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Meena Kumari Movie Pakeezah: 15 साल में बनी ब्लॉकबस्टर, जिसने मीना कुमारी को अमर कर दिया

Meena Kumari Movie PakeezahMeena Kumari Movie Pakeezah

Meena Kumari Movie Pakeezah

Author Nazia Behum | हर फिल्म हमसे कुछ कहती है पर कुछ फिल्में ऐसा कुछ कह जाती हैं जिनके चर्चे सदियों तक होते रहते हैं और ऐसी ही फिल्मों में से एक हैं मीना कुमारी के बेमिसाल अभिनय से सजी , कमाल अमरोही के निर्देशन में बनी फिल्म पाकीज़ा जो 4 फरवरी 1972 को रुपहले पर्दे पर जगमगाई और जिसे बनने में 14 साल लगे पर आखिर इतना वक्त क्यों लगा? तो आइए हम आपको बताते हैं इसके पीछे की वजह के साथ इससे जुड़े कुछ और भी क़िस्से…

दरअसल पाकीज़ा फिल्म का ख्वाब कमाल अमरोही ने देखा था, जब उनका और मीना कुमारी का प्यार परवान चढ़ रहा था बावजूद इसके कि कमाल साहब पहले से शादीशुदा थे , मीना कुमारी जी की खूबसूरती और नफासत से भरी अदाकारी को देखकर उन्हें ये ख्याल आया कि वो अपनी इस फिल्म में बतौर हीरोइन मीना जी को ही लेंगे क्योंकि उस वक्त उनके दिमाग में जो कहानी थी वो जद्दन बाई और गौहर जान की ज़िंदगी के इर्द गिर्द घूम रही थी जो हुनर और ज़ेहानत की मिसाल थीं और मीना कुमारी में ये काबिलियत थी कि वो बड़ी संजीदगी से इसे पर्दे पर उकेर सकती थीं,

ख़ैर मीना जी भी राज़ी हो गईं जल्दी ही आप दोनों ने निकाह भी कर लिया , फिल्म के हीरो के रूप में चुना गया धर्मेंद्र जी को ,शूटिंग शुरू हुई और मीना जी नए नवेले धर्मेंद्र जी के साथ काफी जल्दी घुल मिल गई ,दोनों की कैमिस्ट्री बहोत अच्छी लग रही थी लेकिन कमाल अमरोही जी की आंखों में चुभ रही थी इस वजह से उन्होंने धर्मेंद्र जी को हटा कर राजकुमार साहब को ले लिया हालांकि कई सीन शूट हो चुके थे जिसे आप धर्मेंद्र जी के पीछे से लिए गए शॉर्ट में पहचान सकते हैं जैसे ट्रेन के पीछे भागते हुए फिल्म का वो दृश्य , जिसमें जब ट्रेन के अंदर का दृश्य दिखाया जाता है तो धर्मेंद्र की जगह राजकुमार होते हैं जो नायिका साहिबजान के खूबसूरत पांव को देखकर कहते है ये पांव बहुत हसीन हैं इन्हें ज़मीन पर मत रखिएगा ये मैले हो जायेंगे और राज कुमार की दिल्नशीं आवाज़ में ये डायलॉग बेहद मशहूर हुआ ,पर मीना कुमारी यानी महजबीं जी अपने शौहर के इस मिज़ाज से बेहद परेशान हो चुकी थीं

उनके शक़ के दायरे में रहने की वजह से उन्होंने कमाल अमरोही को छोड़ने का फैसला लेते हुए घर छोड़ दिया था और फिल्म रुक गई कुछ बरस बाद इस अधूरी फिल्म को खय्याम जगजीत कौर ,नर्गिस और सुनील दत्त ने देखा और कमाल जी से फिल्म पुरी करने को कहा तब कहीं जाकर कमाल साहब मीना जी के पास ये गुज़ारिश लेकर पहुंचे कि बेशक वो उन्हें छोड़ दें पर फिल्म पूरी कर दें क्योंकि इसमें बहोत लोगों का पैसा लगा है ,ये सुनकर मीना मान तो गईं पर इस शर्त पर कि वो अब केवल एक सिक्का ही मेहनताना लेंगी ।

मायूसी में घिरीं मीना कुमारी –

मीना जी ने फ़िल्म करने के लिए हां तो करदी पर वो अपनी ज़िंदगी से इतना मायूस हो चुकी थी कि अब उनकी तबियत साथ नहीं दे रही थी वो बीमार रहने लगी थीं ,पेट और चेहरे में सूजन आने लगी थी और शराब की भी आदी हो चुकी थीं जिसकी वजह से कभी कभी शूटिंग ही कैंसिल करनी पड़ती थी क्योंकि इसे पर्दे पर छुपाना बेहद मुश्किल होता था ,

