Phool Singh Baraiya: कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया ने कहा कि संयुक्त निर्वाचन प्रणाली (जॉइंट इलेक्टोरल सिस्टम) के कारण SC-ST प्रतिनिधियों की स्थिति ऐसी हो गई है जैसे मुंह पर पट्टी बंधा कुत्ता। वे अपनी बात खुलकर नहीं कह पाते, न ही समाज के हक के लिए आवाज उठा पाते हैं।
Phool Singh Baraiya News: भोपाल में कांग्रेस की ‘डिक्लेरेशन-2’ की ड्राफ्टिंग कमेटी की बैठक के दौरान भांडेर से कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के राजनीतिक प्रतिनिधियों की स्थिति पर तीखी टिप्पणी की, जिससे विवाद खड़ा हो गया है। उन्होंने जॉइंट इलेक्टोरल सिस्टम को दलित-आदिवासी समाज के लिए हानिकारक बताते हुए बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर का हवाला दिया।
जॉइंट इलेक्टोरल से प्रतिनिधियों की आवाज दबी: बरैया
विधायक बरैया ने कहा कि जॉइंट इलेक्टोरल सिस्टम के कारण SC-ST वर्ग के विधायक और सांसद खुलकर बोलने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने डॉ. अंबेडकर के हवाले से कहा, “जॉइंट इलेक्टोरल में प्रवेश करने के बाद हमारे प्रतिनिधियों की हालत मुंह पर पट्टी बंधे कुत्ते जैसी हो जाती है, जो न काट सकता है और न भौंक सकता है।” उनके अनुसार, यही कारण है कि आज SC-ST जनप्रतिनिधि अपने समाज की पीड़ा को प्रभावी ढंग से सामने नहीं रख पाते।
सामाजिक-आर्थिक बराबरी अब भी दूर
बरैया ने जोर देकर कहा कि देश में राजनीतिक बराबरी तो दिखाई देती है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक बराबरी अभी भी दूर है। उन्होंने चेतावनी दी कि जब तक जाति और धर्म राष्ट्र से ऊपर रहेंगे, तब तक वास्तविक समानता संभव नहीं होगी। बाबा साहब अंबेडकर पहले ही आगाह कर चुके थे कि यदि धर्म और जाति राष्ट्र से ऊपर चले गए, तो संविधान भी समस्याओं का समाधान नहीं कर पाएगा।
सेपरेट इलेक्टोरल सिस्टम की वकालत
विधायक ने अलग निर्वाचन प्रणाली (सेपरेट इलेक्टोरल) को दलित-आदिवासी समाज के लिए स्वतंत्र राजनीतिक आवाज का एकमात्र रास्ता बताया। उन्होंने दावा किया कि डॉ. अंबेडकर ने बाद के वर्षों में जॉइंट इलेक्टोरल को लेकर पछतावा जताया था और पढ़े-लिखे समाज से उम्मीद लगाने की बात कही थी।
आदिवासी समाज की धार्मिक पहचान पर चिंता
अपने संबोधन में बरैया ने आदिवासी समाज की सामाजिक-आर्थिक दुर्दशा पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आदिवासियों की स्थिति का बड़ा कारण उनकी धार्मिक पहचान है। यदि आदिवासी समुदाय अपने पारंपरिक सरना धर्म की ओर लौटे, तो मुक्ति का रास्ता निकल सकता है। उन्होंने झारखंड में सरना धर्म को मान्यता दिलाने की पहल को उदाहरण के रूप में पेश किया।
बरैया का कहना था कि जब तक धर्म सत्ता और समाज के केंद्र में रहेगा, तब तक SC-ST और आदिवासी समाज को बराबरी नहीं मिल पाएगी। जैसे ही धर्म को नीचे और मानव गरिमा को ऊपर रखा जाएगा, तभी सामाजिक और आर्थिक न्याय संभव हो सकेगा।

