Bhojshala Dispute Case Hearing Date: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने धार जिले में स्थित बहुचर्चित भोजशाला विवाद से जुड़े मामले को इंदौर बेंच में स्थानांतरित करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवादित भोजशाला का स्ट्रक्चर धार जिले में स्थित होने के कारण यह इंदौर बेंच के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आता है, इसलिए मामले की सुनवाई वहीं होनी उचित है।
Bhojshala Dispute Case Hearing Date: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की मुख्य पीठ ने धार जिले के बहुचर्चित भोजशाला विवाद से जुड़े मामले को इंदौर बेंच में स्थानांतरित कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने क्षेत्राधिकार के आधार पर यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवादित स्थल धार जिले में स्थित है, जो इंदौर बेंच के क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आता है। इसलिए, मामले की सुनवाई इंदौर बेंच में ही उचित होगी।
रिकॉर्ड और ASI रिपोर्ट पर निर्देश
युगलपीठ ने रजिस्ट्री को निर्देश दिए हैं कि मामले से जुड़े सभी रिकॉर्ड तुरंत इंदौर बेंच को भेजे जाएं। साथ ही, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की सीलबंद रिपोर्ट की प्रति पक्षकारों को उपलब्ध कराने का निर्णय भी इंदौर बेंच ही लेगी। मामले की अगली सुनवाई अब 23 फरवरी 2026 को इंदौर बेंच में होगी।
राज्य पक्ष का अनुरोध खारिज
राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह सहित अन्य वकीलों ने मजबूती से अनुरोध किया था कि मामला मुख्य पीठ जबलपुर में ही सुना जाए। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने क्षेत्राधिकार के नियमों का हवाला देते हुए इसे इंदौर बेंच में भेजना अधिक उपयुक्त बताया।
पहले क्या हुआ था?
इससे पहले 16 फरवरी को इंदौर बेंच में न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ ने सुनवाई के दौरान प्रशासनिक आदेश के लिए मामला मुख्य पीठ जबलपुर ट्रांसफर किया था। अब मुख्य पीठ ने इसे वापस इंदौर बेंच को सौंप दिया है।
भोजशाला विवाद का मूल मामला
यह विवाद पूजा के अधिकार और नमाज की अनुमति से जुड़ा है। हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस सहित अन्य याचिकाकर्ताओं का दावा है कि भोजशाला का निर्माण 1010 से 1055 ईस्वी के बीच परमार वंश के राजा भोज ने कराया था। यहां देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र था। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि बाद के मुस्लिम शासकों ने परिसर को क्षति पहुंचाई, जबकि ब्रिटिश काल में इसे कमाल मौला मस्जिद के रूप में प्रचारित किया गया। फिलहाल यह स्थल ASI के संरक्षण में है।

