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मध्यप्रदेश में निवेश: कैफियत से पहले अपनी…हैसियत देखिए! FT. जयराम शुक्ल

MP Global Investment SummitMP Global Investment Summit

MP Global Investment Summit

MP Global Investment Summit | हमारा मध्यप्रदेश निवेशप्रेमी है। चौबीसों घंटे फिकर रहती है कि कोई आए पैसा लगाए। देशी आए, विदेशी आए सबके लिए खुला मैदान है। हर अँतरे साल निवेशक सम्मेलन होते थे, नई सरकार ने तो ऐसे आयोजनों की झड़ी सी लगा रखी है। फ़रवरी में भोपाल में महाविराट ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट है। समूची सरकार घरातियों की तरह पंडाल सजाए अभी से खड़ी है।

आखिर अपना प्रदेश है ही..सुख का दाता सबका साथी। यहां जल है,जंगल है,जमीन है, जमीन के अंदर खनिज है,क्या कुछ नही है? खेती को तो चमका के नंबर एक कर दिया। ओला-पाला और फसल चरने के लिए छुट्टा मवेशियों की छूट के बावजूद भी हर साल अन्न उत्पादन का कृषि कर्मण पुरस्कार हमी जीत रहे हैं। सबइ कुछ अच्छा-अच्छा है। अब उद्योग धंधों में नंबर एक होना है। मुख्यमंत्रीजी, अफसर सभी विदेश यात्राओं में निवेशकों को रिझाने जाते आते रहते हैं। बिना व्यापार फैले ग्रोथ रेट कैसे मेंटेन होगी। सो जरूरी है कि कोई आए पूँजी फँसाए।

इतने सद्प्रयासों के बाद भी उद्योगपति कम ही आना चाहते हैं। इनवेस्टर्स मीट में जो करारनामे होते हैं उनमें आधे भी नहीं आते। जो छोटे, मझोले उद्योग धंधे सरकारी सब्सिडी के चक्कर में लगते भी हैं वो दो तीन साल बाद गश खा के गिर पड़ते हैं।

इतनी रियायतों, आवभगत, आरजूमिन्नत के बाद भी मध्यप्रदेश धंधे व्यापार वाला स्टेट क्यों नहीं बन पा रहा है ? यह यक्ष प्रश्न दिमाग में घुमड़ता रहता है। मेरे परिवार के कई बच्चे देश-विदेश की अच्छी फर्मों में छोटे, मझले, ऊँचे पदों पर बिजनेस एक्जक्यूटिव से लेकर जीएम, प्रेसिडेंट तक हैं। वे मेरे साथ वाट्सअप ग्रुप में जुड़े हैं। मैंने उनके सामने यही यक्षप्रश्न रखा..यह बताते हुए कि मुझे न अर्थशास्त्र की समझ है और न ही बिजनेस की तमीज। प्रदेश का एक साधारण नागरिक होने के नाते जानना चाहता हूँ कि ऐसा क्यों है जबकि प्राकृतिक संसाधनों के मामलों में हम उन कई प्रदेशों के आगे हैं जो हमसे व्यापार-उद्योग में आगे हैं।

इस विषय पर अच्छी खासी बहस चली बुद्धि विलास हुआ। निष्कर्ष एक लाइन में निकला कि मध्यप्रदेश में अब तक बिजनेस कल्चर ही नहीं बन पाया है।

कोई भी संस्कृति वहां के शिक्षा संस्थानों के उद्गम से निकलती है। चक्रवर्ती सम्राट चन्द्रगुप्त क्यों प्रतापी हुए? इसलिए कि वहां नलंदा था उसके समकक्ष तक्षशिला था,अर्थशास्त्री कौटिल्य थे,अमात्य राक्षस जैसे विद्वान मंत्री थे। ये इतिहास की बातें है। अब गुजरात को ही लें उद्योग-व्यापार में गुजरात देश का सिरमौर मुकुट क्यों बना है.? इसलिए कि वहाँ आईआईएम अहमदाबाद है। वाणिज्य की शिक्षा में इसके जोड़ का दूसरा संस्थान नहीं। फिर महाराष्ट्र को लें, निजी और सरकारी क्षेत्र के एक से एक उम्दा बिजनेस स्कूल हैं।

