत्ता के प्रति निर्लिप्तता को समर्पित रहा है।

यमुना प्रसाद शास्त्री का जीवन परिचय | Yamuna Prasad Shastri Biography

यमुना प्रसाद शास्त्री का जन्म 12 जून 1927 को तब के रीवा रियासत के मनगवां के सूरा गाँव में हुआ था। जो वर्तमान में रीवा जिले की सेमरिया तहसील के अंतर्गत आता है। उनके पिता पंडित विंध्येश्वरी प्रसाद पौराणिक तथा माता सुशीला देवी थीं। दुर्भाग्यवश जब वे मात्र ढाई-तीन वर्ष के थे, तभी उनकी माता का निधन हो गया। इसके बाद उनका पालन-पोषण और संस्कारों का दायित्व उनके पिता ने ही संभाला। उनकी प्रारंभिक शिक्षा समीप के धवैया गाँव के विद्यालय में हुई। तीसरी कक्षा से आगे की पढ़ाई के लिए वे मनगवां चले गए। विद्वानों के परिवार से होने के कारण उनके पिता चाहते थे कि वे संस्कृत की शिक्षा ग्रहण करें, किंतु बाल्यकाल से ही यमुना प्रसाद की रुचि आधुनिक शिक्षा और अंग्रेजी अध्ययन में थी। वे रीवा जाकर पढ़ना चाहते थे। जब पिता ने उन्हें रीवा भेजने से इंकार कर दिया, तो उन्होंने दृढ़ निश्चय के साथ अनशन शुरू कर दिया और खाना-पीना छोड़ दिया। अंततः पिता को उनकी जिद के आगे झुकना पड़ा और उन्हें रीवा भेजना पड़ा। तो एक तरह से देखा जाए तो शास्त्री जी ने अपना पहला अनशन अपने पिता के विरुद्ध ही किया। यद्यपि उन्होंने अपनी माध्यमिक स्तर की शिक्षा रीवा के एमवीएम स्कूल से प्राप्त की, परंतु बाद में उन्होंने संस्कृत विद्यालय उपरहटी और बिछिया से स्नातक की पढ़ाई की, जिसके बाद उनके साथ शास्त्री उपाधि जुड़ गई। इसके पश्चात उन्होंने रीवा के सुप्रसिद्ध दरबार कॉलेज से राजनीति शास्त्र में एमए की शिक्षा भी प्राप्त की।

भारत छोड़ो आंदोलन से राजनैतिक जीवन का प्रारंभ

यमुना प्रसाद शास्त्री का राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता किशोरावस्था में छात्र जीवन से ही प्रारंभ हो गई थी। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तथा रीवा रियासत के राजा बहोरा आंदोलन के दौरान, जब अधिकांश वरिष्ठ नेता गिरफ्तार कर लिए गए थे, तब उन्होंने अपने साथियों के साथ छात्रों और युवाओं का नेतृत्व संभाला। पद्मधर सिंह की शहादत के बाद उग्र हुए आंदोलनों में पुलिस दमन, लाठीचार्ज और गिरफ्तारियों के दौरान शास्त्री जी स्वयं गंभीर रूप से घायल हुए, लेकिन उसके बाद भी वह लगातार संघर्ष करते रहे। 1946 में वे जगदीश चंद्र जोशी, श्रीनिवास तिवारी और अन्य युवा साथियों के साथ कांग्रेस सोशलिस्ट दल में शामिल हुए तथा भूमिहीन किसानों और मजदूरों के अधिकारों के लिए पूरे रीवा राज्य में पैदल भ्रमण करते हुए आंदोलन करने लगे।

