Subhashchandra bose aur Tripuri adhiveshan ke kisse hindi mein: वर्ष 1938 समाप्त होने वाला था, विश्वजगत पर युद्ध के बादल छाए हुए थे, म्युनिख एग्रीमेंट के फलस्वरूप उस वर्ष युद्ध तो नहीं हुआ, लेकिन ब्रिटिश सरकार की इस नीति से कांग्रेस सहमत नहीं थी। बाह्य समस्यायों के साथ ही देश में बहुत अंदरूनी समस्याएं भी थीं, इधर कांग्रेस जनों में इस वर्ष होने वाले अध्यक्ष के चुनाव को लेकर हलचल थी। गत वर्ष हुए कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में सुभाषचंद्र बोस अध्यक्ष बने थे, इस वर्ष अध्यक्ष कौन बनेगा ? क्या नामों को भेजा जा चुका है? क्या चुनाव होगा या केंद्रीय नेतृत्व ने सब कुछ पहले से ही तय कर लिया है? कई लोग यह भी सोचते थे, जब पंडित जवाहरलाल नेहरू तीन बार अध्यक्ष बन सकते हैं तो सुभाष बाबू क्यों नहीं?
कांग्रेस ने अपना 52वां अधिवेशन बुलाया था, जो मध्यप्रांत के जबलपुर शहर के तेवर में प्रस्तावित था, तेवर जिसका नाम कभी त्रिपुरी था, यह कभी विशाल नगर था और चेदि के कल्चुरि राजाओं की राजधानी था। महत्वपूर्ण बात यह है कि आज के मध्यप्रदेश राज्य में त्रिपुरी ही केवल एकमात्र स्थान है, जहाँ कांग्रेस ने अपना वार्षिक अधिवेशन किया था। इतिहास में इस अधिवेशन का महत्व भी बहुत रहा है, अध्यक्ष चुने गए सुभाषचंद्र बोस को आने वाले कुछ महीनों में इस्तीफा देना पड़ा था, ऐसा क्यों हुआ था और इस अधिवेशन का संबंध रीवा से क्या था ? आइये जानते हैं।
1938 में सूरत के हरिपुरा में हुए अधिवेशन में सुभाषचंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष बनाए गए थे। तब अध्यक्ष पद के लिए सुभाषचंद्र बोस को महात्मा गाँधी का पूर्ण समर्थन मिला था, लेकिन गांधी इस बार सुभाषचंद्र बोस के नाम को लेकर कुछ ख़ास उत्साहित नहीं थे, उनकी इच्छा मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को अध्यक्ष बनाने के लिए थी, लेकिन उनके इंकार करने के बाद उन्होंने पट्टाभि सीतारमैया का नाम आगे बढ़ाया, इधर सुभाष चंद्र बोस फिर से अध्यक्ष बनना चाहते थे। महात्मा गांधी के अलावा सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ राजेंद्र प्रसाद और जेवी कृपलानी समेत कार्यसमिति के कई अन्य सदस्य भी सुभाषचंद्र बोस के नाम पर सहमत नहीं थे। महात्मा गांधी और सुभाषचंद्र बोस के मध्य मतभेद की भी खबर थी। इसीलिए इस वर्ष होने वाले अध्यक्ष के चुनाव को लेकर कांग्रेसजनों में भी हलचल थी। अभी तक होता क्या था, कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए प्रांतीय कमेटियां नए वर्ष के लिए नामों का प्रस्ताव करती और उनमें से ही किसी एक अध्यक्ष चुन लेती थीं, लेकिन ऑक्टूबर 1934 में हुए मुंबई अधिवेशन में कांग्रेस ने पार्टी का संविधान बनाया और इस नए विधान के अनुसार अगर अध्यक्ष पद के लिए दो नाम आते हैं तो मतदान होना चाहिए।