एक बार कमाल साहब के बेटे ताजदार अमरोही ने बताया था कि अब्बू छोटी अम्मी की सूजन को छुपाने के लिए उनके हिसाब से कपड़े चूज़ करते थे और मौसम है आशिकाना …गाने के पिक्चराइज़ेशन में इसी लिए उन्हें कुर्ता और लुंगी पहनाई गई थी जो आगे चलकर एक ट्रैंड बन गया। ये तो थीं पर्दे के पीछे की कहानी अब बात करते हैं पर्दे पर झिलमिलाती कहानी की जो तवायफ की है पर इतनी पाकीज़गी का एहसास है इसमें कि नायिका साहिबजान को नायक राजकुमार ने नाम दिया पाकीज़ा और फिल्म का नाम भी इसीलिए पाकीज़ा रख दिया गया, जाने क्या क्या दूसरे नामों को दर किनार करते हुए इस चुनाव ने भी फिल्म मेकिंग में काफी वक्त ज़ाया किया था।

खैर हम आगे बढ़ते हैं और फिल्म के उस दमदार सीन को याद करते हैं जिसमें साहिबजान को उसके नवाब महबूब ने मोहब्बत में पाकीज़ा नाम देकर अज़ीम बना दिया उसकी इज़्ज़त अफ़ज़ाई की उसे निकाह करना चाहा लेकिन साहिबजान ने क़दम पीछे कर लिए क्योंकि उसे यक़ीन नहीं आया कि साहिबजान नाम से बेइज़्ज़त करने वाला ज़माना उसे इतने पाक नाम से क़ुबूल करेगा।
हालांकि उसी ज़माने को रश्क़ था उसकी किस्मत पे इसका अंदाज़ा आप इस तरह लगा सकते हैं जब ,साहिबजान के कोठे के सामने वाले छज्जे से दूसरी तवायफ कहती है…
“कल हम एक मुजरे में जा रहे हैं..एक दिन के लिए तुम्हारी तक़दीर हमें चाहिए, परसों लौटा देंगे.”
और साहिबजान मायूसी और बेरुखी से जवाब देती है
“हाँ हाँ ज़रूर ले जाना मेरी तक़दीर, फिर चाहे वापस भी मत करना.”
अब ये समझना है हमें है कि ये साहिबजान की बेबसी है, बेक़रारी है या दोराहे पर खड़ी उसकी कश्मकश है ।
बेशक़ ये कहानी हमारे लिए नई नहीं है यही होता है जब बदनाम गलियों में पलने वाला इश्क़ इज़्ज़तदार घराने के चश्म ओ चिराग़ की बाहों में पनाह चाहता है पर ये संजीदगी और नफासत से उमड़े अदाकारी के जलवे केवल आपको पाकीज़ा में ही मिल सकते हैं ।

हुस्न और इश्क़ का वहीं दौर फिर चल पड़ा-

ये दो पीढ़ियों के प्यार की एक ही दास्तां है, पर एक कहानी अधूरी है तो दूसरी इश्क़ की अनोखी मिसाल कायम करती मंज़िल ए मक़सूद पर पड़ाव डालती मुकम्मल कहानी है ,जो शुरू होती है ,कोठे पर ही नरगिस और शहाबुद्दीन के परवान चढ़ते प्यार से ,जिसमें शाहबुद्दीन कमियाब होता है नरगिस को उन बदनाम गलियों से निकालकर अपने घर लाने में लेकिन उसके घर के मालिक ओ मुख़्तार हकीम साहब ने नरगिस को अपने घर की ज़ीनत बनाने से इनकार कर दिया ये सुनकर नरगिस शहाबुदीन को छोड़कर दूर निकल गई और एक कब्रिस्तान में उसकी डोली उतरी जहां एक औरत के साथ ग़रीबी में गुमनामी में उसने दिन गुज़ारे कब्रिस्तान तो उसने तलाश कर ही लिया था लेकिन शहाब के प्यार की निशानी उसके पास थी इसलिए मौत को थोड़ा इंतज़ार करना पड़ा ,