विंध्य आंदोलन में हुए शामिल

1949 के पटना में सोशलिस्ट सम्मेलन से लौटने के बाद उन्होंने विंध्यप्रदेश के विलय के विरोध में चले समाजवादी आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई, जिसके कारण उन्हें अपने साथियों सहित जेल भी जाना पड़ा। लगभग दो माह तक मैहर जेल में निरुद्ध रहने के बाद उनकी रिहाई जिस दिन हुई, उसी दिन रीवा में किसान हिंद पंचायत का राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित था। जेल से सीधे सम्मेलन में पहुँचे शास्त्री जी का स्वागत करते हुए जेपी ने “जमुना, जोशी, श्रीनिवास” का नारा बुलंद किया, जिसके उत्तर में जनता द्वारा जिंदाबाद-जिंदाबाद के गगनभेदी नारों से निपनिया मैदान गूंज उठा था। यह पल यमुना प्रसाद शास्त्री के संघर्षशील जीवन के साथ ही विंध्य के समाजवादी आंदोलन का भी एक ऐतिहासिक अध्याय है।

प्रारंभिक चुनावों में मिली असफलता

फिर आया वर्ष 1952, जब देश में पहली बार विधानसभा चुनाव आयोजित हुए। शास्त्री जी सोशलिस्ट दल के उम्मीदवार के रूप में सिरमौर विधानसभा क्षेत्र से मैदान में उतरे। उनके सामने विंध्य में कांग्रेस की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ नेता हारौल साहब नर्मदा प्रसाद सिंह थे। सीमित संसाधनों के बावजूद शास्त्री जी ने उन्हें कड़ी टक्कर दी, किन्तु यह चुनाव वे हार गए। 1957 के चुनाव में भी सिरमौर विधानसभा से उन्हें महज कुछ वोटों से कांग्रेस प्रत्याशी चंपा देवी से उन्हें हार का सामना करना पड़ा था, लेकिन फिर भी उन्होंने संघर्ष का मार्ग नहीं छोड़ा। अंततः 1962 के विधानसभा चुनाव में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर वे सिरमौर विधानसभा से विधायक निर्वाचित हुए। इसके बाद लगभग एक दशक तक उन्होंने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए जनसेवा और जनसंघर्ष की अपनी परंपरा के साथ आगे बढ़ते ही रहे।

गोवा मुक्ति आंदोलन में शास्त्री जी की सक्रिय भूमिका

वर्ष 1955 में हुए गोवा मुक्ति आंदोलन के दौरान शास्त्री जी ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई। विंध्य क्षेत्र से जो 19 सदस्यीय सत्याग्रही दल गोवा की स्वतंत्रता के समर्थन में रवाना हुआ था, उसका नेतृत्व चंद्रप्रताप तिवारी के साथ यमुना प्रसाद शास्त्री कर रहे थे। यह दल सशोली मार्ग से गोवा में प्रवेश करने का प्रयास कर रहा था। पुर्तगाली पुलिस की कड़ी निगरानी और दमन के कारण अधिकांश सत्याग्रही आगे नहीं बढ़ सके, लेकिन दृढ़ संकल्प और अदम्य साहस के साथ शास्त्री जी लगातार आगे बढ़ते रहे। इस दौरान वे पुर्तगाली पुलिस की बर्बर लाठीचार्ज का शिकार हुए। उनके एक हाथ की हड्डी टूट गई और वे गंभीर रूप से घायल हो गए। बाद के वर्षों में उनकी दाहिनी आँख की रोशनी भी इसी चोट के कारण चली गई।

लोकसभा चुनावों में रीवा के राजा-रानी को हराया

दो बार विधायक रहने के साथ-साथ यमुना प्रसाद शास्त्री दो बार रीवा लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए सांसद भी निर्वाचित हुए। पहली बार वर्ष 1977 मेंआपातकाल की समाप्ति के बाद उन्होंने लोकदल के टिकट पर रीवा के पूर्व शासक और लोकप्रिय महाराज मार्तंड सिंह को हराकर लोकसभा पहुंचे। उनके इस जीत की चर्चा भारत ही नहीं, बीबीसी जैसी ग्लोबल मीडिया में भी हुया जब एक नेत्रहीन रंक ने राजा को पराजित किया। इसके बाद वर्ष 1989 में उन्होंने जनता दल के टिकट पर रीवा राज्य की पूर्व महारानी प्रवीण कुमारी को बड़े मतों के अंतर से हराकर दूसरी बार सांसद बने। 1977 के चुनाव में महराज साहब द्वारा शास्त्री जी की आर्थिक मदद करने के किस्से भी खूब सुनाए जाते हैं, हालांकि शास्त्री जी के शिष्य और करीबी सहयोगी रहे वृहस्पति सिंह इस किस्से को गलत बताते हैं।

