Protection Officer under PWDVA : घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के संरक्षण में अधिकारी की भूमिका

महिला सहायता केंद्र में घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला से बातचीत करता संरक्षण अधिकारी, जो कानूनी प्रक्रिया समझा रहा है।

Protection Officer under PWDVA : घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के संरक्षण में अधिकारी की भूमिका-न्याय और सुरक्षा की मजबूत कड़ी घरेलू हिंसा महिलाओं के खिलाफ होने वाला एक गंभीर सामाजिक और कानूनी अपराध है, जो शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक स्तर पर उन्हें गहराई से प्रभावित करता है। भारत में घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (PWDVA) के तहत पीड़ित महिलाओं को त्वरित न्याय, सुरक्षा और राहत प्रदान करने के लिए संरक्षण अधिकारी (Protection Officer) की व्यवस्था की गई है। संरक्षण अधिकारी वह महत्वपूर्ण कड़ी है, जो पीड़िता और न्यायिक प्रणाली के बीच सेतु का कार्य करती है तथा कानून को ज़मीनी स्तर पर प्रभावी बनाती है। संरक्षण अधिकारी घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं को आवेदन,सुरक्षा,आश्रय,चिकित्सा और कानूनी सहायता दिलाने में अहम भूमिका निभाते हैं। जानिए उनके कार्य और महत्व।

संरक्षण अधिकारी कौन होता है ?

संरक्षण अधिकारी राज्य सरकार द्वारा नियुक्त वह अधिकृत अधिकारी होता है, जो घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला को उसके अधिकारों की जानकारी देने, आवेदन प्रक्रिया में सहायता करने, न्यायालय तक उसकी आवाज़ पहुँचाने और आवश्यक सेवाएँ उपलब्ध कराने में सक्रिय भूमिका निभाता है।

संरक्षण अधिकारी की प्रमुख भूमिकाएं और कार्य

आवेदन और रिपोर्टिंग की प्रक्रिया-संरक्षण अधिकारी पीड़िता से घरेलू हिंसा से संबंधित आवेदन स्वीकार करता है। इसमें पीड़िता की शिकायत को विधिवत दर्ज करना,घरेलू घटना रिपोर्ट (Domestic Incident Report – DIR) तैयार करने में सहायता, सहित तैयार रिपोर्ट को संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजना ,यह प्रक्रिया पीड़िता के लिए न्याय की पहली औपचारिक सीढ़ी होती है।

सहायता और समन्वय की भूमिका

संरक्षण अधिकारी केवल कागजी कार्यवाही तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पीड़िता की व्यावहारिक समस्याओं के समाधान में भी मदद करता है-पीड़िता को आश्रय गृह (Shelter Home) तक सुरक्षित पहुंचना,महिला और उसके बच्चों के लिए चिकित्सा सहायता (Medical Aid) की व्यवस्था,कानूनी सहायता (Legal Aid) और परामर्श (Counselling) उपलब्ध कराना और पुलिस, NGO और अन्य सेवा प्रदाताओं (Service Providers) के साथ समन्वय आदि करना सम्बंधित क्षेत्रीय अधिकारी की जिम्मेदारी होती है।

कानूनी प्रक्रिया और आदेशों का पालन

संरक्षण अधिकारी मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेशों के प्रभावी क्रियान्वयन में भी अहम भूमिका निभाता है-सुरक्षा आदेश (Protection Order) लागू करवाना,मौद्रिक राहत (Monetary Relief), भरण-पोषण या मुआवज़े से जुड़े आदेशों में सहायता व न्यायालय में पीड़िता की ओर से प्रक्रिया समझाना और सहयोग देना।

सुरक्षा और सशक्तिकरण की दिशा में प्रयास

संरक्षण अधिकारी का उद्देश्य केवल तत्काल राहत ही नहीं, बल्कि पीड़िता का दीर्घकालिक सशक्तिकरण भी होता है-पीड़िता को तत्काल खतरे से बचाना,सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना और आत्मनिर्भरता के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण (Vocational Training) व सरकारी योजनाओं की जानकारी देना।

संरक्षण अधिकारी का सामाजिक महत्व

संरक्षण अधिकारी कानून और पीड़िता के बीच सेतु बनकर यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी महिला केवल जानकारी के अभाव या सामाजिक दबाव के कारण न्याय से वंचित न रहे। यह पद महिलाओं को न सिर्फ सुरक्षा देता है, बल्कि उन्हें सम्मान और आत्मनिर्भर जीवन की ओर अग्रसर करता है।

निष्कर्ष (Conclusion)-संक्षेप में, संरक्षण अधिकारी घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के लिए न्याय, सुरक्षा और पुनर्वास की रीढ़ है। उनकी सक्रिय भूमिका से कानून केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ज़मीनी स्तर पर पीड़िता के जीवन में वास्तविक बदलाव लाता है। यदि संरक्षण अधिकारी की भूमिका को और सशक्त बनाया जाए, तो घरेलू हिंसा के खिलाफ लड़ाई और भी प्रभावी हो सकती है।

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