पर ये नरगिस की दिलरुबा आवाज़ का क़िस्सा था यूं ही खामोश कैसे हो जाता ,तो हुआ यूं कि
जौहरी के यहां ज़ेवर खरीदते वक्त उसकी बहन को साहिबजान के ज़ेवर दिख जाते हैं जो नरगिस की देखभाल करने वाली कब्रिस्तान की अजनबी औरत बेचने के लिए लाई थी क्योंकि इससे उनका गुज़ारा हो रहा था उस औरत के सहारे बहन नवाब जान , नरगिस तक पहुंच जाती है लेकिन तब तक नरगिस इस दुनिया से रुख़्सत हो जाती है उसकी बेटी को नवाब जान अपने साथ ले आती है मगर उसका कुछ सामान अपने साथ न लाकर उसे बेचने को कह देती है इस बात से बेखबर हो कर कि उस सामान में किताब के अंदर शहाबुद्दीन के नाम एक खत है जिसमें लिखा है कि वो आकर अपनी बेटी को ले जाए ख़ैर क़रीब 17 बरस बीत जाते हैं तब कहीं जाकर ये खत शहाबुद्दीन को मिलता और वो उनकी तलाश में उसी कब्रिस्तान पहुंचता है जहां नरगिस की कब्र उसे मिलती है और उसे पता चलता है कि उसकी बेटी नवाब जान के पास है, और जिन कोठों को उसकी मां ने रौशन किया था उन्हीं गलियों की रौनक बनने के लिए तवायफ साहिबजान ,नर्गिस की बेटी बनकर अभिनेत्री मीना कुमारी के डबल रोल के साथ तैयार हो जाती है।

इधर शहाबुद्दीन के आने की खबर सुनकर नवाब जान उसे तवायफ गौहर जान के पास भेजने के लिए ट्रेन में बिठा देती है और इस दौरान फॉरेस्ट ऑफिसर छोटे नवाब सलीम यानी शहाबुद्दीन के भतीजे इत्तफाक से रात में ट्रेन के उसी डिब्बे में ग़लती से आ जाते हैं नज़र बचाते हुए भी वो साहिबजान के हुस्न को अनदेखा नहीं कर पाते ,उस पर साहिब जान के पांव भी उनके पास आ जाते हैं क्योंकि साहिब जान नींद की आगो़श में हैं इश्क़ की इस कहानी में सलीम ने बस साहिबजान के हसीन पांव देखे और तारीफ करे बिना रह नहीं सका पर चूंकि साहिब जान सो रही थीं इसलिए उनके क़दमों के पास चंद अल्फाजों वाला खत रखकर चला गया जिसमें लिखा था ,”आपके पांव देखे बहुत हसीन हैं .
इन्हें ज़मीन पर मत उतारिएगा मैले हो जाएँगे.”


जागने के बाद ये खत जिस वक्त से साहिबजान ने पढ़ा उसके लिए ये तावीज़ हो गया जिसे वो पहनती फिरती और कलमे की तरह रटती रहती अपनी मंज़िल पे पहुंच कर ट्रेन से उतर तो जाती है लेकिन हर रात ट्रेन की आवाज़ उसके कानों में गूंजती और वो कह उठती ,”यूं ही को मिल गया था सरेराह चलते चलते.. “
एक अनजान शख़्स से उसका ये प्यार बढ़ता ही जाता है तब उसकी दोस्त समझाती है कि जिस वक्त इन पांवों की तारीफ की गई उस वक्त इन पैरों में घुघरू नहीं बंधे थे अगर बंधे होते तो इनकी बेबसी भी दिख जाती और कोई शरीफ आदमी इन्हें देखना तक गवारा न करता ।


खैर क़िस्मत दोबारा साहिबजान को सलीम से मिलवा ही देती है और इत्तेफ़ाक से उसके साथ एक हादसा होता है और उसकी नाव बहते बहते जंगल में लगे सलीम के खेमे के पास जाकर रुकती है और साहिबजान और सलीम समझ जाते हैं कि वो पहले मिल चुके हैं यहां गीत है मौसम है आशिकाना …। साहिब ,सलीम का इंतज़ार कर ही रही थी कि नवाबजान उसको लेने आ जाती है और वो फिर अपने कोठे पहुंच जाती है जहां एक दरिंदगी का शिकार होती है और वहां से रात के अंधेरे में भागते हुए ट्रेन की पटरियों में उलझ कर बेहोश हो जाती है जब आंख खुलती है तो खुद को सलीम की बाहों में पाती है वो उसे बताना नहीं चाहती कि वो कौन है इसलिए कह देती हैं उसे कुछ याद नहीं सलीम उसे अपने घर ले जाता है पर वहां फिर पुरानी कहानी दोहराई जाती है सब उसके बारे में बिना जाने उसे घर मे रखने को तैयार नहीं होते और सलीम उसे लेकर वहां से चला आता है जिसके बाद साहिब इसे अपना सच बताती है और सलीम तब भी उसे कुबूल करता है
दोनों के मिलन की कहानी कहता है गीत चलो दिलदार चलो चांद के पर चलो…,


