पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास: 25 साल राज करने वाली कांग्रेस साफ कैसे हो गई?

Political History Of West Bengal: आजादी के बाद लंबे समय तक देश में एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस पार्टी की दुर्दशा से हर कोई वाकिफ है. देश में ऐसे कई राज्य हैं जहां कांग्रेस ने दशकों तक अपना राज चलाया और आलम ये है कि वहां कांग्रेस का एक विधायक तक नहीं है. ऐसा ही एक राज्य है पश्चिम बंगाल।

पश्चिम बंगाल का राजनीतिक इतिहास

History Of West Bengal Politics: 1947 में आजादी के वक़्त हुए देश के विभाजन में बंगाल भी अलग हो गया. भारत को पश्चिम बंगाल मिला और पूर्वी बंगाल पाकिस्तान बन गया. पाकिस्तान को बंगाल का 67% हिस्सा मिला जबकि भारत को 37% भाग मिला।

पश्चिम बंगाल का पहला चुनाव

साल 1952 में पश्चिम बंगाल में पहली बार विधान सभा चुनाव हुए, तब बंगाल में 238 सीटों पर चुनाव हुए थे. कांग्रेस पार्टी को 150 सीटों में जीत मिली जबकि लेफ्ट पार्टी CPI और अन्य दलों को 41 और जनसंघ वाले राइट विंग पार्टियों को महज 13 सीटें मिलीं। पश्चिम बंगाल के पहले मुख्य मंत्री (First Chief Minister of West Bengal) बिधान चंद्र रॉय (Bidhan Chandra Roy) बने जो मोहन दास करमचंद गांधी और जवाहर लाल नेहरू के निजी डॉक्टर थे.

इस जीत के बाद कांग्रेस लगातार 20 सालों तक सत्ता में रही और कुल 25 सालों तक बंगाल में राज किया। 1977 तक सिद्धार्थ संकर रॉय बंगाल के सीएम रहे जो आखिरी कांग्रेसी सीएम थे. इसके बाद यहां 1977 से 2011 तक CPIM का राज चला और 2011 से अबतक TMC बंगाल में शासन कर रही है.

1977 के बाद कांग्रेस बंगाल की सत्ता में वापसी नहीं कर पाई और आज की डेट में कांग्रेस का एक भी विधायक बंगाल की विधानसभा में मौजूद नहीं है.

पश्चिम बंगाल से कैसे गायब हुई कांग्रेस

How Congress disappeared from West Bengal: बात 18 अप्रैल 1975 की है, जय प्रकाश नारायण का काफिला कलकत्ता यूनिवर्सिटी की तरफ से गुजर रहा था. तभी 20 साल की एक लड़की जेपी नयारण की एम्बेसडर कार के बोनट पर चढ़ गई. वो लड़की कोई और नहीं पश्चिम बंगाल की वर्तमान सीएम ममता बनर्जी थीं.

जेपी का काफिला रोकने की जुर्रत करके ममता बनर्जी इंदिरा गांधी की नज़रो में आ गईं. ममता इंदिरा गाँधी की आँखों का तारा बन गईं और कांग्रेस की उम्मीदवार। 1984 में हुए आम चुनाव में ममता बनर्जी ने बंगाल के दिग्गज वामपंथी नेता सोमनाथ चटर्जी को हरा दिया और इसी के साथ सांसद बनने के अलावा ममता को प्रदेश युवा कांग्रेस अध्यक्ष भी बना दिया गया.

