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मोहन भागवत के भाषण की बड़ी बातें: OTT के नियम, आंदोलनों और ‘रिजीम चेंज’ पर क्या बोले RSS प्रमुख?

MOHAN BHAGWAT

MOHAN BHAGWAT

नागपुर। विजयादशमी के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का स्थापना दिवस मनाया गया। इस मौके पर नागपुर में आयोजित कार्यक्रम में संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने देश के मौजूदा हालात, सामाजिक एकता, आंदोलनों, सत्ता परिवर्तन की कोशिशों, OTT प्लेटफॉर्म, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर अपनी बात रखी। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत में भी बांग्लादेश और फ्रांस जैसे हालात बनाने की कोशिश हो रही है। दुनिया में ऐसी शक्तियां हैं, जो भारत को दबाना चाहती हैं। उनका मकसद सत्ता परिवर्तन करके हालात सुधारना नहीं, बल्कि अपने पिट्ठुओं को सत्ता में बैठाना है। भागवत ने यह भी कहा कि कुछ लोग भारत और हिंदू समाज को तोड़ना चाहते हैं और उन्हें कुछ नेताओं का समर्थन भी मिलता है।

अपने संबोधन में संघ प्रमुख ने सामाजिक एकता मजबूत करने, स्वदेशी अपनाने और विकास के साथ पर्यावरण का ध्यान रखने पर जोर दिया। उन्होंने OTT प्लेटफॉर्म के लिए नियम बनाने और AI का सही इस्तेमाल करने की जरूरत भी बताई। आइए, जानते हैं मोहन भागवत के भाषण की प्रमुख बातें।

मोहन भागवत ने अपने भाषण में आरोप लगाया कि दुनिया में ऐसी शक्तियां मौजूद हैं, जो भारत को दबाना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि भारत में भी बांग्लादेश और फ्रांस जैसे हालात पैदा करने की कोशिश हो रही है। उनके मुताबिक, ऐसी ताकतों का उद्देश्य केवल सत्ता परिवर्तन करना नहीं, बल्कि अपनी पसंद के लोगों को सत्ता में बैठाना है।

भागवत ने यह भी कहा कि कुछ लोग भारत और हिंदू समाज को बांटना चाहते हैं और उन्हें कुछ नेताओं का समर्थन मिलता है। उन्होंने लोगों से ऐसी परिस्थितियों में उत्तेजित होने के बजाय एकता बनाए रखने की अपील की।

RSS प्रमुख ने कहा कि समाज में समस्याएं होने पर आंदोलन होते हैं, लेकिन उनका उद्देश्य समस्याओं का समाधान निकालना होना चाहिए। आंदोलनों के जरिए समाज में द्वेष और विभाजन पैदा करना सही नहीं है।

उन्होंने कहा कि कई बार आंदोलनों का इस्तेमाल दूसरे उद्देश्यों के लिए किया जाता है और वे राजनीति का साधन बन जाते हैं। समाज और देश को केवल नेता नहीं चलाते, बल्कि समाज की सक्रियता से भी समस्याओं का समाधान निकलता है।

मोहन भागवत ने सामाजिक एकता पर जोर देते हुए कहा कि भारत को कमजोर करने की कोशिशों का जवाब एकजुट रहकर दिया जा सकता है। उन्होंने बंगाल विभाजन का उदाहरण देते हुए लॉर्ड कर्जन का जिक्र किया।

भागवत ने कहा कि लॉर्ड कर्जन ने हिंदू-मुस्लिम आधार पर बंगाल का विभाजन किया था, जिसे चार साल बाद वापस लेना पड़ा। हालांकि, 1947 में देश का विभाजन नहीं रुक सका, क्योंकि लोगों के मन में यह धारणा मजबूत हो गई थी कि जो अलग दिखाई देते हैं, वे अलग ही हैं।

उन्होंने इस ऐतिहासिक उदाहरण के जरिए समाज में विभाजनकारी सोच से बचने और आपसी एकता बनाए रखने की जरूरत बताई।

संघ प्रमुख ने कहा कि भारत के लोगों के पूर्वज एक हैं और देश की संस्कृति का मूल भी एक है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी की अलग पहचान मिटाए बिना सभी को साथ लेकर चलना चाहिए।

भागवत के अनुसार, भारत की परंपराओं और विचारों में दुनिया की समस्याओं का समाधान देने की क्षमता है। उन्होंने विविधता को स्वीकार करते हुए सामाजिक एकता मजबूत करने की जरूरत बताई।

