Lal Bahadur Shastri Death Anniversary : देश के दूसरे प्रधानमंत्री-लाल बहादुर शास्त्री के जीवन के कुछ किस्से

Lal Bahadur Shastri Death Anniversary : देश के दूसरे प्रधानमंत्री-लाल बहादुर शास्त्री के जीवन के कुछ किस्से-आज भारत के दूसरे प्रधानमंत्री, लाल बहादुर शास्त्री की पुण्यतिथि है। सादगी और दृढ़ संकल्प की प्रतिमूर्ति शास्त्री जी का निधन 11 जनवरी, 1966 को ताशकंद में हुआ था। वह एक ऐसे नेता थे जिन्होंने न केवल ‘जय जवान-जय किसान’ का नारा दिया, बल्कि कठिन समय में देश का कुशलतापूर्वक नेतृत्व भी किया। उनके व्यक्तित्व के कुछ ऐसे पहलू और तथ्य हैं, जिनसे आज की पीढ़ी शायद ही वाकिफ हो। आइए, उनकी पुण्यतिथि पर उनके जीवन के 10 दिलचस्प और कम ज्ञात तथ्यों पर नजर डालते हैं। भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की पुण्यतिथि पर जानिए उनके जीवन से जुड़े 10 दिलचस्प और कम ज्ञात तथ्य। सादगी,देशभक्ति और ‘जय जवान-जय किसान’ के नायक शास्त्री जी को श्रद्धांजलि।

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शास्त्री नहीं है असली उपनाम-बहुत कम लोग जानते हैं कि शास्त्री जी का जन्म का नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था। उन्होंने जाति व्यवस्था का विरोध करने के लिए अपना उपनाम ‘श्रीवास्‍तव’ छोड़ दिया था। जबकि 1925 में काशी विद्यापीठ से स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्हें “शास्त्री” की उपाधि मिली, जिसे उन्होंने अपने नाम के साथ जोड़ लिया।

बचपन का नाम था नन्हें-उनके परिवार और करीबी लोग उन्हें प्यार से ‘नन्हे’ कहकर बुलाते थे। एक बार की बात है बचपन में उनके पास नदी पार करने के लिए नाव के पैसे नहीं थे तो उन्होंने अपने कपड़े उतरे और उनकी हाथी बनाकर सर पर रख ली फिर तैरकर गंगा नदी को पार किया ।

शादी में दहेज के रूप में मांगा था चरखा-सादगी के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इतनी गहरी थी कि उन्होंने अपनी शादी में कोई भी कीमती उपहार लेने से मना कर दिया और ससुराल पक्ष के बहुत आग्रह पर उन्होंने केवल एक “चरखा” और हाथ से बुना हुआ कुछ गज कपड़ा ही स्वीकार किया।

महिलाओं के लिए ऐतिहासिक कदम-परिवहन मंत्री के रूप में उन्होंने ही सबसे पहले सार्वजनिक परिवहन (बस) में महिला कंडक्टरों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू की थी।

भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पानी की बौछार-पुलिस और प्रशासन में सुधार लाते हुए उन्होंने लाठीचार्ज की जगह पानी की बौछारों का उपयोग करने का सुझाव दिया था ताकि भीड़ को कोई नुकसान न पहुंचे और नियंत्रित किया जा सके।

जेल में बिताया लंबा समय-स्वतंत्रता संग्राम के दौरान शास्त्री जी कुल मिलाकर 7 साल जेल में रहे। उन्होंने 17 साल की उम्र में असहयोग आंदोलन में भाग लिया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठाई।

नैतिक जिम्मेदारी का उदाहरण-1956 में एक भीषण रेल दुर्घटना के बाद,शास्त्री जी ने रेल मंत्री के रूप में नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपना इस्तीफा दे दिया था। यह भारतीय राजनीति में जवाबदेही का एक दुर्लभ उदाहरण था।

शास्त्री व्रत’ और हरित क्रांति-1965 के युद्ध के दौरान जब देश अन्न की कमी से जूझ रहा था, तब उन्होंने पूरे देश से सप्ताह में एक दिन उपवास (व्रत) रखने की अपील की थी। इसे “शास्त्री व्रत” कहा गया। उन्होंने स्वयं भी इसे अपनाया ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सेना के पास पर्याप्त भोजन रहे।

ताशकंद समझौता और रहस्यमय निधन-1965 के भारत-पाक युद्ध को समाप्त करने के लिए वे उज्बेकिस्तान (तब सोवियत संघ का हिस्सा) के ताशकंद गए थे। समझौते के ठीक अगले दिन 11 जनवरी को रहस्यमय परिस्थितियों में उनका निधन हो गया। वे विदेश में मरने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री थे।

मरणोपरांत “भारत रत्न”-शास्त्री जी पहले ऐसे भारतीय थे जिन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान “भारत रत्न” से सम्मानित किया गया था। आज के दिन पूरा देश इस महान आत्मा को नमन करता है, जिनकी सादगी आज भी करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।





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