लेकिन जब निकाह करने को कहता है तो ज़माना सलीम को बहुत रुसवा करता है साहिबजान के नाम पर ज़माने से लड़ता हुआ सलीम ख़ूना खून हो जाता है ,ये देखकर साहिबजान पाकीज़ा के नाम पर भी निकाह नहीं कुबूल कर पाती और फिर उन्हीं गलियों में लौट आती है सलीम भी मायूस हो जाता है और अपने घर वालों की मर्जी़ से शादी करने को तैयार हो जाता है जिसमें साहिबजान को मुजरे के लिए बुलाया जाता है जहां साहिब जान गाती है ,तीर ए नज़र देखेंगे ज़ख्म ए जिगर देखेंगे…,

मीना कुमारी जी के लिए बॉडी डबल का किया गया इस्तेमाल:-

पर्दे के पीछे की, मगर ग़ौर करने वाली बात ये है कि फिल्म आखिरी पड़ाव पे पहुंच रही थी और अभिनेत्री मीना कुमारी जी की तबियत खराब होने लगी थी इस गाने में डांस भी इतना जोशीला था कि दिल के दर्द उभर आए ऐसे में कमाल अमरोही साहब ने बॉडी डबल का इस्तेमाल करते हुए अभिनेत्री पद्मा खन्ना जी से घूंघट में डांस करवाया।

अब डांस हुआ और जज़्बातों का वो सैलाब उमड़ा कि कांच के फानूस गिर पड़े और वो पांव ज़ख्मी हो गए जिन्हें सलीम ने कहां था ज़मीन पे मत रखिएगा मैले हो जायेंगे , साहिब की खाला के दिल में बंधा सब्र का बांध भी टूट गया और उन्होंने बता दिया कि ये तुम्हारा ही लख्त ए जिगर है जो तुम्हारी महफिल सजाने आई है बस फिर क्या था हकीम साहब ने ये बात मानने से इनकार कर दिया और गोली चला दी जो साहिब जान को बचाते हुए उसके अब्बू शहाबुद्दीन को लग गई पर आखिरी वक्त पर उन्होंने सलीम से नवाबजान की इस शर्त पर वादा ले लिया कि वो अपनी बारात कोठे पर ले जाएगा उनके जनाज़े के साथ साहिब जान की डोली कोठे से ही उठेगी और यही है फिल्म का आखिरी सीन है जो रुकता है दुल्हन की रुख़्सती के बाद कोठे की दूसरी तवायफ के चेहरे पर जिसमें ऐसी ही हसरत भरी निगाहें हैं जो इज़्ज़त के इंतज़ार में बेक़रार हैं ,मानो उसके दिल में कई सवाल हैं कि क्या वो भी कभी दुल्हन बन पाएगी ?इन गलियों की बदनामी के लिए कौन ज़िम्मेदार है?क्या ये बाज़ार कभी बंद होंगे? इनमें क़ैद पाक रुहें क्या कभी आज़ाद होंगी?

यहां हम आपको ये भी बता दे कि दिल्ली और लखनऊ के कोठे की तर्ज़ पर इन गलियों यानी बाज़ार ए हुस्न को बनाने में भी कमाल साहब को 6 महीने लग गए थे ।
कॉस्ट्यूम डिज़ाइन किए थे खुद मीना कुमारी जी ने तो
जगमगाते ज़ेवर जयपुर से आए थे और शूटिंग के दौरान साज सज्जा के सामान ,गुलदान और इत्रदानी तक असली रखी जाती थीं.
गीत संगीत की बात करें तो —
फिल्म का हर गीत बेमिसाल है कहीं ठुमरी की झंकार,कौन गली गयो श्याम ….,है तो कही मुजरे की बहार है
हर एक नग़्मा अनमोल नगीना है —
पर इसे बनाने में भी वक्त इसलिए ज़्यादा लगा क्योंकि
फ़िल्म के दौरान ही संगीतकार ग़ुलाम मोहम्मद गुज़र गए तो नौशाद साहब को आगे का काम सौंपा गया।
साहिबजान के दिल के जज़्बात बयान करती है ,
चलते रुकते संगीत के बीच
रेल की सीटी जो अंधेरे में उम्मीदों के हजारों चिराग़ जला जाती है ,
उसपे भी लता जी की आवाज़ एक तिलिस्म की मानिंद है।
नग़्मा निगारों की फेहरिस्त देखें तो —
मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा गीत (ठाड़े रहिओ), कैफ़ी आज़मी ने लिखा (चलते चलते यूँ ही कोई..) और कैफ़ भोपाली की कलम से जलवा अफ़रोज़ हुआ (चलो दिलदार चलो) मौसम है आशिक़ाना के क्या कहने वो तो ख़ुद कमाल अमरोही जी ने कलम बद्ध किया था।

