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रीवा में ‘स्मरण तानसेन’ FT. जयराम शुक्ल

Jayram ShuklaJayram Shukla

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Author: Jayram Shukla | तानसेन समारोह के अन्तर्गत रीवा में पांच दिसंबर को संगोष्ठी व संगीत सभा होने जा रही है। तानसेन समारोह का यह शताब्दी वर्ष है जो कि निरंतर ग्वालियर में आयोजित होता आया है। मुख्य समारोह 15 से 19 दिसंबर तक यहीं होगा।

मुझ समेत बहुत से संगीत प्रेमियों और कलाधर्मियों के लिए हमेशा से यह अचरज का विषय बना रहा कि संगीत सम्राट तानसेन की ख्याति रीमा राज्य के बांधवगढ़ दरबार से जुड़ी रही है और ध्रुपद के घराने का जहां उद्भव हुआ वहां तानसेन समारोह क्यों नहीं होता। ग्वालियर तो संगीत सम्राट की जन्मस्थली है लेकिन साधना स्थली तो बांधवगद्दी दरबार है।

मैंने यही सवाल कभी पं.कुमार गंधर्व व पं.जसराज जी से साझा किया था। पंडित जसराज जी जिनके पारिवारिक घराने का संबंध रीवादरबार से रहा, आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा था- ‘भिन्डी बाजार के नाम से संगीत घराना है कमाल है कि रीवा की संगीत परंपरा की कोई सुस्पष्ट पहचान नहीं बन पाई, तानसेन के बाद ख्याल गायकी के आदि गायक बड़े मोहम्मद खां साहब महाराज विश्वनाथ सिंह की दरबार में थे’ पंडित जी ने ध्रुपद की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले पं. कन्हैयालाल बांधवीय व पं.मदनगोपाल तिवारी के भी नाम का उल्लेख किया।

आज पंडित मदनगोपाल तिवारी जी का पुण्य स्मरण करना चाहूंगा जिन्होंने अपने पौरुष के दम पर बरसों -बरस रीवा में ग्वालियर के समानांतर ‘तानसेन समारोह’ का आयोजन किया। वृत्ति से प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक तिवारी जी इस आयोजन के लिए वर्षभर अपनी झोली फैलाकर ‘भिक्षा’ मांगते थे। कलाप्रेमी व संस्कृतिपुरुष से विशेषणयुक्त अर्जुन सिंह जी के समक्ष भी तिवारी जी ने कई बार ‘भिक्षा-रटन’ किया पर मध्यप्रदेश के ‘संवेदनशील’ नेता को भी बांधव दरबार के तानसेन का ख्याल कभी न आया।

मुझे याद है कि पं.मदनगोपाल तिवारी जी की मृत्यु के पूर्व अंतिम आयोजन मेडिकल कालेज के सभागार में हुआ था जिसमें सुजाता महापात्र का ओडिसी नृत्य व डा.हलीम जाफर खान साहब का सितार वादन हुआ था। 89-92 के बीच यहां एक कलाप्रेमी प्राशासनिक अधिकारी थे डा.अजीत रायजादा। संभाग का कमिश्नर व सुधार न्यास का चेयरमैन रहते हुए उन्होंने तानसेन के स्मरण को स्थायी बनाने के लिए एक व्यवसायिक परिसर का नाम तानसेन काम्प्लेक्स रख दिया। शिल्प व म्यूरल आर्ट के ख्यात कलाकार सत्येन्द्र बावनी से काम्प्लेक्स के प्रवेश द्वार को ‘विन्ध्य और तानसेन’ की थीम पर चित्रकारी करवाई।

इन सबके बावजूद हमारे ‘तानसेन’ मुद्दे में कभी रहे ही नहीं। मैं कृतज्ञ हूं मध्यप्रदेश के संस्कृति विभाग के उस अधिकारी का जिसके मन में यह विचार आया कि रीवा के बिना तानसेन का स्मरण आधा-अधूरा है। समारोह 5 दिसंबर को माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के रीवा परिसर के लाल बल्देव सिंह सभागार में सायं 5 बजे से रखा गया है। समारोह में संगोष्ठी और ध्रुपद गायन होगा। यद्यपि इस आयोजन की सूचना एक दिन पूर्व ही प्रकाश में आई लेकिन एक प्रतीक्षित शुरुआत हुई यह महत्वपूर्ण है। अगले वर्ष से यह भव्य स्वरूप में हो इसके लिए मिलकर कोशिश करेंगे..!

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