देशभर में जहां विजयादशमी के पावन पर्व पर बुराई के प्रतीक रावण के पुतले का दहन किया जाता है, वहीं मध्य प्रदेश के सतना जिले के कोठी कस्बे में इसके बिल्कुल विपरीत एक अनोखी परंपरा निभाई जाती है। यहां दशहरे के दिन रावण का पुतला जलाने की बजाय उसकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। कोठी के थाना परिसर में स्थापित दशानन की प्राचीन प्रतिमा के सामने श्रद्धालु डीजे और ढोल-नगाड़ों के साथ एकत्रित होते हैं और श्रद्धाभाव से नमन करते हैं। यह अनूठी परंपरा कोई साल-दो साल पुरानी नहीं, बल्कि 260 साल से भी अधिक पुरानी है जिसे लगातार पांच पीढ़ियों से पूरी निष्ठा के साथ निभाया जा रहा है।
इस प्राचीन परंपरा को सहेजने और आगे बढ़ाने में स्थानीय लोगों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है। कोठी निवासी 57 वर्षीय रमेश मिश्रा पिछले 39 सालों से निरंतर रावण की पूजा करते आ रहे हैं। उनका परिवार गौतम गोत्र से ताल्लुक रखता है, जिसे रावण का गोत्र भी माना जाता है। हर साल दशहरे के दिन रमेश मिश्रा अपने सहयोगियों के साथ घर से विशेष पूजा की थाली लेकर थाने के परिसर में पहुंचते हैं और वहां विराजमान रावण की प्रतिमा की आराधना करते हैं।
पूजा की इस अनूठी प्रक्रिया के दौरान रावण की प्राचीन प्रतिमा को सबसे पहले जल से स्नान कराया जाता है। इसके पश्चात उन्हें जनेऊ, चंदन, दीपक और अगरबत्ती अर्पित की जाती है। पूरी श्रद्धा के साथ आरती संपन्न होने के बाद वहां मौजूद सभी श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया जाता है।
स्थानीय लोग रावण को किसी बुराई के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि एक महान विद्वान, प्रकांड तपस्वी और भगवान शिव के परम भक्त के रूप में देखते हैं। इसी गहरी धार्मिक मान्यता और आस्था के चलते कोठी में आज भी विजयादशमी के दिन रावण का पुतला फूंकने के बजाय उसकी पूजा करने की सदियों पुरानी परंपरा जीवंत बनी हुई है।