‘इन्हीं लोगों ने गाना बेहद खास है’

क्योंकि इस बार इसे नए कलेवर में पेश किया गया था इससे पहले इसे 1941 में फ़िल्म ‘हिम्मत’ के लिए शमशाद बेगम ने गाया था फिर ‘आबरू’ में याकूब की आवाज़ में आप इसे सुन सकते हैं।

कमाल अमरोही का कमाल

कमाल अमरोही ने इस फिल्म के लिए बहुत मेहनत की, विदेश जाकर महंगे लेंस खरीदे पर उस वक्त इसे सेट करना पड़ता था जिसमें उन्हें बहुत मुश्किल हुई और इतने बेहतरीन फिल्मांकन के बावजूद उन्होंने माना कि सब आउट ऑफ फोकस शूट हुआ है जिसे फिर साबित भी किया गया ।

छायांकन की छठा भी थी बहुरंगी

क्योंकि जर्मन सिनेमेटोग्राफ़र जोसेफ़ वर्शिंग भी बीच फ़िल्म में ही गुज़र गए थे जिसके बाद कई सिनेमेटोग्राफ़रों ने मिलकर इस फ़िल्म को पूरा किया।

इस फिल्म से जुड़ा मध्य प्रदेश का क़िस्सा भी मशहूर है

वो ये कि इस फिल्म की शूटिंग के दौरान पूरी टीम शिवपुरी गई हुई थी जहां से लौटते वक्त रस्ते में गाड़ी का पेट्रोल खत्म हो गया,आबादी से दूर होने और आधी रात हो जाने की वजह से कोई और साधन नहीं था तो सब गाड़ी पर ही रुके हुए थे ऐसे में अचानक कुछ लोगों ने उन्हें आकर घेर लिया और उसके मुखिया ने कमाल अमरोही और मीना जी की अच्छी खासी खातिर तवज्जो की उसके बाद बताया कि वो मीना जी का बहोत बड़ा फैन है और उसे उनका ऑटोग्राफ चाहिए लेकिन उसके पास पेन की जगह चाकू था जिसे देखकर मीना जी बहोत डर गईं,फिर जाने कैसे नाम लिखा जिसके बाद वो इतना खुश हो गया कि उसने उनके जाने का इंतज़ाम भी करवा दिया,बाद में सबको पता चला कि मीना कुमारी को क़रीब से देखकर होश खो देने वाला वो शख़्स मध्य प्रदेश का कुख्यात डाकू अमृत लाल था।

फिल्म के नाम कोई अवॉर्ड नहीं फिर भी कैसे बन गई अनमोल कृति

इस फिल्म को देखकर यूं लगता है मानो, मीना जी ने बखूबी अपना फ़र्ज़ निभाया है ,उन्हें इंतज़ार था कमाल अमरोही के ख्वाब की ताबीर मिलने का खुदा ने उन्हें जो हुनर बख़्शा था मानो उसका आखिरी इम्तहान थी पाकीज़ा जो रिलीज़ हुई 4 फ़रवरी 1972 को और मीना कुमारी जी ने 31 मार्च 1972 को इस दुनिया ए फ़ानी को अलविदा कह दिया. मीना कुमारी ने अपना हर सीन आखिरी समझ कर अदा किया तो वहीं कमाल अमरोही जी ने अपनी चंद फिल्मों में पाकीज़ा को बना कर फिल्म जगत में हमेशा के लिए अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित करवा लिया। हमने तो इसमें बहोत कुछ ख़ास देखा है , और एक मुख़्तसर सा क़िस्सा आपको सुना दिया है अब आप सोचिए कि क्या आप भी पाकीज़ा को देखना चाहेंगे ?खोना चाहेंगे नफासत , नज़ाकत , मोहब्बत और शफ़क़त के जहां में. .

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