Rewa Maharaj Martand Singh Story: रीवा रियासत के अंतिम शासक महाराज मार्तण्ड सिंह जी केवल एक शासक मात्र नहीं, बल्कि जनमानस के हृदय में बसने वाले सरल, सौम्य और लोकप्रिय व्यक्तित्व थे। वह तीन बार रीवा से सांसद भी थे, इसके साथ ही उन्हें सफेद बाघों के संवर्धन और संरक्षण के लिए किए गए उनके अथक प्रयासों के लिए, आज भी याद किया जाता है।
महाराज मार्तंड सिंह का जीवन परिचय | Biography of Maharaj Martand Singh
मार्तंड सिंह का जन्म 15 मार्च 1923 को रीवा के तत्कालीन शासक बांधवेश महाराज गुलाब सिंह जूदेव और जोधपुर के महाराज सरदार सिंह बहादुर की सुपुत्री बांधवेश्वरी महारानी साम्राज्य कुमारी साहिबा के यहाँ गोविंदगढ़ के किले में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा रीवा के युवराज भवन में हुई, जिसका निर्माण उनके लिए 1925-26 में करवाया गया था। यहाँ उनके लिए कई भाषाओं और विषयों के शिक्षक नियुक्त किए गए थे। प्रारंभिक शिक्षा के बाद 1935 में उन्होने डेली कॉलेज इंदौर में प्रवेश लिया डिप्लोमा एग्जाम पास करने के बाद उन्होंने मेयो कॉलेज अजमेर से 1941 में इन्टरमीडिट की परीक्षा पास की। इसके बाद उन्होंने देहरादून में आई.सी.एस.का प्रशासनिक प्रशिक्षण प्राप्त किया, इसके अलावा उन्होंने ऊटी और मैसूर से भी प्रशासनिक ज्ञान की बात सीखीं। युवराज मार्तंड सिंह प्रारंभ से ही कुशाग्र और मेधावी बुद्धि के थे, वह बहुत अध्ययनशील थे और उनके पास अच्छी किताबों का कलेक्शन था, इसके साथ ही वह कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे लेकिन लोग बताते हैं, वह अपने लोगों से ठेठ रिमहाई भाषा में ही बात करते थे, उनको इसी में आनंद प्राप्त होता था। लोग बताते हैं वह खूब पढ़ते थे उनका विवाह कच्छ भुज के महाराज मिर्ज़ा महाराव विजयसिंह की सुपुत्री प्रवीन कुमारी से 1943 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर बंबई में सम्पन्न हुआ था।
पिता के बाद बने शासक
युवराज मार्तंड सिंह के पिता महाराज गुलाब सिंह और ब्रिटिश सरकार के मध्य संबंध अत्यंत खराब हो रहे थे, एक बार तो उन्हें राज्य से निकाल भी दिया गया था, लेकिन प्रजा के उग्र आंदोलन के दबाव के बाद ब्रिटिश सरकार ने सशर्त उनको रीवा भेज दिया, लेकिन उनके गतिविधियों से नाराज ब्रिटिश सरकार ने 31 जनवरी 1946 को राज्यच्युत कर दिया गया फिर से रीवा राज्य की सीमाओं से बाहर करने का आदेश दे दिया गया और उनके पुत्र मार्तंड सिंह को रीवा का नया शासक घोषित कर दिया गया। जब यह सब घटनाक्रम हो रहा था, युवराज उस समय प्रशासनिक ज्ञान के निमित्त ऊटी में थे, वहीं पर उन्हें सेंट्रल इंडिया एजेंसी के रेसीडेन्ट कर्नल डब्लू. एफ. कैंपवेल का संदेश प्राप्त हुआ क्योंकि उन्हें रीवा का राजा बना दिया गया था। रीवा आने के बाद रेसीडेन्ट ने मेमोरियल हाल में आयोजित दरबार में उन्हें गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया की तरफ से रीवा शासनाधिकार सौंप दिया।
रीवा के लिए नया विधान बनाने का प्रयास
शासक बनने के बाद ही महाराज मार्तंड सिंह ने रीवा राज्य शासन में जनता की भागीदारी सुनिश्चित करने और ‘लोकप्रिय शासन’ लागू करने की घोषणा की, इसके लिए मद्रास प्रांत के एडवोकेट जनरल रहे सर अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर के नेतृत्व में राज्य के विधान निर्मात्री समिती बनाने की भी घोषणा की, हालांकि अपरिहार्य कारणों से तुरंत उनकी सेवाएं ना मिलने के कारण अप्रैल में इस सात सदस्यीय समिति का गठन मध्यप्रांत के सुप्रसिद्ध विधिवेत्ता और शिक्षाविद डॉ हरि सिंह गौर के नेतृत्व में किया गया, जिसका उद्देश बदलते आधुनिक और गतिमान विश्व के परिवेश के लिए राज्य का विधि और कानून बनाना था। इसके साथ ही महाराज अपने निजी व्यय का राजकीय व्यय से भी अलग करने की घोषणा की।
