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मल्हारराव होल्कर: गड़रिए का लड़का कैसे बना इंदौर का राजा?

Malhar Rao Holkar History In Hindi: भारतीय इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जहाँ साधारण परिवारों में जन्मे लोगों ने अपनी प्रतिभा, साहस और नेतृत्व के बल पर बड़े-बड़े राज्य स्थापित किए। मध्य भारत की प्रसिद्ध इंदौर रियासत का इतिहास भी ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है। बहुत कम लोग जानते हैं कि इंदौर रियासत की नींव रखने वाले मल्हारराव होल्कर का संबंध एक ऐसे समुदाय से था, जो परंपरागत रूप से भेड़पालन और चरवाही से जुड़ा था। लेकिन साधारण परिवार में जन्म लेने के बाद भी मल्हारराव की जीवन यात्रा असाधारण ही रही। यही गड़रिए का लड़का आगे चलकर इंदौर का शासक बना और मालवा में मराठा सत्ता की नींव मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई।

मल्हारराव होल्कर का जन्म और प्रारंभिक वर्ष

मल्हारराव होल्कर का जन्म 16 मार्च 1693 को महाराष्ट्र के पुणे जिले के जेजुरी के निकट नीरा नदी के तट पर स्थित होल गाँव में एक धनगर परिवार में हुआ था। धनगर समुदाय परंपरागत रूप से भेड़-बकरियाँ पालने और पशुपालन के कार्य से जुड़ा रहा है। हिंदी भाषी क्षेत्र में इस समुदाय को प्रायः गड़रिया समुदाय के समकक्ष माना जाता है। हालांकि उनका परिवार होल गाँव का साधारण पर प्रतिष्ठित परिवार था। उनके पिता का नाम खंडूजी वीरकर था, जो गाँव के पाटिल अर्थात मुखिया के अधीन चौगुला के पद पर कार्य करते थे। मल्हारराव होल्कर जब तीन वर्ष के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया था। जिसके बाद उनके रिश्तेदारों ने उनकी पिता की जमीन और संपत्ति पर अधिकार कर लिया था, इन विषम परिस्थितियों में उनकी माँ उन्हें लेकर, उनके मामा भोजराज के पास चली गईं।

सैन्य प्रशिक्षण की शुरुआत

दरसल उनकी माँ प्रतिष्ठित बारगल परिवार से थीं, जो खानदेश के तलोदे में रहते थे और मराठा सरदार कदंब बांडे के अधीन कृषि और सेना का कार्य करते थे। मल्हारराव अपनी मामा की भेड़ें चराते और उनकी माँ कृषि कार्य करती थीं। लेकिन होल्कर बचपन से ही बहुत साहसी थे, उनमें नेतृत्व और युद्ध कौशल के भी गुण थे, यही गुण आगे चलकर उन्हें भारतीय इतिहास के प्रमुख सेनानायकों में शामिल करने वाले थे। उनके इन्हीं गुणों को देखते हुए, उनके मामा भोजराज ने उन्हें घुड़सवारी और भाला चलाने का प्रशिक्षण दिलवाया और सरदार बांडे की सेना में नियुक्त करवा दिया।

दिल्ली अभियान में भागीदारी

18वीं शताब्दी की शुरुआत में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल सत्ता कमजोर होने लगी और मराठे तेजी से उभरने लगे। इसी दौर में, 1718–19 में पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने सैय्यद बंधुओं की मदद के लिए दिल्ली अभियान किया। युवा मल्हारराव भी सरदार पंधारे के अधीन शिलेदार, यानी घुड़सवार सैनिक के रूप में इस अभियान में शामिल हुए। इस अभियान में मल्हारराव ने अपने साहस और सैन्य कौशल से अलग पहचान बनाई। उन्हें यश, सम्मान और धन मिला। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि पेशवा के युवा पुत्र बाजीराव की नजर मल्हारराव की प्रतिभा पर पड़ी। यही पहचान आगे चलकर दोनों के बीच एक मजबूत सैन्य और राजनीतिक संबंध की नींव बनने वाली थी।

