एम.एस सुब्बुलक्ष्मी के गाने के बदले महाराजा अपना सम्राज्य देने को भी तैयार थे !

MS Subbulakshmi Maharaja Story Song Influence Historical Anecdote

Death Anniversary Of M.S Subbulakshmi :वो भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित होने वाली पहली संगीतकार थीं ,1974 में एशिया के नोबेल कहे जाने वाले रेमन मैगसेसे (Ramon Magasaysay) पुरस्कार पाने वाली पहली भारतीय संगीतकार थीं और 1966 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रदर्शन करने वाली पहली भारतीय भी थीं, जी हां हम बात कर रहे हैं कर्नाटक शैली की गायिका मदुरई शनमुखावदिवू सुब्बुलक्ष्मी की।

दिग्गजों ने भी नवाज़ा ख़िताबों से :-

सरोजिनी नायडू ने जिन्हें ‘भारत की बुलबुल’ (Nightingale of India) कहा, तो बड़े गुलाम अली खां ने ‘स्वरलक्ष्मी’, कहा, स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) ने ‘तपस्विनी’ कह कर सम्मान दिया और विदुषी किशोरी अमोनकर ने उनके स्वर को ‘आठवें सुर’ का खिताब दिया जो संगीत के मूल सात स्वरों से ऊपर है।

पुरुषों का राज किया ख़त्म :-

एम. एस सुब्बुलक्ष्मी (M.S. Subbulakshmi) ने कर्नाटक संगीत (Carnatic Music) में उस वक्त अपनी अमिट पहचान बनाई, जब यहाँ सिर्फ पुरषों का वर्चस्व था और अगर हम कहें अघोषित रूप से महिलाएँ वर्जित थीं तो ग़लत नहीं होगा लेकिन जब सुब्बुलक्ष्मी, सेम्मनगुड़ी श्रीनिवास अय्यर से कर्नाटक संगीत और पंडित नारायण राव व्यास से हिंदोस्तानी संगीत (Indian Classical Music) की शिक्षा लेकर इस क्षेत्र में उतरीं तो उनकी सुरीली आवाज़ ने संगीत प्रेमियों के कानों में रस घोल दिया।

आपको जानकार हैरानी होगी कि संयुक्त राष्ट्र में प्रस्तुति देने वाली पहली भारतीय होने का गौरव अपने नाम करने वाली सुब्बुलक्ष्मी का पहला म्यूज़िक एल्बम तब आया था, जब वो सिर्फ दस साल की थीं। इसके बाद उन्होंने मद्रास संगीत अकादमी में जाकर सगीत का पूरा प्रशिक्षण पूरा किया और फिर अपनी मातृभाषा कन्नड़ ही नहीं, बल्कि कई भाषाओं में गाकर पूरी दुनिया में अपने प्रशंसक बनाए।

संगीत मय माहौल में बीता बचपन :-

आपको बता दें कि 16 सितंबर 1916 को जन्मीं मदुरई शनमुखावदिवू सुब्बुलक्ष्मी यानी एमएस सुब्बुलक्ष्मी को उनके चाहने वाले प्यार से उन्हें एमएस अम्मा और कुंजम्मा भी कहते थे। पारंपरिक देवदासी परिवार और एक प्रसिद्ध वीणावादक के घर जन्मीं सुब्बुलक्ष्मी बचपन से मीनाक्षी मंदिर के बहुत पास रहीं और अपनी मां के साथ कोरस में गाती रहीं। उनके पिता के भी वीणा वादन और गायकी के भी कुछ रिकॉर्ड्स बने तो वहीं उनकी दादी अक्कम्मल भी वायलिन वादक थीं।

