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क्या विकलांग सन्यासी नहीं बन सकता?

क्या कोई विकलांग सन्यासी बन सकता है?

दिव्यांग सन्यासी क्यों नहीं बन सकता?

Kya Viklang Sanyasi Nahi Ban Sakta: हाल ही में सनातन धर्म के कथित शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती (Avimukteshwaranand Saraswati) ने जगद्गुरु रामभद्राचार्य (Jagadguru Rambhadracharya) पर विवादित टिप्पणी की है, जिसमें उन्होंने दावा किया कि शास्त्रों में लिखा है कि जो भी व्यक्ति विकलांग होता है, उसे संन्यास का अधिकार नहीं है और इसी आधार पर उन्होंने रामभद्राचार्य को संन्यासी नहीं मानने का आरोप लगाया। इस बयान ने धर्म एवं संस्कृति के कई पक्षों पर बहस को जन्म दिया है।

लेकिन शास्त्रों की वास्तविक विद्वता और परंपरा इस दावे का समर्थन नहीं करती — बल्कि प्रत्यक्ष प्रमाण इसके ठीक विपरीत हैं।

किस शाश्त्र में लिखा है कि विकलांग को सन्यास का अधिकार नहीं?

In which scripture is it written that a disabled person does not have the right to take sanyas: अविमुक्तेश्वरानंद ने बयान में कहा कि शास्त्रों में यह लिखा है कि “जो भी दिव्यांग है उसे संन्यास का अधिकार नहीं है” और यह आरोप रामभद्राचार्य पर लगाया।

वे संभवतः नारदपरिव्राजकोपनिषत के एक श्लोक का हवाला देते हैं जिसमें कुछ स्थितियों को संन्यास-योग्यता का अभाव बताया गया है —

अथ षण्डः पतितोऽङ्गविकलः स्त्रैणो बधिरोऽर्भको मूकः पाषण्डश्चक्री लिङ्गी कुष्ठी वैखानस हरद्विजौ भृतकाध्यापकः शिपिविष्टोऽनग्निको नास्तिको वैराग्यवन्तोऽप्येते न संन्यासार्हाः।
संन्यस्ता यद्यपि महावाक्योपदेशे नाधिकारिणः ॥

अर्थात:

षण्डः – नपुंसक

पतितः – पतित (धर्म से गिरा हुआ)

अङ्गविकलः – अंगहीन / शारीरिक रूप से विकलांग

स्त्रैणः – स्त्री-संग में आसक्त

बधिरः – बहरा

अर्भकः – बालक

मूकः – गूंगा

पाषण्डः – विधर्मी / कुपंथी

चक्री – चिह्न-धारी (आडंबर वाला)

लिङ्गी – केवल बाहरी वेशधारी

कुष्ठी – कुष्ठ रोगी

वैखानस, हरद्विजौ – विशेष कर्मकांडी संप्रदाय से जुड़े

भृतकाध्यापकः – वेतन लेकर पढ़ाने वाला

शिपिविष्टः – गंभीर रोगग्रस्त

अनग्निकः – जिसने वैदिक अग्नि त्याग दी

नास्तिकः – ईश्वर/वेद न मानने वाला

वैराग्यवन्तोऽपि – वैराग्य हो तब भी

न संन्यासार्हाः – संन्यास के योग्य नहीं

“नपुंसक, पतित, अंगहीन (विकलांग), स्त्री-आसक्त, बधिर, बालक, मूक, विधर्मी, आडंबरधारी, केवल वेशधारी, कुष्ठ रोगी, कुछ विशेष कर्मकांडी संप्रदायों से जुड़े, वेतन लेकर पढ़ाने वाले, रोगग्रस्त, अग्निहीन और नास्तिक —
ये लोग वैराग्य होने पर भी संन्यास के योग्य नहीं माने जाते।
और यदि इन्हें संन्यास दे भी दिया जाए, तो
ये महावाक्य (तत्त्वमसि आदि) के उपदेश के अधिकारी नहीं होते।

लेकिन इस काव्यात्मक/आचार-ग्रंथ के श्लोक का शाब्दिक अर्थ और उसका उपयोग आध्यात्मिक अधिकार के रूप में नहीं किया जा सकता।

यह ग्रंथ मुख्य उपनिषदों या वेदों की श्रेणी में नहीं आता — यह एक आचार-उपनिषद है जो संन्यास के अनुशासन का विवरण देता है, न कि मोक्ष या आत्मबोध का सर्वोच्च नियम। से सार्वभौमिक आध्यात्मिक निषेध के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।

क्या विकलांग सन्यासी बन सकता है?

