The Untold Story of Asha Bhosle : विद्रोह-संघर्ष और संगीत समर्पण की अमर यात्री की कहानी

The Untold Story of Asha Bhosle-

The Untold Story of Asha Bhosle : विद्रोह-संघर्ष और संगीत समर्पण की अमर यात्री की कहानी-जब हिंदी फिल्मों के संगीत का ज़िक्र होता है, तो पांच नाम ऐसे हैं जिन्होंने उस स्वर्णिम दौर को परिभाषित किया जिनमें मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, लता मंगेशकर, किशोर कुमार और आशा भोंसले। ये वो स्तंभ थे जिन पर पूरा एक युग टिका था। लेकिन इनमें से शायद सबसे दर्दनाक,या यूं कहें की मिडिया मसालों से भरी और सबसे विद्रोही यात्रा रही आशा भोंसले की। ऐसे परिवार में जहां बड़ी बहन लता मंगेशकर पूजी जाती थीं तो वही आशा को अक्सर छोटी बहन वाला हिस्सा मिला जिसे हमेशा कमतर आंका जाता । कम काम दिया गया और जब उन्होंने अपनी राह चुनने की कोशिश की तो समाज ने उन्हें जमकर दुत्कारा। यह लेख में हम उसी आशा भोंसले के जीवन को हिंदी सिनेमा की महान गायिका के संघर्ष, लता मंगेशकर से खट्टे रिश्ते, ओपी नैयर और आरडी बर्मन के साथ साझेदारी, उनकी अमर विरासत को संतुलित नज़रिये से पेश करता है। जानिए कैसे आशा जी ने इज़्ज़त कमाने से पहले लानतें बटोरीं और अंततः संगीत की मलिका भी बनीं। हम ऐसे संतुलित और सार्थक नज़रिये से समझने की कोशिश करेंगे-जहां संगीत, विद्रोह, प्रेम और पश्चाताप सब कुछ है। एक उदाहरण की जब बड़ी बहन लता दीदी जल्दी सो जाती थीं, तब ओपी नैयर साहब रात दो-ढाई बजे आशा जी को घर छोड़ने के बहाने ऐसे ज़ोर से ब्रेक्स लगाते थे कि आस-पड़ोस घबराकर उठ जाए। यह किस्सा सिर्फ़ एक मशहूर म्यूज़िक डायरेक्टर और एक गायिका के बीच के रिश्ते का नहीं, बल्कि उस दौर की उन तमाम बेबाक हक़ीक़तों का है, जिसे हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम युग ने देखा-पर अक्सर कहने से कतराया। आशा भोंसले का नाम संगीत के इतिहास में उस मुकाम पर है, जहां मेहनत, प्रतिभा और विद्रोह ने मिलकर एक ऐसा सफ़र रचा, जो कभी दर्द भरा लगता है, कभी मसालों का भंडार तो कभी इबादत सा। यह लेख पराग डिमरी साहब की पुस्तक सहित संगीत के इतिहास और विभिन्न साक्षात्कारों के आधार पर संतुलित दृष्टिकोण से लिखा गया है।

बहनों के बीच तब आई खटास-जब लता दीदी ने कैबरे गाने ठुकराए दाल दिए आशा की झोली में

The Sourness Between Sisters-When Lata Didi Said No to Cabaret Songs

लता मंगेशकर और आशा भोंसले-दो बहनें, दो अलग विधाएं, एक ही घर। लेकिन समय के साथ उनके रिश्तों में दरारें आ गईं। लता जी को जो गाने पसंद नहीं थे ख़ासकर कैबरे और सनसनीखेज़ अंदाज़ वाले वे अक्सर आशा जी के पास ट्रांसफर कर दिए जाते थे। छोटी बहन होने के नाते, आशा जी को हमेशा बचा हुआ काम मिलता था। एक कलाकार के लिए यह कितना दर्दनाक रहा होगा, जब उसकी अपनी बड़ी बहन ही उसे ‘कमतर’ मान बैठे? इस खटास ने दोनों के बीच की दूरी को बढ़ा दिया, और यह वह समय था जब ओपी नैयर आशा जी के जीवन में एक नई सुबह बनकर उभरे। जिनमें आओ हुज़ूर तुमको सितारों में ले चलुं। ..कजरा मोहब्बत वाला….आइए मेहरबान …ये वही गाने हैं जिन्होंने आशा जी को अमर कर दिया और ये सब ओपी नैयर की बदौलत हो स्का।

फूट-फूट कर रोईं थी आशा ताई जब छूटा-15 साल का ओपी नैय्यर का साथ

The OP Nayyar Chapter-15 Years of Magic,Then a Last Song That Broke Her

ओपी नैयर को एक सनकी संगीतकार माना गया,क्योंकि वो हमेशा ही अपने मन की करते, उन्होंने क़सम खा ली थी कि कभी लता मंगेशकर के साथ गाना नहीं बनाएंगे और उन्होंने नहीं बनाया। पंद्रह साल तक उन्होंने लगभग हर बेहतरीन गीत आशा जी को दिया। यहां तक कि जो गाने गीता दत्त, शमशाद बेगम या किसी और पर फिट बैठते, वे भी आशा जी को ही दे दिए जाते। और वो ये सब आशा की हुनरमंदगी और उनकी चाहत में करते। इस हद तक कि उन पर पार्शियलटी (favoritism) का इल्ज़ाम भी लगने लगा और फिर बदकिस्मती से यह रिश्ता भी टूट गया जो टूटना ही था क्योंकि ओपी नैयर पहले से शादीशुदा थे जो हुआ, की आशा जी के साथ उनके अफेयर की चर्चाएं आम हो चली थीं। आखिरकार दोनों के बीच ब्रेक लग गया।
आशा जी ने ओपी नैयर के साथ जो आखिरी गाना रिकॉर्ड किया, उसके बोल आज भी सिहरन पैदा करते हैं. …..और वो गीत था “चैन से हमको कभी, आपने जीने न दिया-ज़हर भी चाहा अगर, पीना तो पीने न दिया” प्रसिद्ध लेखक पराग डिमरी ने आशा जी पर लिखी क़िताब में बताया है- कि यह गाना रिकॉर्ड करते वक्त आशा जी फूट-फूट कर रोईं। लेकिन इस गाने की रिकॉर्डिंग के बाद वो स्टूडियो से निकली फिर कभी ओपी नैयर से बात नहीं की।