सुब्बुलक्ष्मी के बचपन के क़िस्से और संगीत की लगन :-

सुब्बुलक्ष्मी जी का बचपन का एक क़िस्सा याद आ रहा है जो एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था ,कहती हैं उन्हें मिट्टी के घरौंदे बनाना बहोत पसंद था और एक दिन जब वो ऐसे ही घरौंदों से खेल रहीं थीं तभी माँ ने उन्हें पास के स्कूल में बुला लिया और गाना सुनाने के लिए कह दिया तो बस मैंने यूँ ही जल्दी से दो गाने इसलिए सुना दिए क्योंकि मै अपना घरौंदा अधूरा छोड़कर आई थी और मुझे जल्दी जाकर उसे पूरा करना था उस वक़्त मुझे अपनी वाहवाही भी सुनाई नहीं दे रही थी।

काग़ज़ को माइक बनाकर गाती थीं :-
ग्रामोफोन सुन-सुनकर और उस मशीन से प्रभावित होकर बचपन से ही जब सुब्बुलक्ष्मी गाने की प्रैक्टिस करती थीं, तो काग़ज़ को रोल करके उसे माइक की तरह अपने सामने रखकर गाती थीं। सिर्फ आठ साल की उम्र में उन्होंने ‘कुंभकोणम’ में ‘महामहम उत्सव’ के दौरान प्रस्तुति दी थी और तभी संगीत के विद्वानों ने उस नहीं सी बच्ची की प्रतिभा को भाँप लिया था।

लेख पढ़कर हुआ लेखक से प्यार :-

1936 तक सुब्बुलक्ष्मी अपने गायन कार्यक्रमों की प्रस्तुतियाँ देने लगी थीं और उनकी संगीत शिक्षा भी जारी थी तब तमिल साप्ताहिक पत्र में काम कर रहे, टी सदाशिवम आनंदा विकतन ने सुब्बुलक्ष्मी जी की सुर लहरियों की प्रशंसा में एक लेख लिखा और उनके शब्दों के ताने-बाने का ये असर हुआ कि उन्हें सुनने के लिए लोगों को भीड़ उमड़ पड़ी। ये देखकर सुब्बुलक्ष्मी ,सदाशिवम की भावनाओं को समझने के लिए मजबूर हो गईं और जल्द ही दोनो प्यार की डोर में बंध गए जबकि सदाशिवम पहले से शादीशुदा थे।

बड़ी शिद्दत से निभाया रिश्ता :-

दोनों इस रिश्ते को खूबसूरत अंजाम तक पहुँचाते लेकिन सुब्बुलक्ष्मी की माँ को ये रिश्ता पसंद नहीं आया और सुब्बुलक्ष्मी उनके फैसले के खिलाफ घर छोड़कर पहले से शादीशुदा सदाशिवम के घर चली गईं। इसके बाद सदाशिवम उनके मैनेजर और मेंटर बन गए और उनकी सफलता में बड़ी भूमिका निभाई। सदाशिवम की पहली शादी से बच्चे भी थे, जिन्हें सुब्बुलक्ष्मी ने अपनी संतान की तरह पाला और वो उन्हें ‘अमु पाती’ कहकर बुलाते थे

फिल्मों से कैसे जुड़ गया नाता :-

सदाशिवम जी निर्माता भी थे उन्होंने ही सुब्बुलक्ष्मी जी की प्रतिभा को अभिनय से जोड़ा और प्रोत्साहित किया 1938 में ‘सेवासदनम’ फिल्म में डेब्यू’ करने के लिए ये फिल्म मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास बाज़ार-ए-हुस्न के रूपांतरित संस्करण पर बनी तमिल फिल्म थी ,जो महिला सशक्तिकरण के लिए हमेशा याद की गई। इसके बाद ,सुब्बुलक्ष्मी जी ने और भी कुछ फिल्मों में काम किया था जो उनके बेमिसाल अभिनय के लिए भी जानी जाती हैं। के. सुब्रमण्यम द्वारा निर्देशित इस फिल्म में अभिनेता थे एफजी नटेसा अय्यर।

महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू भी हो गए थे फैन :-

सुब्बुलक्ष्मी केवल गायन में ही नहीं पारंगत थीं बल्कि देश के प्रति अपने दायित्वों को लेकर भी संजीदा थीं और जब भी स्वतंत्रता के संघर्ष की ज्वाला तेज़ हुई तो वो और उनके पति सदाशिवम ने उसमें अपना अमूल्य योगदान दिया यहाँ तक कि अपनी गायकी से होने वाली कमाई भी वो कस्तूरबा फाउंडेशन को देती थीं। सुब्बुलक्ष्मी जी के बारे में जानने के बाद ,एक बार महात्मा गाँधी जी ने कहा था – “अगर सुब्बुलक्ष्मी गीत को बोलों के साथ न भी गाए, सिर्फ सुरों में गाए या फिर गाए भी नहीं, सिर्फ उच्चारित ही कर दे, तो भी किसी और के गायन के बजाय मैं उसे सुनना ही पसंद करूंगा” यानी सुब्बुलक्ष्मी जी बोलना ही इतना सुर में लगता था उन्हें। यहाँ हम आपको ये भी बता दें कि गांधी जी की फरमाइश पर सुब्बुलक्ष्मी जी ने रातों रात एक भजन ‘हरि तुम हरो’ रिकॉर्ड करके उनको भिजवाया था यही नहीं सुब्बुलक्ष्मी जी ने गाँधी जी के प्रिय भजन ‘वैष्णव जन’ और ‘रघुपति राघव राजाराम’ भी गाए थे। हमारे देश के पहले प्रधानमंत्री बने जवाहरलाल नेहरू ने भी सुब्बुलक्ष्मी जी के बारे में कुछ ऐसा ही कहा ! कहते थे “मैं क्या हूं! एक अदना सी प्रधानमंत्री और वो संगीत की मल्लिका उनके आगे मेरी क्या हैसियत है। “

किस फिल्म से मिली देशव्यापी पहचान :-

मीरा यूँ तो सुब्बुलक्ष्मी की आखिरी फिल्म थी पर यही वो फिल्म थी जिसने उन्हें देशव्यापी पहचान दिलाई थी। इस फिल्म की लोकप्रियता का आलम ये था कि ये 1945 में तमिल में रिलीज़ होने के बाद 1947 में फिर हिंदी में रिलीज़ की गई और इसे नेहरू और माउंटबेटन ने कई और नेताओं के साथ देखा। कहते हैं उदयपुर के महाराजा ने भी सुब्बुलक्ष्मी की ‘मीरा’ फिल्म देखी थी और इसकी तारीफ में कहा था – “फिल्म में सुने कल्याणी राग के बदले में वो अपना पूरा साम्राज्य दे सकते हैं और अपने हाथी घोड़े सब सुब्बुलक्ष्मी की सेवा में सौंप सकते हैं। ”

साथी के बिछड़ने के बाद हुईं स्टेज से दूर :-

सुब्बुलक्ष्मी जी ने भारत की सांस्कृतिक राजदूत की भूमिका निभाते हुए, लंदन, न्यूयॉर्क, कनाडा, सुदूर पूर्व और अन्य स्थानों की यात्रा की। 1997 में उनके पति कल्कि सदाशिवम गुज़र गए जिसके बाद उन्होंने स्टेज परफार्मेंस देना बंद कर दिया,पर उनकी संगीत साधना निरंतर चलती रही उम्र के आखरी पड़ाव तक। इसी ग़म के साथ 11 दिसंबर 2004 को वो हमें छोड़ कर चली गईं।

संगीत पटल पर स्वर्ण अक्षरों से अंकित हुआ नाम :-

पारंपरिक साड़ी में उनका रूप देवी सा प्रतीत होता था शायद इसीलिए ‘एमएस ब्लू’ के नाम से मशहूर कांचीपुरम साड़ी का नाम उनके नाम पर रखा गया था। सुब्बुलक्ष्मी जी की याद में 18 दिसंबर 2005 को उन पर एक स्मारक डाक टिकट जारी किया गया था और कुछ और ख़ास पुरस्कारों की बात करें तो 1954 में आपको पद्म भूषण मिला ,1956 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार ,1968 में संगीता कलानिधि और 1975 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था तो 1988 में कालिदास सम्मान से आपको नवाज़ा गया।

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