हालांकि अपवाद स्वरुप 1907 के सूरत अधिवेशन को छोड़ दें तो तब तक कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव की नौबत नहीं आई थी, सूरत अधिवेशन में अध्यक्ष पद को लेकर लाला लाजपत राय और रासबिहारी बोस के मध्य अध्यक्ष पद को लेकर विवाद चल रहा था, इसके 22 वर्ष बाद 1929 में हुए लाहौर अधिवेशन में, गांधी जी ने अध्यक्ष बनने से इंकार कर दिया था, जिसके कारण कांग्रेस को लखनऊ में अधिवेशन कर चुनाव करवाना पड़ा था। लेकिन वर्ष 1939 का यह त्रिपुरी अधिवेशन खास होने वाला था।
अध्यक्ष रहते सुभाषचंद्र बोस द्वारा हरिपुर सेशन में दिया गया भाषण, कांग्रेस के इतिहास में अब तक का सबसे लंबा और महत्वपूर्ण भाषण माना जाता है, इस व्यक्तव्य में वे कहीं भी, गांधी के बनाए गए लीक और मार्ग से हटने की बात नहीं करते हैं। दिसम्बर 1938 में पहली बार गांधी और बोस के बीच मतभेद तब उजागर हुए, जब सुभाषचंद्र बोस बंगाल में मजदूर कृषक पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाना चाहते थे, लेकिन महात्मा गांधी का मत था जब तक कांग्रेस को पूर्ण बहुमत ना मिले, तब तक सरकार में शामिल नहीं चाहिए। इसके अलावा अध्यक्ष रहते बोस ने राजनैतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ समाजवादी शासन को स्थापित करने का उद्देश्य भी लेकर चलने की बात की। वे बिना शर्त स्वराज के पक्षधर थे, इसके लिए अगर ब्रिटिशर्स के विरुद्ध बल प्रयोग भी करना पड़े तो उसका भी उन्होंने समर्थन किया, इसका अर्थ था गांधी से उनका मतभेद जरूर होगा और आगे चलकर ऐसा हुआ भी।
अध्यक्ष पद के लिए मतदान 29 जनवरी 1939 को ही हो गए थे, सुभाषचंद्र बोस अपने विरोधी सीतारमैय्या से लगभग 203 मतों से विजयी रहे, सीतारम्मैया की हार को गांधी ने अपनी व्यक्तिगत हार बताई, परिणामस्वरूप एक सप्ताह में ही परिस्थितियाँ परिवर्तित हो गईं, जिन प्रांतीय समितियों ने सुभाषचंद्र बोस को मत दिया था, गांधी के पक्ष में हो गईं, यहाँ तक की पंडित जवाहरलाल नेहरू समेत 13 सदस्यों वाली कार्यसमिति के अधिकांश सदस्यों ने इस्तीफा भी दे दिया था। और वह अपनी नई कार्यसमिति भी नहीं बना पाए थे। इधर एक और चिंता की बात थी, सुभाषचंद्र बोस का स्वास्थ्य, जिसके कारण वह कई पार्टी मीटिंग्स में भाग नहीं ले पाते थे।
महात्मा गांधी इस अधिवेशन में शामिल नहीं हुए थे, कहा गया वह राजकोट रियासत के विरुद्ध अनशन पर हैं। लेकिन सुभाष चंद्र बोस पूरे उत्साह के साथ त्रिपुरी अधिवेशन में शामिल हुए, उनका स्वास्थ्य लगातार ख़राब ही रहा, अधिवेशन के पहले ही दिन अर्थात 5 मार्च को प्रबंधकों और कार्यकर्ताओं ने मनोनीत अध्यक्ष को 52 हाथियों वाले रथ में बिठाकर कमानिया गेट से लेकर त्रिपुरी तक जुलूस निकालने की योजना बनाई थी, लेकिन सुभाषबाबू अपने ख़राब स्वास्थ्य के कारण उस जुलूस में नहीं आ सके, लिहाजा उनकी आदमकद तस्वीर को रथ में बिठाकर रैली निकाली गई। बाद में डॉक्टरों के मना करने के बाद भी सुभाषचंद्र बोस नहीं माने और 10 मार्च 1939 को स्ट्रेचर में बैठकर आयोजन स्थल में अध्यक्षीय भाषण देने के लिए पहुंचे, और दिल जीतने वाला भाषण दिया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, कांग्रेस नेता और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र ने अपनी किताब ‘मेरा जिया हुआ युग’ में त्रिपुरी अधिवेशन का वर्णन किया है, उनके अनुसार सुभाष बाबू को सुनने के लिए उस दिन लगभग दो लाख लोग इकट्ठा हुए थे, यह अभूतपूर्व था, विंध्य और महाकौशल समेत पूरे देश में यह उनकी लोकप्रियता और समर्थन का परिचायक था।