चंद्रबाबू नायडू ने देखते ही देखते आंध्रप्रदेश को दक्षिण भारत के प्रदेशों में अग्रगण्य बना दिया। जहाँ अच्छे बिजनेस स्कूल्स हैं वहां उद्योग व्यापार की भी बरक्कत है भले ही वहाँ मध्यप्रदेश जैसे प्राकृतिक संसाधन न हो। क्लिंटन ने एक बार यूरोपियन यूनियन की बैठक में कहा था कि अमेरिका इसलिए उन्नत है क्योंकि यहां की सड़कें अच्छी हैं। अमेरिका जैसे बनने की ख्वाहिश अच्छी है,उससे तुलना भी किया जाना कोई दुस्साहस या गुनाह नहीं है पर उसके जैसे बनने के लिए बढ़ते हुए कदम भी दिखने चाहिए। अमेरिका दुनिया का दादा क्यों है? इसलिए नहीं कि उसके पास एटमी, स्कड, पैट्रियट, इंटरकॉन्टिनेंटल मिसाईलें हैं। वह दुनिया में सर्वश्रेष्ठ इसलिए है कि विश्व की श्रेष्ठ 10 यूनिवर्सिटीज में पाँच अमेरिका में हैं।

भारत के कोई भी शैक्षणिक संस्थान विश्व के टाँप 200 में भी नहीं।

बात अपने मध्यप्रदेश और यहाँ की उद्योग-वाणिज्य-व्यापार की संस्कृति के संन्दर्भ में कर रहा था। मध्यप्रदेश के शैक्षणिक संस्थानों की देश में वही स्थिति है जो देश की विश्व के पैमाने पर। मध्यप्रदेश के संस्थानों को 100 में भी जगह पाना मुश्किल। इंडिया टुडे के इस साल के अंक ने देश के टाँप हंड्रेड बिजनेस स्कूल्स की सूची जारी की है। आईआईएम इंदौर को नौवां स्थान मिला है। इंदौर के ही एक निजी संस्थान प्रेस्टीज इंस्टीट्यूट सूची में 58वें स्थान पर है। आईआईएम इंदौर को एचआरडी का उपक्रम मान लें तो सौ की सूची में एक मात्र प्रेस्टीज इंस्टीट्यूट है। कमाल की बात यह कि टाँप 10 में सिर्फ़ पाँच ही आईआईएम आ पाए बाकी सभी निजी क्षेत्र के हैं।

टाप 100 में भी महाराष्ट्र, गुजरात, दक्षिण व एक दो दिल्ली के हैं। कहने का आशय यह कि मध्यप्रदेश आज भी उच्चशिक्षा के क्षेत्र में कंगाल ही है। सिर्फ एमबीए कराने वाले बिजनेस इंस्टीट्यूट की ही बात करें तो पूरे प्रदेश में 200 से ज्यादा हैं। लगभग प्रत्येक विश्विद्यालय में एमबीए की पढ़ाई होने लगी है। लाख़ की संख्या में प्रतिवर्ष यहाँ से बिजनेस एक्जीक्यूटिव व टेक्नोक्रेट निकलते हैं। एचआरडी के आँकड़े पूरे देश के संस्थानों में से महज 7 प्रतिशत पासआउट को काबिल बताते हैं तो मध्यप्रदेश की स्थिति क्या होगी आप स्वयं अंदाज लगा सकते हैं।

प्रदेश में उच्च शिक्षा सबसे निम्न स्तर पर है। व्यवसायिक शिक्षा उससे भी गई गुजरी। सभी संस्थान नोटों की फसलें काटने में लगे हैं। ज्यादातर ज्यादातर नेताओं की साझेदारी वाले हैं। गुणवत्ता नियंत्रण का कोई पैमाना नहीं। अधकचरी दिमाग की फैकल्टी के पढ़ाए बच्चे निकल रहे हैं। आप दो साल के लिए न कृषि कर्मण की सोचिए, न ही इनवेस्टर मीट की। ये दो साल शैक्षणिक संस्थानों की गुणवत्ता के लिए दीजिए। बंद करिए सभी बोगस संस्थाएं जो रिजल्ट न देती हों। संख्या भले ही 100 से घटाकर 10 करना पड़े करए। वर्ल्ड क्लास न सही नेशनल क्लास इंस्टीट्यूट तैय्यार करिए, फिर देखिए उसी के दहाने से वो संस्कृति निकलेगी जो उद्योग-व्यापार के मामले में गुजरात को गुजरात बनाती है और महाराष्ट्र को महाराष्ट्र।जुबानी जुबां खर्च और ढोल और विज्ञापनों में ढोल पीटने से कुछ होने जाने वाला नहीं।

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