मल्हारराव की पारिवारिक चुनौतियाँ

अभियान से लौटने के बाद मल्हारराव के जीवन में एक नया मोड़ आया। उनके मामा भोजराज, उनकी प्रतिभा और साहस से प्रभावित होकर अपनी बेटी गौतमाबाई का विवाह उनसे करना चाहते थे। दिल्ली अभियान की सफलता ने उनके इस विश्वास को और मजबूत कर दिया कि मल्हारराव आगे चलकर बड़ी ऊँचाइयाँ हासिल करेंगे। हालाँकि, उनकी पत्नी इस विवाह के पक्ष में नहीं थीं, फिर भी विवाह हो गया। लेकिन विवाह के बाद भी सास का अपनी बेटी और दामाद के पारिवारिक जीवन में हस्तक्षेप जारी रहा, जिससे घरेलू तनाव बढ़ने लगा। परिवार की शांति और सम्मान बनाए रखने के उद्देश्य से मल्हारराव ने तलोडा छोड़ना ही उचित समझा और निकटवर्ती बड़वानी राज्य में चले गए।

बड़वानी में कूटनीति का प्रदर्शन

उस समय बड़वानी पर सिसोदिया राजपूतों का शासन था और मराठों के लगातार हमलों से राज्य परेशान था। ऐसे समय में मल्हारराव ने अपनी सैन्य कुशलता से बड़वानी की रक्षा की और मराठों के हमलों को रोक दिया। लेकिन समस्या यह थी कि मल्हारराव खुद मराठा थे। उनकी इस कार्य की शिकायत पेशवा तक पहुँची। पेशवा ने उनसे जवाब माँगा, तो मल्हारराव ने लड़ाई का रास्ता अपनाने के बजाय दोनों पक्षों के बीच समझौता कराने की पेशकश की। उन्होंने बड़वानी के शासक को मराठों को कर और अभियान का खर्च देने के लिए राजी कर लिया। इस तरह बिना किसी बड़े संघर्ष के दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया। इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया कि मल्हारराव केवल वीर योद्धा और कुशल सेनानायक ही नहीं, बल्कि दूरदर्शी राजनीतिज्ञ और कुशल कूटनीतिज्ञ भी थे।

मल्हारराव का पेशवा की सेना में प्रवेश

बड़वानी मामले को बड़ी कुशलतापूर्वक सुलझाने के कारण पेशवा मल्हारराव से अत्यंत प्रसन्न हुए, और उन्हें मराठा राज्य में शामिल होने का निमंत्रण दिया। लेकिन मल्हारराव ने यह कहके यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया, उनकी जिंदगी के लिए कोई निर्णय उनके मामा भोजराज ही ले सकते हैं। जिसके बाद पेशवा ने अपने एक विश्वासनीय अधिकारी बालोजी प्रभु को भोजराज बारगल से बात करने के लिए तलोदा भेज दिया, इस सम्मानजनक प्रस्ताव से भोजराज अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने मल्हारराव को पेशवा की सेना में जाने की अनुमति दे दी। मल्हारराव, सरदार बांडे के बड़े भाई रघुजी के अनुमति से पेशवा की सेना में शामिल हो गए।

मल्हारराव के नेतृत्व में मराठों का मालवा अभियान

अप्रैल 1720 में पेशवा बालाजी विश्वनाथ के निधन के बाद उनके यशस्वी पुत्र बाजीराव पेशवा बने, वह सैनिक प्रतिभा को पहचानने की अद्भुत क्षमता रखते थे। उन्होंने मल्हारराव में केवल एक वीर घुड़सवार नहीं, बल्कि भविष्य के एक सक्षम सेनानायक की संभावनाएँ देखीं। आगे चलकर यही विश्वास दोनों के बीच गहरे राजनीतिक और सैन्य संबंधों का आधार बना। बाजीराव पेशवा के संरक्षण में मल्हारराव होल्कर का कद लगातार बढ़ता गया। अब वे केवल एक घुड़सवार सैनिक नहीं रह गए थे, बल्कि पेशवा के भरोसेमंद सैन्य सरदारों में शामिल हो चुके थे। लेकिन उनकी असली पहचान अभी मालवा के मैदान में बनने वाली थी। उस समय मालवा मुगल साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण प्रांत था और मराठा शासित दक्कन प्रांत से लगा हुआ था। औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल सत्ता लगातार कमजोर हो रही थी। दूसरी ओर मराठे उत्तर भारत की ओर तेजी से बढ़ रहे थे। बाजीराव का लक्ष्य केवल छापामार हमले करना नहीं था, बल्कि और क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित करके स्थायी प्रभाव स्थापित करना भी था। अब चूंकि मालवा दक्कन को उत्तरभारत से जोड़ता था, इसीलिए मालवा का क्षेत्र प्रसार के लिए मराठों का पहला लक्ष्य था।

मल्हारराव कैसे बने इंदौर के राजा?

