थलपति विजय की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘जन नायगन’ (Jana Nayagan) की रिलीज को लेकर कानूनी पेंच और गहरा गया है। Jana Nayagan Censor Case की सुनवाई करते हुए मद्रास हाई कोर्ट ने मंगलवार को अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। फिल्म के भविष्य पर मंडरा रहे अनिश्चितता के बादलों के बीच कोर्ट की टिप्पणियों ने फिल्म इंडस्ट्री में हलचल पैदा कर दी है।
मद्रास हाई कोर्ट की दो जजों की खंडपीठ ने इस मामले में स्पष्ट किया कि केवल भारी-भरकम निवेश किसी फिल्म को सेंसर नियमों से राहत दिलाने का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने ‘केवीएन प्रोडक्शंस’ (KVN Productions) की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें फिल्म में लगे 500 करोड़ रुपये का हवाला दिया गया था।
न्यायाधीशों ने सुनवाई के दौरान पिछली ‘सिंगल बेंच’ के फैसले पर भी सवाल उठाए। अदालत का मानना है कि पहले के आदेश में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) को अपना पक्ष रखने का उचित समय नहीं दिया गया। कोर्ट ने कहा कि यह एक गंभीर प्रक्रिया है जिसे जल्दबाजी में पूरा नहीं किया जा सकता।

Jana Nayagan Censor Case: क्या है विवाद की मुख्य जड़?
इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब सेंसर बोर्ड ने फिल्म को सीधे सर्टिफिकेट देने के बजाय ‘रिवाइजिंग कमेटी’ के पास भेजने का निर्णय लिया। Jana Nayagan Censor Case में बोर्ड का तर्क है कि फिल्म के खिलाफ कुछ गंभीर शिकायतें मिली थीं, जिनकी जांच करना बोर्ड के चेयरमैन का विशेषाधिकार है।
असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल एआरएल सुंदरेशन ने बोर्ड का पक्ष रखते हुए कहा कि नियमों के तहत शिकायतकर्ता की पहचान उजागर नहीं की जा सकती। उन्होंने दलील दी कि बोर्ड ने समय सीमा के भीतर ही निर्माताओं को संभावित कट्स और बदलावों के बारे में सूचित कर दिया था।
फिल्म निर्माताओं के आरोप और कानूनी दलीलें
दूसरी ओर, फिल्म के निर्माताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश पारसरन ने बोर्ड की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सेंसर बोर्ड की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है। उनके अनुसार, जब एक बार संशोधनों के बाद सर्टिफिकेट का आश्वासन दे दिया गया था, तो उसे दोबारा रोकना अनुचित है।
निर्माताओं का कहना है कि उन्होंने बोर्ड द्वारा सुझाए गए सभी बदलाव कर दिए थे। ऐसी स्थिति में दो दिनों के भीतर सर्टिफिकेट जारी हो जाना चाहिए था। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क पर असहमति जताते हुए प्रक्रियात्मक गहराई पर जोर दिया है।
विजय की राजनीतिक पारी और CBI जांच का दबाव
‘जन नायगन’ न केवल एक फिल्म है, बल्कि यह थलपति विजय के राजनीतिक करियर के लिए भी एक बड़ा लॉन्चपैड मानी जा रही है। विजय अपनी पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) के माध्यम से आगामी विधानसभा चुनावों में उतरने की तैयारी कर रहे हैं।
फिल्म की रिलीज में देरी के साथ-साथ विजय व्यक्तिगत रूप से भी कानूनी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। करूर भगदड़ मामले में CBI उनसे लगातार पूछताछ कर रही है। हाल ही में दिल्ली में हुई उनकी दूसरी पेशी ने इस मुद्दे को और गरमा दिया है।

पोंगल पर रिलीज नहीं हो सकी फिल्म
मूल रूप से 9 जनवरी को रिलीज होने वाली यह फिल्म अब कानूनी विवादों के कारण सिनेमाघरों तक नहीं पहुंच पाई है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए निर्माताओं को वापस मद्रास हाई कोर्ट जाने का निर्देश दिया था। अब सभी की नजरें 21 जनवरी के बाद आने वाले फैसले पर टिकी हैं।
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