Rewa Chawal Andolan Ki Kahani | स्वतंत्रता संग्राम की 1857 की क्रांति में ठाकुर रणमतसिंह की शहादत और डभौरा के जागीरदार रणजीत राय दीक्षित का अंग्रेजी फौज से मुकाबला तो इतिहास के पन्नों पर स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है लेकिन अंग्रेज हुक्मरानों के खिलाफ किसानों के एक आंदोलन को इतिहास में वो जगह नहीं मिल पाई जिसके वह हकदार हैं।
इसे लोग चावल आंदोलन के नाम से जानते हैं जिसमें दो किसान नेता शहीद हुए थे। क्या था चावल आंदोलन और वे शहीद कौन थे? नई पीढ़ी को यह सब बताया जाना जरूरी है।
वर्ष 1947 का आरंभ हो चुका था, प्रारंभिक महीना चल रहा था, ब्रिटिश सरकार भारत से जल्द से जल्द अपनी वापसी चाहती थी, भारत में ग्रीष्म ऋतु का आगमन होने वाला था, साथ ही साथ देश में राजनैतिक सरगर्मी भी खूब थी। जहाँ एक तरफ आज़ादी का सूर्योदय होने वाला था, वहीं साथ में बंटवारे रूपी घने काले बादल भी छा रहे थे, जो सूर्योदय की लालिमा को कुछ स्याह कर रहे थे।
लेकिन उसी समय देश के मध्य स्थित रीवा रियासत में ‘चावल वसूली आंदोलन’ चल रहा था, बघेली भाषा में इसे “चाउरहैवा” आंदोलन भी कहा जाता था, इस आंदोलन की गूंज सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में भी सुनाई दी थी। आखिर क्या था ये चावल वसूली आंदोलन? और यह क्यों हुआ था आइये विस्तार से जानते हैं
Rewa Rice Movement | रीवा चावल आंदोलन की कहानी | Rice Andolan | Rewa MP | Rewa Farmers
जिस समय देश में आज़ादी की बात चल रही थी, उस समय रीवा के शासक महाराज मार्तण्ड सिंह जी थे, जिन्हें कुछ समय पहले ही ब्रिटिश सरकार ने राजा बनाया था, उनके पिता महाराज गुलाब सिंह को ब्रिटिश सरकार ने झूठे षड़यंत्र और अभियोग द्वारा राजच्युत और रियासत से निर्वासित कर दिया था, जिसके कारण उन्हें मुंबई में रहना पड़ रहा था।
महाराज मार्तंड सिंह शासक तो बन गए थे। लेकिन वास्तविक शक्ति एक मंत्रिमंडल के पास थी, जिसके प्रधानमंत्री थे, श्री टी. सी. एस. जयरत्नम, वे रीवा रियासत में केंद्रीय ब्रिटिश सरकार के राजनैतिक प्रतिनिधि भी थे, मंत्रिमंडल के बाकी मंत्री रीवा रियासत के ही थे, लेकिन उनमें भी पवाईदारों की संख्या ज्यादा थी।