Kamal Amrohi Birth Anniversary: भारतीय फिल्म जगत में एक ऐसा डायरेक्टर हुआ है जिसने अपनी दो ही फिल्मों से इतिहास रच दिया और कामियाबी के उस शिखर पर पहुँच गए जहाँ कई फिल्में बनाने के बाद भी फिल्म मेकर नहीं पहुँच पाते ,उनकी एक फिल्म तो इतनी मशहूर हुई थी देश के प्रधानमंत्री तक ने उसकी स्पेशल स्क्रीनिंग रखवाई थी। जी हाँ ये थे कमाल अमरोही जिनकी फिल्म ‘महल’ और ‘पाकीज़ा’ का नाम फिल्म जगत में स्वर्ण अक्षरों से दर्ज हुआ इसके अलावा आपने ‘दायरा’ और ‘रज़िया सुल्तान’ जैसी हिट फिल्में हमें दीं। हालाँकि उनकी निर्देशित फिल्मों की फेहरिस्त बहोत लम्बी नहीं है इसके बावजूद उन्होंने अपनी कला का लोहा मनवाया है।
फिल्म जगत में एक कहानीकार और डायलॉग राइटर के रूप में कमाल अमरोही ने अपनी जगह 1938 में ही बना ली थी लेकिन बतौर निर्देशक उन्हें पहचान मिली बॉम्बे टॉकीज़ की फिल्म ‘महल’ से जो रुपहले पर्दे पर जगमगाई 1949 में।
महल के पीछे की कहानी /The Story Behind The Movie Mahal:-
‘महल’ फिल्म का निर्देशन कमाल अमरोही को बहोत मुश्किल से मिला क्योंकि आज़ादी के ठीक पहले देविका रानी ने 1946 में रशियन पेंटर रोरिक से शादी कर ली थी और बॉम्बे टॉकीज़ को अभिनेता अशोक कुमार और सावक वाचा को 28 लाख रुपये में बेच दिया ये वो वक़्त था जब स्वाधीनता आंदोलन अपने चरम पर था और पूरे देश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच बेहद तनाव था, जिसका असर बॉम्बे टॉकीज़ में काम करने वाले हिंदू और मुस्लिम कर्मचारियों पर भी पड़ा और तनाव से बचने के लिए अशोक कुमार और सावक वाचा ने टॉकीज़ में हिंदू कर्मचारियों को हटा कर केवल मुस्लिम कर्मचारियों को काम पर रख लिया लेकिन इससे तनाव और बढ़ गया और हिंदू कर्मचारी बहुत नाराज़ हो गए।
अशोक कुमार ने क्यों किया कमाल पर भरोसा:-
हालाँकि लेखक सअदात हसन मंटो ने पहले ही इस बात से आगाह किया था पर अशोक कुमार ने कहा कि “वो ना हिंदू हैं और ना ही मुसलमान बल्कि वो एक कलाकार हैं और कला ही उनका धर्म है। ” इसीलिए कमाल अमरोही की कला को परखने के बाद उन्होंने अपनी पहली फिल्म यानी ‘महल’ के निर्देशन के लिए उस समय भी कमाल साहब को ही चुना जब नोआखाली में हिंदुओं के नरसंहार के बाद देशभर में हिंदू-मुसलमान के बीच गहरी खाई हो गई थी।
‘महल’ के रिलीज़ होने के बाद क्या हुआ :-
फिल्म ‘महल’ अपनी रिलीज़ के बाद भारत की पहली हॉरर फिल्म के रूप में मशहूर हुई और इसकी कामियाबी ने कमाल अमरोही को रातों रात सुपर स्टार बना दिया और फिल्म के डायलॉग तो इतने लोकप्रिय हुए कि न केवल उस वक़्त लोगों की ज़ुबाँ पर चढ़े बल्कि आज फिल्म रसिकों को मदहोश करने का माद्दा रखते हैं आप भी बोल के देखिए और खो जाइए इसके सुरूर में – ‘मुझे जरा होश में आने दो, मैं खामोश रहना चाहता हूं…’ या ‘फिर स्लो पॉयज़न अक्सर मीठे होते हैं और धोखे अक्सर हसीन होते हैं…’
