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सतरह बरस की उमर में बनीं संगीत निर्देशिका का मो. रफी ने गाया गीत

Happy Birthday Usha Khanna:”दिल देके देखो, दिल देके देखो ,दिल देके देखो जी, दिल लेने वाले दिल देना सीखो जी. ..” 1959 की फिल्म ‘दिल देके देखो’ का ये शीर्षक गीत ज़रा ग़ौर से सुनके देखिएगा ,जिसमें एक ही बात कितनी दफा कही गई है पर कितनी अलग अलग तर्ज़ में कि वो हर दफा नई लगती है और गाने का लुत्फ भी बरक़रार रखती है और ये किसी महिला संगीत निर्देशक की, फिल्मों के लिए बनाई गई वो धुन थी जिसने न केवल आम जन को अपनी ओर खींचा बल्कि फिल्म इंडस्ट्री में भी तहलका मचा दिया क्योंकि वो जद्दन बाई और सरस्वती देवी के बाद हिंदी फिल्म उद्योग में प्रवेश करने वाली तीसरी महिला संगीत निर्देशक बनीं और सफल भी हुईं, अब तो आप समझ गए होंगे कि किस महिला संगीतकार की धुनों ने ये कमाल दिखाया था जी हां ये हैं ऊषा खन्ना जिनकी धुनें न केवल सबसे मुख़्तलिफ़ थीं बल्कि दिलकश भी थीं ,हम सच कह रहे हैं या नहीं इस बात का अंदाज़ा आपको लग जाएगा ज़रा सुन के देखिएगा ,गीत, “तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है…”
या ,”मैने रखा है मोहब्बत अपने अफसाने का नाम…”


“दिल के टुकड़े टुकड़े कर के मुस्कुरा के चल दिए ” यहां हम आपको बता दें कि ‘दादा’ फिल्म के इस गीत को ऊषा खन्ना के संगीत निर्देशन में बेहद खूबसूरती से गाने के लिए येसुदास ने फिल्म फेयर पुरस्कार जीता था , और गाने याद करें तो ” हम तुमसे जुदा होके ..” और हर भारतवासी को प्रगति पथ पर अग्रसर करने में एक नया जोश भरता गीत ,
“छोड़ो कल की बातें … ” के संगीत ने एक ऐसा जादू चलाया जिसमें हम आज भी झूम रहे हैं और इन नग़्मों के साथ हम फिल्म ‘सौतन’ का संगीत कैसे भूल सकते हैं जिसके लिए ऊषा जी को फिल्मफेयर में नामांकन मिला था ।

कैसे बनाई जगह इस पुरुष प्रधान क्षेत्र में :-

उनके फिल्मी सफर की शुरुआत की बात करें तो ओपी नैयर ने ऊषा खन्ना को शशधर मुखर्जी से मिलवाया जिन्हें ऊषा जी ने खुद का लिखा और संगीतबद्ध किया गीत गा के सुनाया , तो शशधर मुखर्जी उनसे इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने ऊषा जी को एक साल तक रोज़ दो गाने बनाने के लिए कहा और चंद महीनों बाद ही, उन्हें बतौर संगीतकार अपनी फिल्म ‘दिल देके देखो’ (1959) के लिए साइन कर लिया ,ये वो फिल्म थी , जिसने अभिनेत्री आशा पारेख को भी रुपहले पर्दे पर पहली बार पेश किया और एक बड़ी हिट साबित हुई फिर शशधर मुखर्जी ने उन्हें आशा पारेख अभिनीत एक और 1961 की फिल्म ‘हम हिंदुस्तानी’ के लिए साइन किया ।
इसके बाद वो एक से बढ़कर एक नायाब धुनों से सजे गीत हमारे लिए लाती रहीं ,
उन्होंने ज़्यादातर आशा भोसले के गीतों में अपना संगीत दिया, आशा जी उन्हें अपनी बेटी कहती थीं आप दोनों के साथ मोहम्मद रफी के गए गाने बहुत लोकप्रिय हुए और इस तिकड़ी ने “दिल देके देखो “के अलावा भी कई हिट गाने हमें दिए जैसे :- ‘हवस’ (1974), ‘साजन की सहेली’ (1981) और ‘आप तो ऐसे ना थे’ (1980)।