विंध्य के विकास का स्वप्नद्रष्टा

सांसद रहते हुए शास्त्री जी ने विंध्य के विकास के लिए बाणसागर परियोजना की नींव रखने, ललितपुर सिंगरौली रेलवे लाइन की पहल को आगे बढ़ाने और गुढ़ के जंगलों में फायरिंग रेंज बंद करवाने में उन्होंने अथक प्रयास करते हुए न केवल संसद में आवाज उठाई, बल्कि जमीनी स्तर पर भी निरंतर संघर्ष किया। इसके अतिरिक्त सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, काम का अधिकार और खाद्य सुरक्षा जैसे जनकल्याणकारी अधिकारों की मूल अवधारणा भी उन्होंने बहुत पहले सांसद रहते हुए संसद में अशासकीय संकल्पों के माध्यम से प्रस्तुत की थी। बाद के वर्षों में कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के समय यही संकल्प राष्ट्रीय नीतियों और कानूनों का आधार बने। आप सोचिए शास्त्री जी कितने दूरदर्शी, जनहितैषी और आम लोगों के अधिकारों के प्रति समर्पित नेता थे। वे केवल तत्कालीन समस्याओं तक सीमित नहीं रहे, बल्कि ऐसे विचार और नीतियाँ सामने रखीं, जो सालों बाद भी देश के करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कानूनों का आधार बनीं।

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की जीवंत मिसाल थे शास्त्री जी

यमुना प्रसाद शास्त्री वास्तव में “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को जीने वाले व्यक्ति थे। रीवा में उनके निवास का नाम भी उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ रखा था। उनके लिए जाति-धर्म, क्षेत्र और सीमाओं से ऊपर मानवता ही सबसे बड़ा संबंध थी। यही कारण था कि उनका पैतृक गृह ग्राम सूरा, आपातकाल के दौरान भूमिगत रहकर संघर्ष करने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं की शरणस्थली बना। रीवा के वरिष्ठ पत्रकार जयराम शुक्ल के अनुसार, 1974-75 के दौर में नेपाल के प्रमुख नेता गिरिजा प्रसाद कोइराला के परिवार ने भी उनके घर में आश्रय लिया था। वहीं समाजवादी कार्यकर्ता और शास्त्री जी के प्रिय शिष्य वृहस्पति सिंह के अनुसार, चर्चित बड़ौदा डायनामाइट केस के बाद जॉर्ज फर्नांडीज भी कुछ समय तक उनके घर में भूमिगत रहे थे। संयोगवश, आपातकाल लागू होने के समय शास्त्री जी अपनी आँखों का उपचार करा रहे थे, क्योंकि उनकी दूसरी आँख की रोशनी भी प्रभावित हो रही थी। इसी कारण उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई, लेकिन बीमारी की अवस्था में भी वे निष्क्रिय नहीं थे, उन्होंने निरंतर लोकतंत्र की रक्षा और आपातकाल के विरोध में सक्रिय भूमिका निभाई तथा अपने संघर्षरत साथियों का मनोबल बढ़ाते हुए उनकी यथायोग्य मदद करते रहे।