Can a disabled person become a Sanyasi: सनातन परंपरा में कई ऐसे महान संत/ऋषि रहे हैं जो जन्म से या जीवन में विकलांग रहे, फिर भी इन्हें आध्यात्मिक अधिकार और सम्मान मिला।

अष्टावक्र मुनि

ऋषि अष्टावक्र जन्म से ही शरीर में विकृति/विकलांगता के साथ थे, लेकिन वे अत्यंत वेदांत-जिज्ञासु और महात्मा थे। उनकी अष्टावक्र गीता वेदांत का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है, जिसमें आत्मा के स्वरूप और मोक्ष की बात अत्यंत गहन रूप से की गई है। यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि विकलांगता आत्म-ज्ञान या संन्यास के अधिकार में बाधा नहीं है।

सूरदास

हिन्दू भक्ति परंपरा के सूरदास जन्म से नेत्रहीन (blind) थे और वे कृष्ण भक्ति के महान कवि और संत माने जाते हैं। रदास ने सूर सागर और अन्य भक्ति साहित्य की रचना की। उनकी भक्ति, ज्ञान और अनुभव भारतीय भक्तिगीताओं में आज भी प्रचलित हैं. उनका उदाहरण दर्शाता है कि शारीरिक विकलांगता आत्मिक अधिकार में बाधक नहीं होती।

इन सन्यासियों के अलावा: अंधे मुनि दीर्घतमा (ऋग्वैदिक ऋषि) का नाम है. जो जन्मांध थे मगर वे ऋग्वेद के सूक्तों के द्रष्टा हैं, आध्यात्मिक अधिकारी हैं

रामभद्राचार्य स्वयं एक उदाहरण

जगद्गुरु रामभद्राचार्य अपनी आँखों की दृष्टि को दो महीने की उम्र में खो चुके हैं, परंतु वे संन्यासी, विद्वान, लेखक और संस्कृत के महान अध्येता हैं — उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना, भाष्य और विश्वविद्यालय-स्थापना की है।

यह प्रत्यक्ष उदाहरण साबित करता है कि विकलांगता किसी व्यक्ति को आध्यात्मिक उपलब्धि या संन्यास लेने से नहीं रोकती।

सनातन धर्म में मोक्ष का अधिकार शरीर से नहीं, आत्मा/वैराग्य/ज्ञान से जुड़ा हुआ है। मुख्य वेदांत, उपनिषद और भगवद्गीता की वाणी यही कहती है — व्यक्ति का आध्यात्मिक अधिकार उसकी चेतना और ज्ञान की क्षमता पर आधारित है, न कि उसके शारीरिक अंगों पर।

सनातन धर्म में शरीर को नहीं आत्मा को विशेष दर्जा दिया गया है,सन्यास से शरीर का कोई लेना देना नहीं है, यह आत्मा से जुडी क्रिया है. सन्यास लेने के लिए आपका सगुण होना जरूरी नहीं है. सनातन धर्म के कई ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है.

भगवद्गीता — आत्मा शरीर से परे है

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि
नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो
न शोषयति मारुतः ॥

अर्थात: आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं,
न आग जला सकती है,
न जल भिगो सकता है,
न वायु सुखा सकती है।

छांदोग्य उपनिषद — ब्रह्मज्ञान सबके लिए

छांदोग्य उपनिषद 7.1.1

तस्मै होवाच सनत्कुमारः —
आत्मविद्या विज्ञातव्या ।

सनत्कुमार कहते हैं —
आत्मविद्या (ब्रह्मज्ञान) ही जानने योग्य है।

अष्टावक्र गीता — स्वयं विकलांग ऋषि का वचन

अष्टावक्र गीता 1.4

न त्वं देहो न ते देहो
भोक्ता कर्ता न वा भवान् ।
चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी
निरपेक्षः सुखं चर ॥

अर्थात: तू शरीर नहीं है,
न तू कर्ता है, न भोक्ता।
तू शुद्ध चैतन्य है —
स्वतंत्र होकर सुख से विचर।

ब्रह्मसूत्र — मोक्ष का आधार ज्ञान है, देह नहीं

ब्रह्मसूत्र 1.1.4

तत्तु समन्वयात्

अर्थात: मोक्ष का साधन ब्रह्मज्ञान है,
न कि शरीर, कर्म या बाह्य योग्यता।

वेद, उपनिषद, गीता और शंकराचार्य कहीं भी यह नहीं कहते कि विकलांग व्यक्ति संन्यास या मोक्ष से वंचित है. संन्यास और मोक्ष की योग्यता है वैराग्य + विवेक + ब्रह्मज्ञान शरीर की पूर्णता नहीं। इसलिए अविमुक्तेश्वरानंद का दावा शास्त्र-सम्मत नहीं हैऔर वह आंशिक स्मृति-ग्रंथों को पकड़कर मूल वेदांत के विरुद्ध जाता है।

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