बचपन से गाने लिखती और संगीत बनाती थीं :

7 अक्टूबर 1941 को मध्यप्रदेश के ग्वालियर ज़िले में जन्मीं ऊषा के पिता मनोहर खन्ना एक शास्त्रीय गायक थे, और ग्वालियर राज्य के जल विभाग में कार्यरत थे। संगीत के प्रति प्रेम पैदा करने का श्रेय उषा अपने पिता को देती हैं। गीतकार इन्दीवर यानी श्यामलाल बाबू राय, उषा के पिता के मित्र थे। इनकी संगत में पली बढ़ी उषा, छोटी उम्र से ही मुखड़ा लिखा और गाया करतीं थीं। ऊषा खन्ना ने, निर्देशक, निर्माता, गीतकार, सावन कुमार से शादी की जिन्होंने उनके कई गीतों को दिलनशींं बोलों से सजाया और उन्होंने ग्यारह फ़िल्मों का निर्देशन और निर्माण किया जिनमें ऊषा खन्ना ने संगीत दिया था।
ऊषा खन्ना अक्सर अरबी संगीत से प्रेरणा लेती थीं , जो उन्हें बहोत पसंद था शायद इसीलिए उनका संगीत आज भी हर संगीत प्रेमी को आकर्षित कर लेता है। उषा खन्ना ने बतौर पार्श्व गायिका भी कुछ गीत गाए।


उनके गाने सदाबहार नग़्मों की तरह आज भी पसंद किए जाते हैं कुछ फिल्में उनके संगीत के लिए बहुत याद की जाती हैं जैसे -‘शबनम’,’आंख मिचोली’,’सौतन’,’साजन की सहेली ‘,’लाल बंगला ‘,’दादा ‘,’दो खिलाड़ी ‘,’हंसते खेलते’,’निशान’,
‘बंदिश’,’फ़ैसला’,’एक सपेरा एक लुटेरा’,’अलीबाबा मर्जिना ‘,’साजन बिना सुहागन ‘,’ नागिन और सुहागिन’,’मेरी बीवी की शादी ‘,’बिन फेरे हम तेरे’,’होटल ‘,और ‘बेवफा से वफा’ ।
उनके कुछ और मशहूर गीत है जो अक्सर संगीत प्रेमियों की जुबाँ पर आ जाते हैं पर हम भूल जाते हैं कि ये ऊषा खन्ना के संगीत निर्देशन में ढले हैं तो हम आपको याद दिला देते हैं ,
“गा दीवाने झूम के” फिल्म (फ्लैट नंबर 9) और ‘शायद मेरी शादी का ख्याल” फिल्म (सौतन) से को भी आपने ही संगीतबद्ध किया है।

नये गायकों को दिया मौक़ा :-

ऊषा खन्ना जी ने ग़ैर फिल्मी गीतों के लिए भी संगीत दिया तो वहीं कई भाषाओं के गीतों को भी अपने संगीत से सजाया जिनमें मलयालम फिल्म ‘मूडल मंजू ‘ (1969) को आज भी मलयालम के कुछ बेहतरीन गानों में शामिल किया जाता है,
उन्होंने उन गायकों को मौका दिया, जो उस समय बहुत कम जाने जाते थे जिनमें अनुपमा देशपांडे, पंकज उधास, हेमलता, मोहम्मद अज़ीज़, रूप कुमार राठौड़, शब्बीर कुमार और सोनू निगम ने अपनी एक अलग पहचान बना ली । नब्बे के दशक के मध्य तक ऊषा खन्ना बतौर संगीतकार काफी सक्रिय रहीं।
(1959) की फिल्म ‘दिल देके देखो’ में संगीत निर्देशक के रूप में अपनी शुरुआत करने के बाद 40 से अधिक वर्षों बाद भी वो कुछ फिल्मों और टेलीविजन धारावाहिकों के लिए संगीत बनाती रहीं और 1960 से 1980 के दशक तक 3 दशकों से अधिक समय तक सक्रिय रहीं। उनकी आखिरी फ़िल्म 2003 में आई फ़िल्म ‘दिल परदेसी हो गया’ ,थी पर वो अपनी अनुपम धुनों से संगीत प्रेमियों के दिलों के क़रीब हैं और हमेशा रहेंगीं ।

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