Bagheli Ukkhan: पुराने समय में न कैलेंडर थे और न ही घड़ियाँ, जिनसे दिन, तारीख़ और समय का सटीक हिसाब रखा जा सके। तो आपको पता है पहले के लोग इसकी गणना किस आधार पर करते थे, दरसल पहले समय गणना का आधार प्रकृति ही थी। मौसम का बदलना, दिन-रात की लंबाई, सूरज की चाल और रोज़मर्रा के घरेलू कामकाज। हमारी दादी-नानी को किसी भी किसी भी घड़ी-कैलेंडर की जरूरत नहीं पड़ती थी, वह सूरज की धूप-छाँव और रात को चंद्रमा का उजाला देखकर सटीक समय और पहर का आकलन कर लिया करती थीं। तो इन्हीं अनुभवों से लोकजीवन में ऐसी कहावतें और उक्खान जन्मे, जो महीनों के स्वभाव और समय की गति को बड़े सहज और व्यावहारिक ढंग से समझा देते थे। बघेलखण्ड में प्रचलित एक उक्खान इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है-
“कातिक बात कहातिक, अगहन हांड़ी अदहन, पूस काना टूस। माघ तिलय-तिल बाढ़य, फागुन बीता काढ़य।”
बघेली उक्खान से जानिए बघेलखंड में पहले कैसे गिना जाता था समय
दरसल इस कहावत में पूरे शीतकाल में दिन के घटने बढ़ने का वर्णन, महिलाओं के घरेलू कामकाज के आधार पर किया गया है। चूंकि ठंड के मौसम में रातें लंबी और दिन छोटे होते हैं, इसी आधार पर गृहस्थी के कार्यों की दिनचर्या भी और प्राथमिकताएं भी बदलती रहती है। शरद ऋतु का प्रारंभ कातिक के महीने से माना जाता है। और इसका अंत फाल्गुन के महीने में होता है, जबकि पूष और माघ में इसका यौवन माना जाता है, जब सबसे ज्यादा कड़ाके की ठंड पड़ती है।
कातिक में बात करते बीत जाता था समय
इस उक्खान में कातिक के महीने के बारे में कहा गया है- “बात कहातिक” यानी कातिक का महीना बातचीत करते-करते ही निकल जाता है, क्योंकि इस समय दिन बहुत छोटे हैं। स्त्रियाँ जब आपस में बैठकर काम करते हुए बतकही में लग जाती थीं, तो उन्हें यह एहसास ही नहीं होता था कि कब दिन ढल गया।
अगहन में खाना पकाते हुए समय बीत जाता था
अगहन आते-आते ठंड बढ़ जाती थी और रसोई के काम में बहुत समय लगने लगता था। इसलिए इसे इस उक्खान में कहा गया-“हांड़ी अदहन।” अब चूंकि उस दौर में न गैस थी, न कुकर। बल्कि मिट्टी के चूल्हों में फूल और कांसे के बटुआ और बटलोई की हांड़ी चढ़ती थी। दरसल दाल-भात को अदहन देकर, यानी गरम पानी डाल-डालकर, धीमी आँच पर पकाया जाता था। संयुक्त परिवारों में सदस्यों की संख्या अधिक होने के कारण भोजन भी अधिक बनता था, जिसके कारण इस प्रक्रिया में पूरा दिन बीत जीता था। आप में से कई लोगों ने पुटकी-अदहन दे के बनाए गए दाल-चावल का स्वाद यदि चखा होगा, तो उसका अप्रतिम स्वाद जानते ही होंगे।
घर के काम करते हुए बीत जाता था पूस
इसके बाद पूस का महीना आता था, जिसके बारे में कहा गया है- “पूस काना टूस”, यानि पहले के जमाने में कोदो, कुटकी और धान की उपज खूब होती थी, अब पहले राइस मिल और चावल बनाने की मशीनें तो होती नहीं थी, इसीलिए घर की महिलाएं जेतबा और काँड़ी-मूसर से इन अनाजों को साफ करने के लिए कूटने-छरने बैठती थीं, तो उसमें पूरा दिन निकल जाता था। दरसल ठंड के दिनों में यह काम आम था।
माघ महीने में थोड़े-थोड़े करके बढ़ता है दिन
फिर आता है माघ का महीना, जिसके बारे में कहा गया है “तिलय-तिल बाढ़य”, मतलब इस महीने में दिन तिल-तिल करके अर्थात थोड़ा-थोड़ा करके बढ़ने लगते हैं, सूरज की धूप भी हल्की-सी तेज होने लगती है। दरसल तिल से तुलना के पीछे का एक कारण यह भी है, कि इस समय बघेलखंड में तिल के लड्डू तिलबा भी खूब बनते हैं और खाए जाते हैं।
फागुन के महीने में बड़ा होने लगता है दिन
फिर आता है फाल्गुन का महीना, जो शरद ऋतु का बुढ़ापा माना जाता है, माघ के महीने में थोड़ा-थोड़ा करके बढ़ने वाली सूरज की धूप, फाल्गुन तक आते-आते तेज होने लगती है। दिन लंबा होने लगता है और रातें छोटी होने लगती है, जिसके कारण ऋतु परिवर्तन का संकेत मिलने लगता है, दरसल इस प्रकृति में कई सारे बदलाव आते हैं, वृक्षों में नए पत्ते आते हैं, आम के पेड़ों में गौर आने लगते हैं, खेतों में चना-राई और गेहूं की फसल लहराने लगती है और हवा में अलग-सी सरसराहट भर जाती है।

