नई दिल्ली। देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने मतदान के अधिकार को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि अगर किसी प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक अपने मतदान के अधिकार से वंचित हो जाते हैं और अपने ही देश में ऐसे नागरिक बन जाते हैं, जिनके पास वोट देने का अधिकार नहीं है, तो यह उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने जैसा होगा।
जस्टिस भुइयां ने यह टिप्पणी 4 अक्टूबर को हैदराबाद स्थित नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ में आयोजित 19वीं जस्टिस बीआर साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन समारोह में की। हालांकि, अपने भाषण में उन्होंने SIR या चुनाव आयोग का सीधे नाम नहीं लिया। उनकी टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस चल रही है।
वोट का अधिकार और मतदाता सूची में नाम अलग नहीं
जस्टिस भुइयां ने कहा कि एक भारतीय नागरिक के नजरिए से मतदाता सूची में शामिल होने का अधिकार और मतदान का अधिकार अलग-अलग नहीं किया जा सकता। उन्होंने इसे शरीर और आत्मा के संबंध से समझाते हुए कहा कि दोनों को अलग करना शरीर से आत्मा निकालने जैसा होगा।
उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों को दो अलग-अलग वर्गों में नहीं बांटता। ऐसा नहीं हो सकता कि एक वर्ग के नागरिकों के पास मतदान का अधिकार हो और दूसरे वर्ग के नागरिकों को इससे वंचित कर दिया जाए।
जस्टिस भुइयां के मुताबिक, अगर कोई ऐसी प्रक्रिया है जिसके कारण लाखों भारतीय नागरिक अपने मतदान के अधिकार से वंचित हो जाते हैं, तो ऐसी प्रक्रिया अपने आप में मनमानी होगी और उसे किसी भी तरह की दलील देकर सही नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने इसे संवैधानिक व्यवस्था के लिए गंभीर सवाल बताया।
अनुच्छेद 14 और 326 का किया जिक्र
जस्टिस भुइयां ने संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 326 का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में भारतीय नागरिकों को मतदान के अधिकार से वंचित करने वाली कोई भी प्रक्रिया इन संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ होगी।
अनुच्छेद 326 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के लिए वयस्क मताधिकार का आधार तय करता है। जस्टिस भुइयां ने कहा कि मतदान का अधिकार केवल संसद द्वारा बनाए गए किसी सामान्य कानून से मिलने वाला अधिकार नहीं है, बल्कि यह संविधान में निहित एक महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार है।
उन्होंने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को लोकतंत्र की बुनियादी विशेषताओं से जोड़ते हुए कहा कि मतदान के अधिकार को सीमित करने वाले किसी भी प्रावधान या प्रक्रिया को तर्कसंगत और उचित होना चाहिए।
संविधान से ऊपर कोई नहीं
जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन में यह भी कहा कि संविधान से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह कोई संस्था हो या कोई प्राधिकारी। उन्होंने कहा कि अगर किसी प्रक्रिया के कारण बड़ी संख्या में नागरिकों को उनके मतदान के अधिकार से वंचित किया जाता है, तो उसे केवल किसी प्रशासनिक प्रक्रिया के नाम पर उचित नहीं ठहराया जा सकता।
उन्होंने लोकतंत्र में वोट की समानता पर भी जोर दिया। उनका कहना था कि कोई व्यक्ति बहुत अमीर हो या फिर सामान्य आर्थिक स्थिति वाला, लोकतंत्र में दोनों के वोट का महत्व समान है। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार में व्यक्ति की संपत्ति, शिक्षा, सामाजिक स्थिति या किसी अन्य आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता, सिवाय कानून में तय सीमित अपवादों के।
स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा मतदान का अधिकार
जस्टिस भुइयां ने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारतीय नागरिकों का मतदान का अधिकार विदेशी शासन के खिलाफ लंबे संघर्ष और बलिदान से जुड़ा हुआ है। यह उस स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है, जिसे देश ने लंबे संघर्ष के बाद हासिल किया।
उन्होंने संविधान सभा में डॉ. भीमराव आंबेडकर के समापन भाषण का भी हवाला दिया। जस्टिस भुइयां ने कहा कि वयस्क मताधिकार के अधिकार को संविधान में दर्ज करना जरूरी था, ताकि इसे केवल संसदीय कानून पर निर्भर न छोड़ा जाए।
जस्टिस भुइयां ने एमपी जैन के संदर्भ का भी उल्लेख किया और कहा कि विधायिका को मतदान के अधिकार को सीमित करने वाले तर्कहीन या अनुचित प्रावधान बनाने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर यह बात कानून बनाने के मामले में लागू होती है, तो किसी प्रशासनिक प्रक्रिया के लिए इसकी अहमियत और भी ज्यादा है।
जस्टिस भुइयां की यह टिप्पणी ऐसे समय सामने आई है, जब SIR के दौरान मतदाता सूची में नामों को लेकर चुनाव आयोग और विपक्षी दलों के बीच तीखी बहस चल रही है। हालांकि, यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि जस्टिस भुइयां ने अपने भाषण में SIR को सीधे संबोधित नहीं किया था। उनकी टिप्पणी मतदान के अधिकार, मतदाता सूची और संवैधानिक व्यवस्था के व्यापक सवालों पर थी।