त्रिपुरी अधिवेशन के बाद एक महीने तक उन्होंने स्वास्थ्य लाभ लिया, लेकिन महात्मा गांधी के बयान और कार्यसमिति के सदस्यों के व्यवहार ने सुभाषचंद्र बोस को क्षुब्ध किया था, इसी बीच सुभाषचंद्र बोस का एक बयान भी विवाद का एक कारण बना था, जब उन्होंने गाँधी समर्थकों को मंदबुद्धि कहा था। उन्होंने नियमानुसार नई समिति के सदस्यों के चुनाव की घोषणा भी नहीं की थी, कारण था त्रिपुरी अधिवेशन के दौरान पंडित गोविंदवल्लभ पंत ने ऑल इंडिया कमेटी के 160 सदस्यों की तरफ से एक प्रस्ताव पेश किया था, जिसमें लिखा था कांग्रेस गांधी के रास्ते पर ही चलेगी और वर्किंग कमेटी के सदस्य भी उनकी मर्जी से ही बनाए जाएंगे। सम्भवतः उन्होंने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने का मन बना लिया था, इसीलिए कोलकाता में अप्रैल-मई के महीने प्रस्तावित कांग्रेस की बैठक से पहले ही उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और जून 1939 को उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की, इसके साथ ही कांग्रेस से उनकी राहें जुदा हो गईं। लेकिन मतभेदों के बाद भी, गाँधी के लिए उनका सम्मान कभी कम नहीं हुआ, महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता भी पहली बार अपने एक संबोधन में उन्होंने ने ही कहा था।
सवाल उठता है इन सब घटनाओं के परिदृश्य में पंडित नेहरू कहाँ थे, वे वहीं थे जहाँ उन्हें होना चाहिए था, सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्यसमिति द्वारा गांधी के पक्ष में इस्तीफा देने सदस्यों में से एक, लेकिन आज के सोशल मीडिया नरेटिव के विपरीत वह सुभाषचंद्र बोस के दुबारा अध्यक्ष बनने के विरोध में नहीं थे और उनका यह भी यह भी मानना था बोस को अपना कार्यकाल पूरा करना चाहिए।
जब 1939 में त्रिपुरी अधिवेशन हो रहा था, उसमें विंध्य से भी बहुत से कांग्रेस कार्यकर्ता शामिल हुए थे, यहाँ के युवा तो खासकर सुभाष चंद्र बोस से बहुत ज्यादा प्रभावित थे, त्रिपुरी अधिवेशन के सभी प्रस्ताव और दस्तावेज रीवा के मार्तण्ड प्रेस से ही छपे थे, सुभाषचंद्र बोस के लिए जो बहुत बड़ी रैली निकाली गई थी, उसके लिए हाथी, घोड़े और बग्घी इत्यादि रीवा महाराज द्वारा भिजवाए गए थे। तब रीवा रियासत हुआ करती थी और यहाँ के शासक महाराज गुलाब हुआ करते थे, जो सच्चे मायने में जनदृष्टा थे, कांग्रेस और उसके प्रगतिशीलता से वे बेहद प्रभावित थे, जिसके कारण उन्होंने रियासत में बहुत जनउपयोगी और मानविक सुधार कार्य भी किए थे, जिसके कारण हम देखते हैं आगे चल कर उन्हें अंग्रेज सरकार का कोपभाजन भी बनना पड़ा था, लेकिन वह कहानी फिर कभी।