‘पाकीज़ा’की कहानी /Making Of The Film Pakeezah:-
पाकीज़ा को लेकर आपने बहोत क़िस्से सुने होंगे तो हम आपको ये भी बता दें कि इसे पहले 1971 में प्रदर्शित होना था, लेकिन भारत-पाकिस्तान युद्ध के कारण प्रदर्शन की तिथि टल गई और ये फिल्म फिर रिलीज़ हुई 1972 में। 1971 के भारत- पाकिस्तान युद्ध में भारत की जीत हो चुकी थी तो शिमला समझौते के लिए भुट्टो शिमला आए हुए थे और उनके कानों तक भी पाकीज़ा के चर्चे पहुँचे और उन्होंने भी पाकीज़ा देखने की ख्वाहिश ज़ाहिर की कहते हैं , इसके बाद इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के नेताओं के लिए ‘पाकीज़ा’ की स्क्रीनिंग के लिए इंतज़ाम किया।
इस फिल्म को बनने में 14 साल लगे दरअसल पाकीज़ा फिल्म एक ख्वाब था जिसे कमाल अमरोही ने तब देखा था जब उनका और मीना कुमारी का प्यार परवान चढ़ रहा था इसके बावजूद कि कमाल साहब पहले से शादीशुदा थे , मीना कुमारी जी की खूबसूरती और नफासत से भरी अदाकारी को देखकर उन्हें ये ख्याल आया कि वो अपनी इस फिल्म में बतौर हीरोइन मीना जी को ही लेंगे क्योंकि उस वक्त उनके दिमाग में जो कहानी थी वो जद्दन बाई और गौहर जान की ज़िंदगी के इर्द गिर्द घूम रही थी जो हुनर और ज़हानत की मिसाल थीं और मीना कुमारी में ये काबिलियत थी कि वो बड़ी संजीदगी से इसे पर्दे पर उकेर सकती थीं, मीना ने भी घर वालों के ख़िलाफ़ कमाल अमरोही से जब चोरी छुपे निकाह कर लिया तो फिल्म की हीरोइन बनने को राज़ी हो गईं लेकिन जब फिल्म की शूटिंग शुरू हुई
मीना कुमारी और कमाल अमरोही का रिश्ता :-
तब तक दोनों का रिश्ता काफी खराब हो चुका था मीना भी अपने रिश्ते से दुखी होकर शराब को अपना साथी बना चुकी थीं और बीमार रहने लगीं थीं ,एक दिन तो उनकी हालत इतनी खराब हो गई कि वो फिल्म के अगले सीन में मुजरा ही नहीं कर पा रही थीं ऐसे में कमाल फ़ौरन मीना जी जैसी कद काठी ढूंढ लाए बॉडी डबल के लिए और गाना ‘आज की रात हम अपनी दुआओं का असर देखेंगे’ कमाल जी ने घूँघट में अभिनेत्री पद्मा खन्ना से शूट करवाया। मीना जी की तबियत के बारे में एक बार कमाल साहब के बेटे ताजदार अमरोही ने बताया था कि अब्बू छोटी अम्मी की सूजन को छुपाने के लिए उनके हिसाब से कपड़े चूज़ करते थे और मौसम है आशिकाना …गाने के पिक्चराइज़ेशन में इसी लिए उन्हें कुर्ता और लुंगी पहनाई गई थी जो आगे चलकर एक ट्रैंड बन गया।
कमाल अमरोही और मीना कुमारी के बीच की दरार एक वक़्त पर इतनी गहरी हो गई कि दोनों एक दूसरे से अलग हो गए लेकिन बतौर अभिनेत्री मीना कुमारी हमेशा कमाल के ,उनकी फिल्मों के साथ रहीं ये मीना जी की भी अपने काम के लिए शिद्दत थी इसी वजह से अमरोही से 5 सालों तक अलग रहने के बावजूद भी उन्होंने फिल्म ‘पाकीज़ा ‘पूरी की। हैरत की बात ये है कि फिल्म रिलीज़ हुई 4 फ़रवरी 1972 को और मीना कुमारी जी ने 31 मार्च 1972 को मीना कुमारी दर्द से गुज़रते हुए मौत की आग़ोश में सो गईं और कमाल अमरोही जितना अपनी फिल्मों के लिए मशहूर हुए उतना मीना कुमारी को लेकर भी चर्चा में रहे।