महाराज मार्तंड सिंह बने विंध्यप्रदेश के राजप्रमुख
15 अगस्त 1947 को देश की आज़ादी के बाद रीवा राज्य और बुंदेलखंड एजेंसी की 35 रियासतों को मिलाकर एक नए प्रांत विंध्यप्रदेश का निर्माण किया गया, चूंकि सभी दृष्टियों से रीवा इस नवनिर्मित राज्य में शामिल होने वाली सबसे प्रमुख रियासत थी, इसीलिए महाराज मार्तंड सिंह को इस विंध्यप्रदेश का पहला राजप्रमुख अर्थात गर्वनर नियुक्त कर दिया गया, इस पद वे 1950 तक रहे और उसके बाद इस पद से पृथक हो गए। आज़ादी के बाद मार्तंड सिंह ने रीवा, सतना, उमरिया, चित्रकूट, प्रयागराज और बनारस में अपनी कई सारी निजी जमीनें और भवन, सरकारों को जन उपयोगी कार्य, जैसे-स्कूल कॉलेज और हॉस्पिटल इत्यादि बनाने के लिए दे दिया। जिनमें 278 एकड़ भूमि में निर्मित रीवा का युवराज-भवन प्रमुख था जिसे 1962 में सैनिक स्कूल के लिए भारतीय सेना को दे दिया था। साथ ही सतना से रीवा तक रेल लाने में उनकी सर्वाधिक भूमिका थी।
अत्यंत सरल और सहज थे महाराज
महाराज के व्यक्तित्व के बारे में लोग बताते हैं वह बहुत ही सरल, सहज और मिलनसार प्रवृत्ति के थे, वह अपनी खुली एम्बेसडर कार खुद ड्राइव करते हुए रीवा से गोविंदगढ़ जाते थे, लेकिन पहुँचने में उन्हें बहुत समय लग जाता था, जानते हैं क्यों? क्योंकि रास्ते भर में दोनों तरफ लोग और दर्शनार्थी हाथ जोड़कर उनसे मिलने के लिए खड़े रहते थे और वह भी लोगों से मिलते-मिलाते और सलाम-दुआ करते हुए जाते थे, कहा जाता है कि इस दौरान उनका हाथ स्टेयरिंग पर कम और लोगों के अभिवादन का दोनों हाथ जोड़कर उत्तर देने पर अधिक रहता था। बताया जाता है महाराज समय के भी बहुत पाबंद थे, कहते हैं कहीं जाने के लिए या किसी से मिलने के लिए जो समय दे दिया, वह ठीक उतनी देर तैयार रहते थे, उनके बहुत कारीबियों में से एक और रीवा के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ सज्जन सिंह जी बताते हैं, कि एकबार यमुना प्रसाद शास्त्री जी से उनकी मुलाकात तय हुई, लेकिन शास्त्री जी तय वक्त से कुछ लेट हो गए, हालांकि गनीमत रही कि तब तक वह कहीं गए नहीं और शास्त्री जी की उनसे मुलाकात हो गई, पर उन्होंने उनसे लेट आने का कह जरूर दिया।
1971 में सक्रिय राजनीति में आए महाराज
इसके बाद महाराज सक्रिय राजनीति में भी उतरे, 1971 के लोकसभा चुनावों में वह निर्दलीय चुनाव लड़े उगता हुआ सूरज उनका चुनाव चिन्ह था, उन्होंने दिग्गज कांग्रेस नेता और विंध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित शंभूनाथ शुक्ल को हराकर लोकसभा पहुंचे, लेकिन 1977 के चुनावों में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार होने के कारण उन्हें दिग्गज सोशलिस्ट नेता यमुना प्रसाद शास्त्री से हार का सामना करना पड़ा।
अपने प्रतिद्वंदी यमुना प्रसाद शास्त्री की मदद की
