मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने एक अहम फैसले में कहा है कि गर्भपात करवाने का फैसला महिला का अपना अधिकार है। अगर गर्भावस्था कानून में तय सीमा के भीतर है, तो महिला को इसके लिए पति की मंजूरी लेने की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला इंदौर के एक शादीशुदा जोड़े से जुड़ा है। दोनों की शादी को करीब दो साल हुए थे, लेकिन पिछले कुछ समय से उनके रिश्ते में तनाव चल रहा था। दोनों अलग-अलग रह रहे थे। इसी बीच महिला गर्भवती हो गई। उस समय उसकी गर्भावस्था करीब 13 सप्ताह की थी।
महिला ने अदालत को बताया कि पति से रिश्ते लगभग खत्म हो चुके हैं। ऐसे माहौल में वह यह गर्भ जारी नहीं रखना चाहती क्योंकि इससे उस पर मानसिक दबाव पड़ रहा है।
कोर्ट पहुंची महिला
महिला ने अपने वकील के जरिए हाई कोर्ट में याचिका दायर कर गर्भपात की अनुमति मांगी। अदालत में बताया गया कि वैवाहिक विवाद और अलगाव की वजह से उसकी मानसिक स्थिति प्रभावित हो रही है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पति को नोटिस भेजा, लेकिन वह पेश नहीं हुआ। वहीं, राज्य सरकार ने भी महिला की याचिका का विरोध नहीं किया।
कोर्ट ने क्या कहा?
29 जून 2026 को दिए गए अपने आदेश में हाई कोर्ट ने कहा कि महिला को अपने शरीर और प्रजनन से जुड़े फैसले लेने का पूरा अधिकार है। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि पति की सहमति के बिना भी महिला गर्भपात का फैसला ले सकती है, अगर मामला कानून की तय शर्तों के भीतर आता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के X बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी, हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर डिपार्टमेंट मामले का जिक्र किया। उस फैसले में भी कहा गया था कि महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता और प्रजनन संबंधी फैसले उनके मौलिक अधिकार हैं।
कानून क्या कहता है?
अदालत ने माना कि महिला की गर्भावस्था करीब 13 सप्ताह की थी, जो मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) एक्ट, 1971 के तहत तय कानूनी सीमा के भीतर आती है। ऐसे मामलों में योग्य डॉक्टर कानून के अनुसार सुरक्षित तरीके से गर्भपात कर सकते हैं।
फैसले का क्या मतलब?
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि किसी भी महिला को उसकी इच्छा के खिलाफ गर्भावस्था जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अगर वैवाहिक विवाद, अलगाव, मानसिक तनाव या तलाक जैसी परिस्थितियां हों, तो उन्हें भी गर्भपात के फैसले में अहम आधार माना जा सकता है। यह फैसला महिलाओं के प्रजनन अधिकार और उनकी व्यक्तिगत आजादी को और मजबूत करने वाला माना जा रहा है।

