MP: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी-विकास नहीं, विनाश है पेड़ों की अंधाधुंध कटाई

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट द्वारा पेड़ों की अंधाधुंध कटाई पर की गई कड़ी टिप्पणी

MP High Court Comments On Tree: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने विकास के नाम पर हो रही अंधाधुंध पेड़ कटाई पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि अब राज्य में एनजीटी (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) की पूर्व अनुमति के बिना एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा।

MP High Court Comments On Tree: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने पेड़ों की अवैध कटाई पर बेहद सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि ग्रीन कवर को नष्ट करना किसी भी सूरत में विकास नहीं, बल्कि विनाश है। चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने बुधवार को सुनवाई के दौरान कहा, “खुशनसीब हैं वो लोग जो मध्यप्रदेश में रहते हैं। पेड़ काटने की अनुमति देने वाले अधिकारी प्रदूषित शहरों में जाकर रहें, तब उन्हें पता चलेगा कि पेड़ों का क्या महत्व है।”

बिना कमेटी की अनुमति एक भी पेड़ नहीं काटने का सख्त आदेश

कोर्ट ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के आदेश पर गठित 9 सदस्यीय कमेटी की अनुमति के बिना प्रदेश में एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि अब तक कितने पेड़ काटे गए, कितनों का सफल प्रत्यारोपण हुआ और काटे गए प्रत्येक पेड़ के एवज में कितने गुना पेड़ लगाए जा रहे हैं, इसकी पूरी जानकारी 17 दिसंबर तक पेश की जाए।

सरकार ने हाईकोर्ट में स्वीकार की गलती

सरकारी वकील ने कोर्ट में स्वीकार किया कि कई जगहों पर बिना अनुमति पेड़ काटे गए और प्रत्यारोपण की प्रक्रिया भी सही नहीं अपनाई गई। भोपाल में 244 में से केवल 112 पेड़ों का प्रत्यारोपण बताया गया, लेकिन कोर्ट ने ट्रांसप्लांटेशन की तस्वीरें देखकर टिप्पणी की कि “ऐसे पेड़ बचते नहीं, मर जाते हैं।” बेंच ने उन अधिकारियों के नाम मांगे जिन्होंने यह अनुमति दी।

ट्रांसप्लांटेशन के नाम पर नया खेल

कोर्ट को पता चला कि अब पेड़ काटने की परमिशन लेना मुश्किल होने के कारण अधिकारी “ट्रांसप्लांटेशन” का नया तरीका अपना रहे हैं। पेड़ की सारी टहनियां-पत्तियां काट दी जाती हैं, सिर्फ तना बचाकर उसे दूसरी जगह गाड़ दिया जाता है। विधानसभा परिसर में रेजिडेंशियल कॉम्प्लेक्स बनाने के लिए भी यही तरीका अपनाया गया। 30 अक्टूबर 2025 के एक सरकारी पत्र में अधिकारियों ने काटी गई लकड़ी और टहनियों के इस्तेमाल की अनुमति तक मांग ली थी, जिससे साफ है कि बचाने की कोई मंशा नहीं थी।

प्रदेश में आज तक कोई ट्री प्लांटेशन पॉलिसी नहीं

हैरान करने वाली बात यह सामने आई कि मध्यप्रदेश में अभी तक कोई आधिकारिक ट्री प्लांटेशन पॉलिसी ही लागू नहीं है। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया। साथ ही कोर्ट ने कहा कि 25 से ज्यादा पेड़ काटने का अधिकार केवल राजपत्रित वन अधिकारी या नगरीय निकाय आयुक्त को है, इसे वे अपने मातहतों को डेलिगेट नहीं कर सकते। ऐसा करना नियमों का उल्लंघन है।

भोजपुर-बैरसिया रोड से शुरू हुआ था मामला

मामला सबसे पहले भोपाल के पास भोजपुर-बैरसिया रोड चौड़ीकरण के लिए बिना अनुमति 488 पेड़ काटे जाने की अखबारी खबर पर हाईकोर्ट ने खुद संज्ञान लिया था। इसके बाद सागर कलेक्टर कार्यालय विस्तार, राष्ट्रीय राजमार्ग और रेलवे प्रोजेक्ट में हजारों पेड़ कटाई की अलग-अलग याचिकाएं आईं। कोर्ट ने सभी को एक साथ जोड़कर सुनवाई की। रेलवे के एक प्रोजेक्ट में 8000 पेड़ काटे जाने का भी जिक्र हुआ।

अगली सुनवाई 17 दिसंबर को

बुधवार को सुनवाई के दौरान पीडब्लूडी, विधानसभा सचिवालय, भोपाल नगर निगम, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, विधानसभा के प्रधान सचिव सहित कई बड़े अधिकारी व्यक्तिगत रूप से हाजिर हुए। वेस्ट सेंट्रल रेलवे की महाप्रबंधक की जगह डीआरएम भोपाल उपस्थित रहे। कोर्ट ने सभी पक्षों को कड़ी फटकार लगाते हुए मामले की अगली सुनवाई 17 दिसंबर 2025 निर्धारित की है।

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