Mamta Banerjee TMC Break : पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से वामपंथ और तृणमूल कांग्रेस के बीच जंग के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी के सामने सबसे आक्रामक चुनौती उनके पूर्व सहयोगी शुभेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) के रूप में उभर रही है। शुभेंदु कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने जाते थे, लेकिन 2020 में बीजेपी में शामिल होने के बाद उन्होंने बंगाल में हिंदुत्व राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा बनना शुरू कर दिया है। अब उनकी रणनीति सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि वैचारिक लड़ाई की भी दिख रही है। वर्तमान में शुभेंदु बंगाल के मुख्यमंत्री हैं और ममता विपक्ष की नेता।
शुभेंदु अधिकारी खींच रहें बंगाल में हिंदुत्व लाइन
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि शुभेंदु अधिकारी समझ चुके हैं कि बंगाल में बीजेपी को स्थायी जमीन तभी मिलेगी, जब वह अपनी वैचारिक पहचान को साफ और मजबूत बनाए रखे। बंगाल में करीब 70 प्रतिशत हिंदू आबादी है, जबकि एक तिहाई मुस्लिम भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ऐसे में शुभेंदु खुद को “हिंदू हितों के सबसे मुखर नेता” के रूप में स्थापित कर रहे हैं। यह काम उन्होंने 2021 में बीजेपी के विधानसभा चुनाव हारने के बाद से ही शुरू किया था। अब वह पहले से ज्यादा मुखर होकर रामनवमी शोभायात्रा, वक्फ, घुसपैठ, सांप्रदायिक हिंसा जैसे मुद्दों पर अपनी राय रखते हैं। उनकी भाषा और शैली लगातार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसी हो गई है। चाहे रामनवमी शोभायात्रा का मामला हो या सांप्रदायिक तनाव, शुभेंदु हर मुद्दे पर आक्रामक रुख अपनाते हैं।
क्या बीजेपी बंगाल में लाना चाहती है ‘योगी मॉडल’ ?
बंगाल में बीजेपी के अंदर यह धारणा मजबूत हो चुकी है कि सिर्फ विकास और भ्रष्टाचार विरोधी राजनीति से ममता बनर्जी को चुनौती देना आसान नहीं है। इसलिए पार्टी अब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को अधिक स्पष्ट रूप से सामने ला रही है। शुभेंदु अधिकारी इसी रणनीति का प्रमुख चेहरा बनते दिख रहे हैं। बीजेपी यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि बंगाल में भी “मजबूत हिंदू नेतृत्व” का विकल्प मौजूद है। यही कारण है कि शुभेंदु लगातार ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं जो सीधे धार्मिक और पहचान आधारित राजनीति से जुड़े हैं। उनके समर्थक मानते हैं कि इससे हिंदू वोटों का व्यापक ध्रुवीकरण हो सकता है।
बंगाल में कमजोर पड़ रही ममता बनर्जी की राजनीति
ममता बनर्जी लंबी अवधि से अल्पसंख्यक हितैषी और कल्याणकारी राजनीति के लिए जानी जाती हैं। बीजेपी लगातार उन पर तुष्टिकरण का आरोप लगाती रही है। शुभेंदु अधिकारी इसी नैरेटिव को और धार देने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, टीएमसी इसे बंगाल की सामाजिक संरचना और सांप्रदायिक सौहार्द पर हमला बताती है। ममता बनर्जी कई बार सार्वजनिक मंचों से कह चुकी हैं कि बीजेपी बंगाल को उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसी सांप्रदायिक राजनीति की ओर ले जाना चाहती है। लेकिन जमीन पर बीजेपी का वोट प्रतिशत पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है।
2011 में ममता की सरकार आने के बाद से ही धार्मिक और पहचान आधारित राजनीति का उभार हुआ है। 2014 में बंगाल में बीजेपी का वोट शेयर लगभग 17 प्रतिशत था, जो 2019 में बढ़कर करीब 40 प्रतिशत तक पहुंच गया। यह बदलाव सिर्फ संगठन का नहीं, बल्कि पहचान आधारित राजनीति के उभार का संकेत है।
क्या बंगाल हिंदू राजनीति का प्रयोगशाला बन रहा है
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले विधानसभा चुनावों तक बंगाल सिर्फ क्षेत्रीय लड़ाई नहीं रहेगी, बल्कि यह राष्ट्रीय राजनीति का सबसे बड़ा वैचारिक रणक्षेत्र भी बन सकता है। एक तरफ ममता बनर्जी की “बंगाली अस्मिता और सेक्युलर राजनीति” होगी, तो दूसरी तरफ शुभेंदु अधिकारी और बीजेपी का “स्पष्ट हिंदुत्व मॉडल”। अगर बीजेपी यहां मजबूत हिंदुत्व एजेंडे के सहारे सत्ता तक पहुंचती है, तो इसका असर सिर्फ बंगाल ही नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों की चुनावी रणनीतियों पर भी पड़ेगा।
पश्चिम बंगाल को लंबे समय तक वामपंथ, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्ष राजनीति का गढ़ माना जाता रहा है। लेकिन पिछले एक दशक में सामाजिक और राजनीतिक समीकरण तेजी से बदले हैं। 2011 के बाद ममता की राजनीति पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के आरोप लगे, जिससे बीजेपी को हिंदू ध्रुवीकरण का मौका मिला। 2014 के लोकसभा चुनाव में बंगाल में बीजेपी का वोट शेयर करीब 17 प्रतिशत था, जो 2019 में बढ़कर लगभग 40 प्रतिशत हो गया।
बंगाल में घुसपैठ से हारी टीएमसी
बंगाल में सीमा पार घुसपैठ, NRC-CAA, रामनवमी शोभायात्रा, दुर्गा विसर्जन और वक्फ जैसे मुद्दों ने धार्मिक पहचान को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। बीजेपी अब बंगाली हिंदू अस्मिता को राष्ट्रीय हिंदुत्व नैरेटिव से जोड़ने की कोशिश कर रही है। शुभेंदु अधिकारी जैसे नेता इसी मॉडल को आगे बढ़ा रहे हैं, जिसमें “सांस्कृतिक असुरक्षा” को राजनीतिक ऊर्जा में बदला जाता है।
हिंदुत्व अब सिर्फ चुनावी मुद्दा नहीं, समाज का नैरेटिव है
राजनीतिक विश्लेषक राजेश भारती का मानना है कि बंगाल में हिंदू राजनीति का प्रयोगशाला बनना संभव है। उन्होंने कहा कि बंगाल में आजादी के बाद पहले 25 साल तक वामपंथ का अधिपत्य रहा, उसके बाद 34 साल तक कम्युनिस्ट पार्टी का शासन रहा। कम्युनिस्टों ने धर्मनिरपेक्षता का समर्थन किया, लेकिन हकीकत यह है कि उन्होंने मुसलमान वोट बैंक का राजनीतिक इस्तेमाल किया। इसके बाद 15 साल तक ममता बनर्जी की टीएमसी ने बंगाल पर राज किया। उन्होंने मुसलमानों का खुलकर समर्थन किया। उन्होंने माना कि मुसलमानों को पूरी तरह जोड़ लिया जाए तो टीएमसी कभी सत्ता से बाहर नहीं होगी।
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