लेकिन इस चुनावों के समय प्रत्यक्षदर्शी बहुत सारे किस्से सुनाते हैं, दरसल महाराज मार्तंड सिंह को इस चुनाव में कांग्रेस ने अपना समर्थन दिया था, अब चूंकि वह राजा ही थे, लेकिन उनके प्रतिद्वंदी शास्त्री जी सामान्य पृष्ठिभूमि से आते थे, संसाधन विहीन थे इसीलिए लोगों तक महाराज के मुकाबले प्रचार नहीं कर पाते थे, जब यह बात महाराज को पता चली तो उन्होंने एक जीप चुनाव प्रचार के लिए भेज दी तथा कुछ आर्थिक मदद भी की। दरसल वह आज का नहीं राजनैतिक शुचिता के दौर का था, रीवा के पूर्व नरेश होने के कारण शास्त्री जी महाराज का बहुत सम्मान करते थे और अन्य लोगों की तरह ही अन्नदाता कहते थे। शास्त्री जी का संघर्ष जीत गया जबकि कांग्रेस के समर्थन के कारण महाराज को हार का सामना करना पड़ा। लोग बताते हैं जीत के बाद शास्त्री महाराज मार्तंड सिंह से मिलने पहुंचे थे, जिसके बाद महाराज ने उन्हें जीत के लिए बधाई दी, तो शास्त्री जी ने कहा जीत में आपका भी योगदान है। इसके बाद महाराज 1980 में निर्दलीय और 1984 में भी रीवा से कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर सांसद बने।
रिकॉर्ड मत प्रतिशत के साथ जीत का गौरव
क्या आप जानते हैं, रीवा लोकसभा चुनावों के इतिहास में रिकॉर्ड मत प्रतिशत के साथ जीत दर्ज करने का गौरव भी उन्हीं के नाम है। महाराज मार्तंड सिंह ने 1971 के चुनावों में कुल पड़े मतों का लगभग 70% प्राप्त किया था, जबकि 1980 में यह आँकड़ा बढ़कर 71% तक पहुँच गया। यह केवल एक चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि जनता के हृदय में उनके प्रति गहरे विश्वास और सम्मान के साथ ही उनकी सरलता, जनसरोकारों के प्रति प्रतिबद्धता और यहाँ के लोगों से स्वाभाविक अपनापन ही उनकी लोकप्रियता की असली ताक़त था। जनता उन्हें केवल एक पूर्व शासक के रूप में नहीं, बल्कि अपने सुख-दुख में साथ खड़े रहने वाले प्रतिनिधि के रूप में देखती थी। यही कारण था कि लोकतंत्र में भी उन्हें उतना ही स्नेह और समर्थन मिला, जितना राजशाही के समय मिला था।
सफेद बाघों के संरक्षण के लिए मिली प्रसिद्धि
लेकिन महाराज मार्तंड सिंह को प्रमुखतः प्रसिद्धि मिली वन्यजीव संरक्षण और सफ़ेद बाघों के संवर्धन के लिए, दरसल 1951 में शिकार के लिए महाराज ने सीधी जिले के बरगड़ी के जंगलों में हाका डाला था, जहाँ उन्हें एक बाघिन तीन शावकों के साथ दिखी, जिसमें एक सफ़ेद रंग का था, महाराज ने अपनी टीम के सभी लोगों को आगाह किया की इस शावक को जिंदा पकड़ना है, और इसके बाद इसे बड़ी मशक्कत के बाद पकड़कर गोविंदगढ़ के किले में रखा गया, इसकी मोहक छवि के कारण इसे मोहन नाम दिया था। कहते हैं महाराज को मोहन से पुत्रवत प्यार और लगाव था, जब तक वह उन्हें नहीं देखता था, खाना तक नहीं खाता था। बाद में महाराज ने उसके वंशवृद्धि के प्रयास किये और कई बार असफल होने के बाद आखिर में 1955 में उन्हें सफलता मिली, आज विश्व में सभी सफ़ेद बाघ मोहन के ही वंशज हैं।
जब महाराज मार्तंड सिंह का हुआ हृदय परिवर्तन
महाराज जो अचूक निशानेबाज और कुशल शिकारी थे और उन्हें शिकार करने का अधिकार भी प्राप्त था, लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब उन्होंने शिकार करना छोड़ दिया, शिकार के दौरान एक हृदय को द्रवित करने वाली घटना के कारण उनका हृदय परिवर्तन हो गया था। कहते हैं कभी-कभी इतिहास की पुनरावृत्ति हो जाती है, हमने इतिहास में पढ़ा है, कलिंग विजय के बाद युद्ध की विभीषिका और रक्तपात को देखकर सम्राट अशोक का हृदय परिवर्तन हो गया था, जिसके बाद उसने हिंसक प्रवृत्तियों का त्याग करना प्रारंभ कर दिया था और अंततः बौद्ध धर्म का अनुयायी हो गया था, ऐसा ही कुछ महाराज मार्तंड सिंह जी के साथ भी हुआ था।
महाराज ने शिकार करना छोड़ दिया