The Untold Story of Asha Bhosle-बहुत कुछ झेला फिर संगीत के ज़रिए दुनिया को जवाब दिया।

नया लेकिन एक भयानक मोड़ गणपतराव भोंसले-बचपन की शादी से डोमेस्टिक एब्यूज़ और यहीं से मिला वापस लौटने का साहस

Ganpatrao Bhosle-Child Marriage, Domestic Abuse, and the Courage to Return

आशा जी महज़ महज़ 14-15 साल की थीं जब उन्होंने अपनी बड़ी बहन लता जी के सेक्रेटरी-36 वर्षीय गणपतराव भोंसले-से शादी करने के लिए घर छोड़ दिया। उसी साल उनका पहला बेटा हेमंत पैदा हुआ। समाज ने उन्हें जो लानतें दीं, उनका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है। लेकिन जल्दबाजी में की गई यह शादी जल्द ही रोज़ के झगड़े और डोमेस्टिक एब्यूज़ में बदल गई। आशा जी ने दस साल तक यह यातना सही, और जब वे तीसरी बार गर्भवती थीं, तब घर लौट आईं और फिर कभी उस घर नहीं गईं। उस दौर में तलाकशुदा महिला का क्या हाल होता था, यह समझने के लिए आज के दौर के लोगों को इतिहास में झाँकना होगा। आशा जी ने वह साहस किया, जो उस युग में बहुत कम महिलाएं कर पाती थीं।

पंचम दा का साथ यानि स्वर्णिम युग की शुरुआत-और तब बहनों के रिश्ते भी सुधरने लगे

A New Beginning with Pancham Da-When Asha-Lata Relationship Began to Heal

1980 में आशा जी ने आर.डी. बर्मन (पंचम दा) से शादी की। यह रिश्ता सिर्फ वैवाहिक नहीं था बल्कि संगीत का भी एक नया अध्याय था। पंचम दा के हर एल्बम में लता जी के गाने होते ही थे, और धीरे-धीरे दोनों बहनों के बीच की दूरी कम होने लगी।
आशा जी ने बाद में कई बार स्वीकार किया कि उन्हें अपने पुराने फैसलों पर पछतावा हुआ-ख़ासकर उस समय जब उन्होंने ओपी नैयर से नाता तोड़ा और जब वे अपनी बहन से लड़ीं,संगीत ने उन्हें फिर से जोड़ा। और शायद यही संगीत की सबसे बड़ी ताकत है।

इत्तेफ़ाक या इतिहास-लता और आशा, दोनों 92 वर्ष की आयु में…

Coincidence or History:Both Lata and Asha at Age 92…

चार साल पहले लता मंगेशकर ने 92 वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कहा। आज आशा भोंसले ने भी 92 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। यह संयोग है या इतिहास का एक काव्यात्मक न्याय-कहना मुश्किल है। लेकिन इतना तय है कि दोनों बहनों ने हिंदी सिनेमा को वह ऊँचाई दी, जहाँ से नीचे उतरना असंभव है। गिले-शिकवे, ओपी-आरडी, कैबरे और शास्त्रीय-सब कुछ अब पीछे रह गया। अगर कुछ बचा तो वो है केवल संगीत और संगीत साधकों यानी आशा जी का समर्पण रह गया।

आखिरी स्तंभ का ढहना-मतलब संगीत जगत के एक स्वर्णिम युग का अंत

The Last Pillar Falls-End of an Era

भारतीय फिल्म संगीत का स्वर्णिम काल (Golden Period) पांच नामों पर टिका था-मोहम्मद रफ़ी, मुकेश, लता मंगेशकर, किशोर कुमार और आशा भोंसले। ये पांच ऐसे स्तंभ थे जिनकी जगह कोई और नहीं ले सकता। आज उन पांचों में से आखिरी स्तंभ आशा भोंसले भी ढह गया। एक युग का अंत हो गया है। लेकिन उनकी आवाज़ें हमेशा ज़िंदा रहेंगी हर रात की सुबह में, हर कजरे मोहब्बत वाले गाने में, हर चैन से हमको कभी जैसे रूहानी गानों में।

निष्कर्ष (Conclusion)-आशा भोंसले का जीवन इस बात का प्रमाण है कि इज़्ज़त कमाने के लिए कभी-कभी लानतें बटोरनी पड़ती हैं। उन्होंने बचपन में शादी का दबाव झेला, घरेलू हिंसा सही, अपनी बहन से टकराईं, और अपने करियर में कभी ‘दूसरा स्थान’ पाने को मजबूर हुईं। लेकिन हर बार वे उठीं और हर बार उन्होंने संगीत के ज़रिए दुनिया को जवाब दिया। आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं, तब हमें याद रखना चाहिए की संगीत में कोई बड़ा या छोटा नहीं होता-बस एक आवाज़ होती है जो दिलों में उतर जाती है और आशा जी की आवाज़ तो अमर है।

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