मराठों का लक्ष्य मालवा से चौथ वसूलना और वहाँ अपना प्रभाव स्थापित करना था। इसी उद्देश्य से मल्हारराव होल्कर, राणोजी सिंधिया और उदाजी पवार लगातार मालवा में अभियान चला रहे थे। 1728 के अमझेरा युद्ध में चिमाजी अप्पा के नेतृत्व में मराठों ने मालवा के मुगल सूबेदार गिरधर बहादुर को पराजित कर दिया। इस विजय के बाद मालवा में मराठों का प्रभाव तेजी से बढ़ा और 3 अक्टूबर 1730 को मल्हारराव होल्कर को मालवा में मराठों का प्रमुख सरदार नियुक्त किया गया। लेकिन अभी मराठों का स्थायी अधिकार स्थापित नहीं हुआ था। 1732 में सवाई जयसिंह मालवा के सूबेदार बने। मल्हारराव ने उनकी रसद आपूर्ति रोककर उन्हें मंदसौर में घेर लिया। मजबूर होकर जयसिंह ने मराठों को 28 परगनों से चौथ वसूलने का अधिकार दिया और छह लाख रुपये भी दिए। मल्हारराव की इस सफलता से प्रसन्न होकर पेशवा बाजीराव ने 29 जुलाई 1732 को इन्हीं परगनों की जागीर उन्हें सौंप दी। इनमें कंपेल परगना भी था, जिसके अंतर्गत इंदौर का क्षेत्र आता था। यहीं से इंदौर और होल्कर परिवार का रिश्ता शुरू हुआ और एक साधारण धनगर परिवार में जन्मे मल्हारराव की एक प्रभावशाली शासक बनने की यात्रा प्रारंभ हुई।

इंदौर में मल्हारगंज सैन्य छावनी की स्थापना

इसके बाद मल्हारराव ने इंदौर क्षेत्र में अपनी सैन्य और प्रशासनिक उपस्थिति मजबूत करनी शुरू की। 1734 में उन्होंने यहाँ एक सैन्य शिविर स्थापित किया, जिसे बाद में मल्हारगंज के नाम से जाना गया। इंदौर उस समय उनके लिए केवल उनके जागीर का एक हिस्सा नहीं था, बल्कि तेजी से विकसित होता हुआ सैन्य और व्यापारिक केंद्र बन गया। क्योंकि चौधरी नंदलाल मंडलोई ने ही वहाँ पहली बार बसाहट प्रारंभ की थी और बाद मल्हारराव ने उसे सैनिक केंद्र बना दिया। आगे चलकर 1747 में उन्होंने यहाँ अपने निवास हेतु राजवाड़ा की भी नींव रखी, हालांकि उनकी बहू अहिल्याबाई अपनी राजधानी इंदौर से माहेश्वर ले गईं थीं।

मल्हारराव होल्कर ने अपनी बहू को बढ़ाया आगे

इंदौर में अपनी स्थिति मजबूत करने के बाद मल्हारराव ने यहीं से अपना शासन चलाना शुरू किया। आगे उन्होंने वसई में पुर्तगालियों के विरुद्ध अभियान में भाग लिया, बाजीराव के दिल्ली और भोपाल अभियानों तथा बाद में अफगानों के विरुद्ध पंजाब अभियान में भी हिस्सा लिया। लेकिन 1754 में भरतपुर के जाटों के विरुद्ध अभियान के दौरान उनके इकलौते पुत्र खंडेराव की मृत्यु हो गई। पुत्र-वियोग के बावजूद मल्हारराव ने अपनी पुत्रवधू अहिल्याबाई को सती होने से रोका और उन्हें आगे बढ़ने का अवसर दिया। यह उस दौर के रूढ़िवादी समाज में एक असाधारण निर्णय था। इसके बाद मल्हारराव ने तीसरे पानीपत युद्ध में भी भाग लिया। लेकिन लगातार युद्धों, बढ़ती उम्र और पुराने घावों ने उनके स्वास्थ्य को कमजोर कर दिया। अंततः 20 मई 1766 को भिंड के पास आलमपुर में लगभग 75 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनके बाद उनके युवा पौत्र मालेराव गद्दी पर बैठे, लेकिन वास्तविक शासन की जिम्मेदारी उनकी माँ अहिल्याबाई होल्कर ने संभाली। यहीं से शुरू हुआ भारतीय इतिहास की सबसे प्रसिद्ध महिला शासकों में से एक का गौरवशाली अध्याय।

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