दरसल आजादी के बाद भी, राष्ट्रीय वन्य जीव सरंक्षण अधिनियम कानून लागू होने से पहले तक, बांधवगढ़ रीवा राजाओं का शिकारगाह हुआ करता था और उन्हें यहाँ शिकार करने का अधिकार भी प्राप्त था। 1954 में इसी शिकार के सिलसिले में उन्होंने उमारिया के पनपथा के जंगलों में शिकार के लिए हाका लगाया था, महाराज जो अचूक निशानेबाज थे, वहीं उन्होंने अपनी बंदूक से एक बाघिन का शिकार किया था, गोली लगने के बाद भी बाघिन डेढ़ किलोमीटर तक भागती रही और अंततः उसने दम तोड़ दिया। जब उसका शव महाराज के पास लाया गया, तो उसे देखकर महाराज अत्यंत द्रवित और भावुक हो गए, जानते हैं क्यों? क्योंकि बाघिन गर्भवती थी, और इसीलिए वह डेढ़ किलोमीटर तक भागी थी, बाघिन के मृत्यु के साथ ही उसका गर्भ भी नष्ट हो गया था, महाराज इस घटना के बाद अत्यंत दुखित हुए, उन्होंने उस बाघिन का वहीं पास अंतिम संस्कार करवाया और उसके याद में एक चबूतरे का भी निर्माण करवाया। यह स्थान आज भी बाघिन चौरा के नाम से जाना जाता है।
बांधवगढ़ में वन्यजीव संरक्षण के प्रयास
इस घटना के बाद उन्होंने बांधवगढ़ में शिकार करना बंद कर दिया और वन्यजीव संरक्षण का प्रयास करने लगे, वह बांधवगढ़ के वनों के क्षरण और विनाश से भी चिंतित थे, अंततः उनके प्रस्ताव पर सरकार ने 1968 में बांधवगढ़ के 105 वर्गकिलोमीटर क्षेत्र को राष्ट्रीय उद्यान के तौर पर अधिसूचित कर दिया। बांधवगढ़ में बाघों की संख्या अत्यंत तेजी से बढ़ी, इसीलिए आज भारत में सबसे ज्यादा बाघों का घनत्व बांधवगढ़ में ही है, इस राष्ट्रीय उद्यान के कारण ही मप्र को टाइगर स्टेट का दर्ज़ा मिला। वन, पर्यावरण और वन्य जीवों के संरक्षण के लिए, किए गए महाराज के कार्यों के कारण ही भारत सरकार ने 1986 में उन्हें तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया था।
राजनीति में सभी से मधुर सबंध
भारतीय राजनीति में जवाहरलाल नेहरु से लेकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी तक, सभी के साथ महाराज साहब के मधुर और आत्मीय संबंध रहे। मध्यप्रदेश के तेज-तर्रार मुख्यमंत्री पं द्वारका प्रसाद मिश्र भी मार्तंड सिंह जी के व्यक्तित्व से अत्यंत प्रभावित थे। 1967 में जब अर्जुन सिंह चुरहट से चुनाव हार गए थे। उस समय उपचुनाव के माध्यम से उन्हें उमरिया से विधायक बनाने की रणनीति पंडित मिश्र ने महाराज मार्तंड सिंह के साथ मिलकर ही बनाई थी। कुछ राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि समाजवादी पृष्ठभूमि से आने वाले पं. मिश्र राजाओं और सामंतों के प्रति अपने कठोर रुख के लिए जाने जाते थे। ग्वालियर, सरगुजा और बस्तर के राजपरिवारों को उनके राजनीतिक निर्णयों का कोपभाजन बनना पड़ा था। किन्तु इसके विपरीत, रीवा केमहाराज मार्तंड सिंह के साथ उनके संबंध अत्यंत दृढ़ और सौहार्दपूर्ण रहे। पं. मिश्र प्रायः महाराज साहब के साथ राजनीतिक परिस्थितियों पर विचार-विमर्श करते थे।
अंतिम समय गोविंदगढ़ में रहने लगे थे महाराज
सन् 1989 में उन्होंने सार्वजनिक जीवन से लगभग संन्यास ले लिया, इसके बाद वे गोविंदगढ़ स्थित खखरी कोठी में रहने लगे थे। यद्यपि उन्होंने सक्रिय राजनीति और सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूरी बना ली थी, फिर भी रिमही जनता का उनसे मिलने का क्रम कभी थमा नहीं, वे आम जन से सहजता से मिलते, उनकी समस्याएँ सुनते और समाधान का प्रयास करते थे। लोग भी उन्हें अपने “अन्नदाता” और महाराज के रूप में ही देखते थे और गोविंदगढ़ जाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते थे। लेकिन समय के साथ उनका स्वास्थ्य गिरने लगा और अंतिम वर्षों में वे प्रायः अस्वस्थ रहने लगे थे। अंततः 20 नवंबर 1995 को बीमारी की अवस्था में ही उनका दुखद निधन हो गया। उनके देहावसान के साथ ही रीवा रियासत के अंतिम महाराज यहाँ के लोगों की स्मृतियों और इतिहास के पन्नों में कीर्तिशेष बन गए।
