Ken-Betwa Link Project Dispute: छतरपुर और पन्ना में केन-बेतवा लिंक परियोजना समेत विभिन्न विकास परियोजनाओं से प्रभावित लोगों का ‘चिता आंदोलन’ एक बार फिर शुरू हो गया है। आदिवासी महिलाएं आंदोलन की अगुवाई करते हुए पुनर्वास, मुआवजा और न्याय की मांग कर रही हैं। आंदोलनकारियों का आरोप है कि प्रशासन ने पहले किए गए वादे पूरे नहीं किए, जबकि सरकार से उनकी मांग है कि प्रभावित परिवारों को जल्द न्याय और उचित अधिकार दिए जाएं।
Ken-Betwa Link Project Dispute: छतरपुर और पन्ना जिले में केन-बेतवा लिंक परियोजना (Ken-Betwa Link Project) सहित विभिन्न विकास परियोजनाओं से प्रभावित लोगों का स्थगित ‘चिता आंदोलन’ (Chita Andolan) एक बार फिर शुरू हो गया है। शुक्रवार से केन नदी की सहायक बराना नदी के पास स्थित कुपी गांव में आंदोलनकारी ‘न्याय दो या मार दो’ (Justice or Death) के नारे के साथ धरने पर बैठे हैं। इस आंदोलन की अगुवाई बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाएं कर रही हैं, जो पुनर्वास और मुआवजे सहित कई मांगों को लेकर सरकार से न्याय की मांग कर रही हैं।
प्रशासन की कार्यशैली पर लगाए गंभीर आरोप
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि विभिन्न परियोजनाओं के कारण हजारों परिवार अपने घर, जमीन और आजीविका से वंचित हो गए हैं। उनका दावा है कि करीब 50 हजार लोग विस्थापन की मार झेल रहे हैं और उन्हें अब तक न्याय नहीं मिल पाया है।
पर्यावरण को नुकसान का भी जताया मुद्दा
अमित भटनागर ने कहा कि केन-बेतवा लिंक परियोजना (River Linking Project) के कारण लाखों पेड़ों की कटाई, पन्ना टाइगर रिजर्व (Panna Tiger Reserve) और केन नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर असर पड़ने की आशंका है। उनका कहना है कि यह पर्यावरण के लिए दीर्घकालिक और अपूरणीय क्षति साबित हो सकती है।
‘वादे पूरे नहीं हुए, उल्टा कार्रवाई हुई’
आंदोलन से जुड़े दिव्य अहिरवार, चिता और लक्ष्मी आदिवासी ने आरोप लगाया कि अप्रैल में हुए पहले ‘चिता आंदोलन’ (Protest) के बाद प्रशासन ने उनकी मांगों पर कार्रवाई का भरोसा दिया था, लेकिन अब तक एक भी वादा पूरा नहीं किया गया। उनका आरोप है कि प्रभावित लोगों पर फर्जी मुकदमे दर्ज किए गए, अवैध बेदखली की गई, बिजली कनेक्शन काटे गए और कुछ स्थानों पर स्कूलों को भी नुकसान पहुंचाया गया।
आदिवासी महिलाओं ने दोहराई न्याय की मांग
आंदोलन में शामिल आदिवासी महिलाओं का कहना है कि इस बार वे केवल आश्वासनों पर भरोसा नहीं करेंगी। उनका कहना है कि यदि सरकार उनकी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती, तो उन्हें सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार या फिर इच्छा मृत्यु की अनुमति देने पर विचार किया जाए। आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक उनका प्रदर्शन जारी रहेगा।