1992 में ममता ने कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिए अपनी दावेदारी ठोंक दी लेकिन उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज सीताराम केसरी के चहेते सोमेन मित्रा खड़े थे. ममता चुनाव हार गईं मगर कांग्रेसी नेताओं को चुभने भी लगीं। ममता ने अपने युवा कांग्रेस अध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दे दिया।

9 अगस्त 1997 में कोलकाता के नेताजी इंडोर स्टेडियम में कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा था जिसमे ममता को नहीं बुलाया गया. ममता नाराज हो गईं और स्टेडियम के बाहर अपनी रैली बुला ली. हजारों लोग जमा हुए और उसी दिन ममता ने कहा हमारी रैली में आने वाले ही असली तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं

एक तरह से ममता ने कांग्रेस में रहते ही कांग्रेस से अलग एक तृणमूल कांग्रेस बना ली. इस घटना से कांग्रेस ने भविष्य में होने वाले नुकसान का अंदाजा लगा लिया। ममता की इंदिरा गांधी से आधी रात को मीटिंग बुलवाई गई. ममता ने बैठक के बात एलान किया कि मैं कांग्रेस से अलग नहीं हूँ मगर तबतक तृणमूल कांग्रेस को भंग नहीं करुँगी जबतक सोनिया गांधी राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बन जातीं।

कुछ दिन बाद ममता ने नया एलान किया, उन्होंने कहा- ‘अब मैं सोनिया गांधी या कांग्रेस से बात करने से बहुत नफरत करती हूं, क्योंकि उन्होंने मुझसे समझौता करने के लिए 9 दिन इंतजार कराया। मुझसे बात करने का वादा किया, लेकिन बात नहीं की। बदले में मुझे क्या मिला? पार्टी से निष्कासन।’

तृणमूल कांग्रेस की स्थापना

Foundation Of TMC: 1 जनवरी 1998 को ममता ने खुद को कांग्रेस से अलग कर TMC बनाई और एक ही झटके में कांग्रेस के 30 फीसदी वोट झटक लिए. वो दिन और आज का दिन कांग्रेस कभी बंगाल में अपना सीएम नहीं बना पाई.

बंगाल में कांग्रेस के अंत की शुरुआत

भले ही ममता ने कांग्रेस का बंगाल में अंत किया मगर इस अंत की शरूरत  अजय मुखर्जी ने की. 1967 में कांग्रेस नेता अजय मुखर्जी ने कांग्रेस तोड़कर ‘बांग्ला कांग्रेस’ बनाई और लेफ्ट के साथ मिलकर पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार स्थापित की. ये इंदिरा गांधी की वजह से हुआ क्योंकी उन्होंने क्षेत्रीय नेताओं को  हाशिए पर धकेलना शुरू कर दिया था। लेफ्ट का मुकाबला करने के लिए बाहरी नेताओं को बंगाल से चुनाव लड़वाना इंदिरा की सबसे बड़ी गलती थी.

आपातकाल के बाद हुए चुनाव में लेफ्ट ने 294 सीटों में 231 सीटें जीतीं और लेफ्ट ने अगले 34 साल बंगाल में राज किया। लेफ्ट इतना मजबूत हो गया कि कांग्रेस के लिए उभरना लगभग नमुमकिन हो गया.

जिसने खत्म किया उसी के साथ गठबंधन

कांग्रेस और लेफ्ट दोनों ने मिलकर 2021 का विधानसभा चुनाव लड़ा. कांग्रेस ने 92 सीटों पर अपने कैंडिडेट खड़े किए मगर एक भी सीट कांग्रेस को नहीं मिली। इस बार कांग्रेस अकेले सभी सीटों पर चुनाव लड़ रही है और जीत की कोई उम्मीद नहीं नज़र आती क्योंकी सामने बीजेपी भी मजबूती से खड़ी है और मुकाबला BJP Vs TMC का है.

देखा जाए तो कांग्रेस ने बंगाल में खुद के पैर में कुल्हाड़ी मारी, यही पार्टी बंगाल में CPIM के साथ चुनाव लड़ती है तो केरल में उसके खिलाफ, देश में TMC के साथ चुनाव लड़ती है तो बंगाल में TMC के खिलाफ। बंगाल में वोटर्स को यह पता चल गया की कांग्रेस की कोई विचारधारा नहीं है.

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