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MP: पॉक्सो मामले में फर्जी उम्र सर्वे रिपोर्ट, हाईकोर्ट सख्त, दिए जांच के आदेश

MP Highcourt News

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MP High Court News: जबलपुर हाईकोर्ट ने POCSO एक्ट के एक मामले में आरोपी को बचाने के उद्देश्य से पेश की गई उम्र संबंधी सर्वे रिपोर्ट को प्रथम दृष्टया फर्जी करार दिया है। युगलपीठ (जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन) ने आशंका जताई कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने बचाव पक्ष की मदद से न्यायालय के समक्ष झूठे दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं।

MP High Court News: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पॉक्सो एक्ट के एक मामले में आरोपी को बचाने के लिए कथित रूप से तैयार की गई फर्जी उम्र संबंधित सर्वे रिपोर्ट को गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने इसे झूठे सबूत पेश करने का मामला मानते हुए संबंधित आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की जांच के निर्देश दिए हैं।

युगलपीठ का आदेश

जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रत्नेश चंद्र सिंह बिसेन की युगलपीठ ने आदेश में कहा कि पहली नजर में ऐसा प्रतीत होता है कि बचाव पक्ष की मदद से आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने न्यायालय के समक्ष झूठे दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं। युगलपीठ ने डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम ऑफिसर, छतरपुर को निर्देशित किया है कि संबंधित महिला आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की भूमिका की जांच करें। यदि जांच में सर्वे रिपोर्ट फर्जी पाई जाती है, तो उसके खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई की जाए। जांच 30 दिनों के भीतर पूरी की जाए।

अपीलकर्ता ने किया था दावा

यह मामला छतरपुर निवासी अनिल अग्निहोत्री की अपील से जुड़ा है। अपीलकर्ता ने दावा किया था कि जिला न्यायालय के विशेष न्यायाधीश ने वर्ष 2023 में पॉक्सो एक्ट, बलात्कार और अपहरण के आरोपों में उन्हें दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। बचाव पक्ष ने आंगनबाड़ी कार्यकर्ता द्वारा वर्ष 2005 में किए गए सर्वे रिपोर्ट को दस्तावेज के रूप में पेश किया था। इस रिपोर्ट के आधार पर तर्क दिया गया कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से अधिक थी और वह बालिग थी। इसलिए विशेष न्यायाधीश ने पीड़िता को नाबालिग मानकर पॉक्सो एक्ट के तहत सजा देने में गलती की है।

दस्तावेज में खामियां

युगलपीठ ने दस्तावेज का अवलोकन करने पर पाया कि सर्वे रिपोर्ट के कवर पेज पर पंजीयन क्रमांक ‘एक’ लिखा है, लेकिन आंगनबाड़ी सहायिका या सेक्टर सुपरवाइजर का नाम और पता नहीं है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता मालती अहिरवार के हस्ताक्षर भी नहीं हैं। जन्म तिथि वाले कॉलम (नंबर 10) पूरी तरह खाली है। कोर्ट ने कहा कि प्रमाण-पत्र विरोधाभासों से भरा है और पहली नजर में लगता है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कोर्ट में झूठे सबूत पेश कर रही थी।

कार्रवाई पर विचार किया जाएगा

युगलपीठ ने सुनवाई के बाद यह आदेश जारी किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में फर्जी दस्तावेज पेश करना न्याय व्यवस्था के साथ खिलवाड़ है और इसकी सख्त जांच जरूरी है। जांच रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद आगे की कार्रवाई पर विचार किया जाएगा।

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