उन्होंने कहा कि देश की सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं को समझते हुए समाज में आपसी सद्भाव बनाए रखना जरूरी है।

मोहन भागवत ने डिजिटल माध्यमों और नई तकनीक के इस्तेमाल पर भी बात की। उन्होंने कहा कि आज लोगों तक हर तरह की जानकारी पहुंच रही है, लेकिन सही और गलत की पहचान किए बिना उसका इस्तेमाल नुकसानदायक हो सकता है।

उन्होंने OTT प्लेटफॉर्म के लिए नियम तय करने की जरूरत बताई और कहा कि सरकार तथा प्रशासन को इस दिशा में ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के सही इस्तेमाल पर जोर दिया।

भागवत की बातों का मुख्य जोर इस पर था कि डिजिटल प्लेटफॉर्म और नई तकनीक का उपयोग जिम्मेदारी के साथ किया जाए, ताकि समाज पर उनके नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सके।

मोहन भागवत ने नेपाल में आई त्रासदी का जिक्र करते हुए विकास के मौजूदा मॉडल पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि नेपाल को जिस भयंकर त्रासदी का सामना करना पड़ा, उसमें हजारों लोगों की जान गई। उनके मुताबिक, इसके पीछे पूरे हिमालयी क्षेत्र में हुए एकांगी विकास की भूमिका रही है।

भागवत ने भारत, तिब्बत, भूटान और चीन में हुए विकास का उल्लेख करते हुए कहा कि विकास को लेकर समग्र और संतुलित दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि विकास के लिए तकनीक को बढ़ावा देना आवश्यक है, लेकिन इससे प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए। विकास की योजनाओं में अर्थव्यवस्था के साथ पर्यावरण और नैतिकता का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। यानी विकास ऐसा हो, जिसमें इकोनॉमी, इकोलॉजी और एथिक्स के बीच संतुलन बना रहे।

RSS प्रमुख ने संघ की शताब्दी यात्रा के संदर्भ में ‘स्व’ के बोध और स्वदेशी को अपने आचरण में अपनाने की बात कही। उन्होंने भारतीय संविधान का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें विविधता के बावजूद देशवासियों को भावनात्मक रूप से एक समाज के रूप में स्वीकार किया गया है।

भागवत ने कहा कि संविधान में ‘हम भारत के लोग’ कहकर इसी भावनात्मक एकता को व्यक्त किया गया है। उन्होंने जोर दिया कि इस बंधन को लगातार मजबूत करने की जरूरत है। उनके मुताबिक, संविधान के मार्गदर्शक सिद्धांत भी इस दिशा में मार्गदर्शन करते हैं।

उन्होंने स्वदेशी को केवल वस्तुओं के इस्तेमाल तक सीमित न रखते हुए अपने विचारों, व्यवहार और जीवनशैली में भी आत्मबोध विकसित करने की जरूरत बताई।

संत रविदास और अन्य महापुरुषों को किया याद

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने संत शिरोमणि रविदास की 650वीं जयंती, स्वामी श्रद्धानंद के बलिदान के 100 वर्ष और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के कार्यों का उल्लेख किया। उन्होंने इन महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेने का आह्वान किया।

भागवत ने कहा कि जिस ‘स्व’ की रक्षा के लिए इन महापुरुषों ने बलिदान दिया, उसी आत्मबोध को समाज में जागृत करना जरूरी है। उन्होंने बंगाल के राज नारायण बसु का भी उल्लेख किया, जिनका जन्म द्विशताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है। राज नारायण बसु को हिंदू मेले के प्रेरकों और प्रवर्तकों में गिना जाता है।

उन्होंने स्वदेशी मेलों जैसे प्रयासों के माध्यम से समाज में अपनी संस्कृति, परंपरा और आत्मबोध के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया।

विविधता में एकता के लिए पांच बातों पर जोर

मोहन भागवत ने भारत की विविधता और सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख करते हुए सनातन संस्कृति को देश की एकता का प्रमुख आधार बताया। उन्होंने कहा कि भारत की परंपरा विभिन्न पंथों और जातियों को सम्मान देने की बात करती है।

समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए उन्होंने पांच प्रमुख विषयों पर ध्यान देने की अपील की:

भागवत के मुताबिक, इन पांच विषयों को जीवन में अपनाकर समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।

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