शास्त्री जी को नहीं था सत्ता का लोभ

यमुना प्रसाद शास्त्री को राजनीति का संत कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। सत्ता और पद के प्रति उनमें अद्भुत निर्लिप्तता का भाव था। वे मानते थे कि जनता की सेवा दफ्तरों और सत्ता के गलियारों से अधिक, लोगों के बीच रहकर की जा सकती है। यही कारण था कि उन्होंने जीवन में कई अवसर मिलने के बावजूद सत्ता-सुख को ठुकराकर संघर्ष और जनसेवा का मार्ग चुना। पहली बार वर्ष 1967 में, जब गोविंद नारायण सिंह के नेतृत्व में संविद सरकार बनी, तब उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल होने का प्रस्ताव मिला। लेकिन शास्त्री जी ने मंत्री पद स्वीकार करने के बजाय जनसंघर्षों के साथ खड़े रहना अधिक उचित समझा। इसके बाद दूसरी बार 1991 में चंद्रशेखर के नेतृत्व में केंद्र सरकार बनने पर उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने का आग्रह किया गया, किंतु उन्होंने इस अवसर को भी विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया। पद और प्रतिष्ठा से ऊपर जनहित को रखने वाली यही भावना उन्हें अपने समय के अन्य नेताओं से अलग बनाती थी। यहाँ तक कि 1977 में जनता पार्टी की मध्यप्रदेश इकाई के अध्यक्ष रहने के बावजूद सत्ता और पद का मोह उन्हें कभी नहीं छू सका। वे संघर्ष और जनसेवा को ही राजनीति का उद्देश्य मानते रहे।

जीवनभर समाजवाद के पथ पर अडिग रहे शास्त्री जी

यमुना प्रसाद शास्त्री केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि एक प्रतिबद्ध समाजवादी चिंतक भी थे। वे “शोषितोदय” नामक समाचार पत्र का प्रकाशन करते थे, जिसके संपादक और प्रकाशक स्वयं थे। जीवनभर उन्होंने समाजवादी विचारधारा को न केवल अपनाया, बल्कि उसे अपने आचरण में भी उतारा। जब उनके अधिकांश साथी समय के साथ कांग्रेस और अन्य दलों में चले गए, तब भी वे अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे। हालाँकि, समाजवादी राजनीति में बढ़ती अवसरवादिता और सत्ता-केंद्रित प्रवृत्तियों से निराश होकर उन्होंने वर्ष 1996 में कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ग्रहण की और उसी के टिकट पर रीवा लोकसभा का चुनाव लड़ा, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। इससे पहले वर्ष 1991 में जनता दल के उम्मीदवार के रूप में भी वे रीवा लोकसभा चुनाव में चौथे स्थान पर रहे थे। बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में सिद्धांत, संघर्ष और वैचारिक प्रतिबद्धता की राजनीति लगातार हाशिये पर जा रही थी, और शायद यही कारण था कि जनसंघर्षों से निकला यह नेता चुनावी सफलता से दूर होता गया।

जनसंघर्ष के प्रतीक थे शास्त्री जी

चुनावी सफलताएँ भले ही उन्हें नहीं मिल रही थीं और बढ़ती उम्र के कारण उनका स्वास्थ्य भी लगातार कमजोर पड़ने लगा था। लेकिन शोषितों, पीड़ितों, मजदूरों और आदिवासियों के अधिकारों के लिए उनका संघर्ष कभी नहीं रुका। वे हमेशा जनहित के किसी न किसी मुद्दे को उठाते, आंदोलन करते और आवश्यकता पड़ने पर अनशन पर भी बैठ जाते थे। कई बार उपवास से उनकी तबीयत बिगड़ जाती, तब साथी और सहयोगी उन्हें ऐसा न करने की सलाह देते। इस पर वे नाराज होकर कहते थे- “अगर मेरे भूखे रहने से पाँच लोगों के घर का चूल्हा जलता है, तो मैं ऐसा अनशन बार-बार करूंगा।” दरअसल, शास्त्री जी के अनशन पर बैठते ही शासन-प्रशासन हरकत में आ जाता था। जरूरतमंदों तक अनाज पहुँचाया जाता, काम देने की व्यवस्था बनाई जाने लगती थीं और समस्याओं के समाधान के प्रयास तेज हो जाते थे। अपने अदम्य संकल्प और जुझारू प्रवृत्ति के कारण वे भारतीय राजनीति के उन विरले नेताओं में थे, जिनके लिए सिद्धांत और जनहित किसी भी पद या शक्ति से बड़े थे। वे जो ठान लेते, उसे पूरा करने के लिए अंत तक डटे रहते, चाहे साथ में कोई हो या न हो। इसी जुझारू स्वभाव का उदाहरण झगड़ाखाड़ कोयलरी मजदूरों की समस्याओं को लेकर सरगुजा से दिल्ली तक शुरू किया गया उनका पैदल मार्च था, जिसे रास्ते में तब रोका गया जब केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों ने उनकी माँगें स्वीकार किए जाने की सूचना दी। जीवन के अंतिम वर्षों में भी, खराब स्वास्थ्य के बावजूद, वे सिंगरौली के एक गरीब परिवार को न्याय दिलाने के लिए भोपाल तक पैदल मार्च पर निकल पड़े थे। यही समर्पण उन्हें एक असाधारण जननेता के रूप में स्थापित करता था।