क्यों नाराज़ हो गए ‘बेईमान’ फिल्म के विलेन प्राण :-
कमाल अमरोही को कैमरे की काफी अच्छी समझ थी इसलिए उन्होंने इस फिल्म में कई एक्सपेरिमेंट भी किए थे और फिल्म के लिए बहुत मेहनत की, विदेश जाकर महंगे लेंस खरीदे थे पर उस वक्त इन्हें सेट करना बहोत बड़ा काम था जिसमें उन्हें बहुत मुश्किल हुई क्योंकि जर्मन सिनेमेटोग्राफ़र जोसेफ़ वर्शिंग भी बीच फ़िल्म में ही गुज़र गए थे जिसके बाद कई सिनेमेटोग्राफ़रों ने मिलकर इस फ़िल्म को पूरा किया फिर भी इतने बेहतरीन फिल्मांकन के बावजूद कमाल अमरोही जी ने माना कि आउट ऑफ फोकस शूट भी हुआ है दरअसल फिल्म को 35 एमएम कैमरे पर शूट किया गया था तो कमाल अमरोही ने रील देखकर बता दिया कि शूट किए गए कुछ सीन आउट ऑफ़ फोकस हैं लेकिन कैमरा मैन मानने को तैयार नहीं थे तो विदेश में दो बार इसकी जाँच हुई तब जाकर ये बात सामने आई।
फिल्म ‘पाकीज़ा ’ के लिए कमाल अमरोही ने ख़र्चे की कोई परवाह नहीं की, दिल्ली और लखनऊ के कोठे की तर्ज़ पर फिल्म के सेट में कोठे की गलियों यानी बाज़ार ए हुस्न को बनाने में भी कमाल साहब को 6 महीने लग गए थे। कॉस्ट्यूम डिज़ाइन किए थे खुद मीना कुमारी जी ने तो जगमगाते ज़ेवर जयपुर से आए थे और शूटिंग के दौरान साज सज्जा के सामान ,गुलदान और इत्रदानी तक असली रखी जाती थीं। कमाल अमरोही की इसी शिद्दत ने ,फिल्म रिलीज़ होते ही उन्हें हिंदी फिल्मों के शीर्ष निर्देशकों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया । पाकीज़ा 6 गानों के साथ रिलीज़ हुई और फिल्म के म्यूज़िक ने भी इतिहास रचा मगर उस साल बेस्ट म्यूज़िक का फिल्म फेयर ‘बेईमान’ फिल्म के लिए शंकर-जयकिशन को मिला लेकिन इस फैसले से बेईमान में ही विलेन रहे प्राण इतना नाराज़ हो गए कि उन्होंने ‘बेईमान’ के लिए मिला अपना अवॉर्ड वापस कर दिया।
आख़री ख़्वाब न हुआ पूरा :-
उत्तरप्रदेश के अमरोहा से ताल्लुक़ रखने वाले कमाल अमरोही 17 जनवरी 1918 को पैदा हुए, कहते हैं , शादी के पांच साल बाद मीना कुमारी अमरोहा आई थीं लेकिन कमाल साहब के घर यानी अपने ससुराल नहीं गईं बल्कि दूर से ही घर को देखा और अमरोहा की दरगाह पर चादर चढ़ाकर वापस लौट आई थीं। कमाल अमरोही ने अपने करियर में कई बेमिसाल फिल्मों की कहानी लिखी, गाने लिखे और फिल्में डायरेक्ट भी कीं।बतौर नग़मानिगार भी उनका जुनून कम नहीं था जिसे आप ‘पाकीज़ा’ के ही गीत “मौसम है आशिक़ाना “में महसूस कर सकते हैं। उनके निर्देशन में बनी आखिरी फिल्म ‘रज़िया सुल्तान’ थी। नब्बे के दशक में कमाल अमरोही ‘अंतिम मुग़ल ’ नाम से एक फिल्म बनाना चाहते थे लेकिन उनके इस ख्वाब की ताबीर न मिल सकी और 11 फरवरी 1993 को वो इस दुनिया को अलविदा कह गये।

