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Rajasthan Folk And Maand Kokila’S Story : मिलिए-“केसरिया बालम-आवो जी-पधारो म्हारे देश रे” की जननी अल्लाह जिलाई बाई से

Rajasthan Folk And Maand Kokila’S Story : दास्ता-ए-राजस्थानी फोक…केसरिया बालम-आवो जी पधारो म्हारे देश….जब भी राजस्थान के रंग, उसकी रेत और उसकी संस्कृति की बात आती है, तब जो धुन ज़हन में सबसे पहले गूंजती है, वह है “केसरिया बालम आओ नी…पधारो म्हारे देस”। यह गीत राजस्थान के पर्यटन का पर्याय बन चुका है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस गीत को अमर बनाने वाली आवाज़ किसकी थी ? यह आवाज़ थी “माड कोकिला” अल्लाह जिलाई बाई की, जिन्होंने यह गीत पहली बार बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह के लिए गाया था। जानिए कैसे अल्लाह जिलाई बाई, राजस्थान की माड कोकिला, “पधारो म्हारे देस” जैसे अमर लोकगीतों की आवाज़ बनीं। 10 साल की उम्र में महाराजा के दरबार में धमाल मचाने से लेकर लंदन के रॉयल अलबर्ट हॉल तक का उनका सफर। पद्मश्री पाने वाली राज्य की पहली लोकगायिका की प्रेरणादायक जीवन गाथा।

संगीत विरासत में मिली प्रतिभा

1 फरवरी, 1902 को जन्मी अल्लाह जिलाई बाई को संगीत विरासत में मिला। उनसे पहली पीढ़ी की महिलाएं भी प्रसिद्ध लोकगायिका थीं। बचपन से ही सुर और ताल उनकी जुबान पर चढ़ गए थे। जब बच्चे अक्षर ज्ञान सीख रहे होते हैं, उस उम्र में उन्होंने उस्ताद हुसैन बख्श खान और बाद में अच्छन महाराज जैसे गुरुओं से संगीत की विधिवत शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी।

दस साल की उम्र में दरबार में धमाल

मात्र दस वर्ष की आयु में, साल 1912 में, उन्होंने बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह के दरबार में पहली प्रस्तुति दी। उनकी प्रतिभा से अचंभित महाराजा यह जानकर हैरान रह गए कि यह बालिका खयाल, ठुमरी, दादरा जैसे शास्त्रीय रूपों में भी उतनी ही निपुण थी, जितनी अपनी पुश्तैनी ‘माड’ शैली में। प्रसन्न होकर महाराजा ने घोषणा की कि अब से उनके दरबार में एकल गायन की प्रस्तुति देने वाली एकमात्र महिला अल्लाह जिलाई बाई होंगी।

“पधारो म्हारे देस”का ऐतिहासिक गायन

अल्लाह जिलाई बाई ने एक दिन महाराजा गंगा सिंह के सम्मान में गाईं थीं ये अमर पंकितियां-
गुण ग्राहक नृप गंग सो,और दूजे नहीं है-कोय जस छायो है जगत में,घर-घर आनंद होय हूं,तो राज रे चरणा री दासी म्हारा राज गढ़ बीकाणे रा माराजा, आवो नी…पधारो म्हारे देश…….इस गायन ने न केवल महाराजा का दिल जीत लिया, बल्कि उनकी ख्याति को एक नया आयाम दिया। महाराजा ने उनकी कला को इतना सम्मान और संरक्षण दिया कि वह “माड कोकिला” के नाम से देश-विदेश में प्रसिद्ध हो गईं।

देश की सीमाएं पार करती आवाज़

उनकी प्रतिभा का डंका पूरे भारत में ही नहीं, विदेशों में भी बजा। जब ब्रिटिश वाइसरॉय बीकानेर आए, तो उनके स्वागत की ज़िम्मेदारी अल्लाह जिलाई बाई को ही सौंपी गई। इससे भी बड़ा सम्मान तब मिला जब दुनिया के 20 देशों के लोक कलाकारों के साथ लंदन के प्रतिष्ठित रॉयल अल्बर्ट हॉल में उन्हें प्रस्तुति देने का मौका मिला। बिना किसी माइक्रोफोन के, केवल अपनी बुलंद और मधुर आवाज़ से उन्होंने पूरे हॉल को मंत्रमुग्ध कर दिया और खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट से सम्मानित किया गया।

अल्लाह जिलाई बाई के जीवन की उपलब्धियां और सम्मान

1982 में राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। वह राजस्थान की पहली लोकगायिका थीं, जिन्हें यह सम्मान मिला। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले। भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया।

निष्कर्ष-अल्लाह जिलाई बाई की कहानी केवल एक कलाकार की सफलता की दास्तान नहीं है, यह एक ऐसे युग की कहानी है जब राजदरबार कला के संरक्षक हुआ करते थे और प्रतिभा को पहचान मिलती थी। आज भी, जब भी “पधारो म्हारे देस” की तान छेड़ी जाती है तो वह केवल राजस्थान के स्वागत का गीत नहीं रह जाता, बल्कि “माड कोकिला” की उस अमर आवाज़ की गूंज बन जाता है जिसने अपनी कला से एक पूरे प्रदेश की पहचान को संगीत के सुरों में पिरो दिया। उनका जीवन और संगीत हमें यह याद दिलाता है कि सच्ची कला कभी नहीं मरती, वह लोकगीतों और इतिहास के पन्नों में सदैव जीवित रहती है।

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