डब्ल्यूटीओ के विरोध में भी सक्रिय शास्त्री जी

जब प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने भारत को डबल्यूटीओ यानि विश्व व्यापार संगठन में शामिल करने का निर्णय लिया, तब कई विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया। इसी क्रम में 5 अप्रैल 1994 को मार्क्सवादी दलों ने दिल्ली में संसद मार्च आयोजित किया, जिसमें देशभर से लाखों कार्यकर्ता शामिल हुए। उस समय दोनों आँखों की दृष्टि खो चुके और अस्वस्थ होने के बावजूद शास्त्री जी भी इस आंदोलन में शामिल होने के लिए दिल्ली पहुँचे। कुछ रिपोर्टों के अनुसार, प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने बल प्रयोग किया, जिसमें शास्त्री जी भी घायल हो गए। यह घटना उनके संघर्षशील व्यक्तित्व और जन आंदोलनों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

असाधारण थे यमुना प्रसाद शास्त्री

लेकिन अटूट इच्छाशक्ति और अदम्य संघर्षशीलता के बावजूद उनका शरीर अब लगातार उनका साथ छोड़ रहा था। दोनों आँखों की रोशनी पहले ही जा चुकी थी और उन्हें कई बार सर्जरी से भी गुजरना पड़ा था। बढ़ती उम्र और अस्वस्थता के बावजूद उन्होंने जनसेवा और संघर्ष का मार्ग नहीं छोड़ा। आखिरकार 20 जून 1997 को विंध्य की धरती ने अपने उस कर्मयोगी, समाजवादी चिंतक और जननायक को खो दिया, जिसने अपना पूरा जीवन शोषितों, वंचितों और आमजन के अधिकारों के लिए समर्पित कर दिया था। उनके निधन के साथ एक युग का अंत हो गया, लेकिन उनके संघर्ष, सिद्धांत और जनसेवा की विरासत आज भी विंध्य के लोगों की स्मृतियों में जीवित है। यमुना प्रसाद शास्त्री भले ही इस दुनिया से विदा हो गए, किंतु जनहित के लिए समर्पित उनका जीवन आज भी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। बाकौल जयराम शुक्ल यमुना प्रसाद शास्त्री के व्यक्तित्व पर अल्बर्ट आइंस्टीन द्वारा महात्मा गांधी के लिए कही गई प्रसिद्ध टिप्पणी अक्षरशः चरितार्थ होती है- “आने वाली पीढ़ी शायद ही इस बात पर यकीन करे कि भारत में हाड़-मांस का ऐसा भी कोई सख्स था, जिसकी अहिंसक हुंकार से सत्ताएं हिल जाया करती थी।” कहना अनुचित न होगा कि शास्त्री जी भी ऐसे जननायक थे, जिनकी अहिंसक हुंकार और जनसंघर्षों से सत्ता के गलियारों में भी हलचल होने लगती थी।

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