रक्षाबन्धन। भारतीय धर्म-संस्कृति के अनुसार रक्षाबन्धन का त्योहार श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह त्योहार भाई-बहन को स्नेह की डोर में बाँधता है। इस दिन बहन अपने भाई के मस्तक पर टीका लगाकर रक्षा का बन्धन बाँधती है, जिसे राखी कहते हैं। यह एक हिन्दू व जैन त्योहार है, जो प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। श्रावण (सावन) में मनाये जाने के कारण इसे श्रावणी (सावनी) या सलूनो भी कहते हैं। रक्षाबंधन की उत्पत्ति प्राचीन पौराणिक कथाओं और ग्रंथों से मानी गई है, जिसका उल्लेख भविष्य पुराण और भागवत पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।
इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने बाधा था रक्षा सूत्र
भविष्य पुराण के अनुसार, देवताओं और राक्षसों के युद्ध में जब देवराज इंद्र की हार-जीत का संकट था, तब उनकी पत्नी इंद्राणी (शची) ने श्रावण पूर्णिमा के दिन इंद्र की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधा और पति के विजय श्री की कामना की थी। ऐसे में यह पर्व रक्षा से जुड़ा हुआ बताया गया है। जिसमें पत्नी इंद्राणी ने इन्द्र की रक्षा की थी।
कृष्ण को द्रौपदी ने बांधी थी रक्षा सूत्र
महाभारत काल में जब श्री कृष्ण ने शिशुपाल का वध किया था, तब उनके हाथ से रक्त बहने लगा। इसे देखकर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उनकी उंगली पर बाँध दिया था, जिसके बदले भगवान कृष्ण ने चीरहरण के समय उनकी रक्षा किए थें।
यम और यमुना
एक अन्य कथा के अनुसार, मृत्यु के देवता यमराज ने अपनी बहन यमुना से 12 वर्षों तक भेंट नहीं की थी। यमुना के दुखी होने पर यमराज उनके पास गए, जिससे प्रसन्न होकर यमुना ने उन्हें राखी बाँधी।
रानी कर्णवती और हुमायूं
मध्यकालीन इतिहास में चित्तौड़ की रानी कर्णवती ने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर अपने राज्य की रक्षा का वचन माँगा था। जिस पर बादशाह ने उनकी मदद किए और रक्षा का वचन निभाए थें। ऐसे कई तरह के उल्लेख रक्षाबंधन को लेकर गंथ्रों में मिलते है। जिसमें राखी का सीधा संबध रक्षा से जुड़ा हुआ है।

