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कुँवारा आँगन होता है क्या ! आँगन की भी शादी होती है क्या ! कहाँ गुम हो गईं हमारी शादियों से पुरानी परम्पराएँ ?

GHAR (1)

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Marital Rituals: पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव और भागमभाग भरी जिंदगी के बीच आज हम हर काम बस फटाफट करना चाहते हैं यहाँ तक कि शादी भी, जिसकी पम्पराएं और रिवाज हमें हमारी मिटटी से जोड़े रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। पहले माना जाता था कि जब घर में बेटी की शादी होती है तो केवल उसके भाग नहीं दूसरे घर से जुड़ते हैं बल्कि बेटी के मायके के आँगन के भी भाग उसके ससुराल के आँगन से जुड़ते हैं उसका भी विवाह संपन्न होता है।

आँगन कुँवारे न रह जाएँ :-

पुराने लोग मानते हैं कि जब तक घर से कन्या की विदाई न हो तो घर-आँगन कुँवारा रह जाता है। अब जब अक्सर घरों में जगह की कमी रहती है या फिर ये सोचा जाता है की मेहमानों के आने से घर अस्त व्यस्त हो जाएगा तो ज़्यादातर वैवाहिक कार्यक्रम बरातघर और मैरिज गार्डन में करने की परंपरा चल निकली है जिस वजह से अपने पूर्वजों की मानें तो घर के आँगन कुँवारे ही रह जाते हैं , जबकि पहले इसे बहोत बुरा माना जाता था इसलिए जब अपने बच्चों की शादी अपने घर-आँगन से करना मुमकिन नहीं होता था तो लोग दूसरों की बेटियों का विवाह अपने घर -आँगन में करा देते थे।

लॉन्ग से शॉर्ट हुई शादी:-

समय की कमी या ज़्यादा पैसे खर्च करने से बचने के लिए लोग अब शादी भी शॉर्ट में करने लगे हैं ,आज सब कुछ औपचारिक सा लगने लगा है जबकि आज से दो दशक पहले ही जाके देखें तो शादी अपने पुराने पारम्परिक ढंग से होते हुए कई दिनों तक चलती थी इस दौरान वर -वधू के परिवार वाले एक दूसरे से परिचित हो जाते थे ,आपस में घुल मिल जाते थे लेकिन अब तो लोगों के पास इतना वक़्त ही नहीं है।

गुम हुई शादी की शान शहनाई :-

एक ज़माने में शादी वाले घर की ढोलक अनजान लोगों को भी बता देती थी कि इस घर में शहनाई बजने वाली है जिसकी गूँज हर किसी को न केवल मीठी लगती बल्कि अपनी और खींच भी लेती है इसलिए इसके बिना शादी अधूरी ही मानी जाती थी लेकिन अब ढोलक की थाप भी गुम हो गई और शहनाई की मधुर तान भी ,अब सुनाई देता है तो बैंड और डीजे के शोर जो बुज़र्गों और कमज़ोर लोगों के दिल की धड़कने बढाकर घबराहट का शिकार बना देता है क्योंकि इसके शोर में एक दूसरे की आवाज़ सुनना भी मुश्किल हो जाता है तो फिर सबका ख्याल रखना कैसे मुमकिन होगा।

बैंड से बभी आगे निकले डीजे :-

पहले जब ढोल नगाड़े बजते थे तो पैर थिरकते थे लेकिन लोगों की मर्ज़ी के हिसाब से उसका शोर कानफोड़ू नहीं होता था और उत्साह भी दुगना हो जाता था लेकिन अब जब डीजे बजता है तो लोग किसी की परवाह किए बग़ैर बस नाचते जाते हैं फिर चाहे सड़क पर ही क्यों न हों अपना लाव -लश्कर लेकर लोग शान से निकलते हैं ट्रेफिक जाम की भी परवाह नहीं करते हैं।

घोड़ी और डोली ग़ायब :-

पहले विवाह का मतलब था दूल्हा घोड़ी पे बैठकर आएगा और दुल्हन को ले जाएगा लेकिन वक़्त बदलने के साथ ही ये चलन भी कम हो गया बग्घी ,घोड़ी आ भी जाए तो ऐसी डोली नहीं मिलती जो दुल्हन को ससुराल तक पहुँचा सके काकहने का मतलब ये है कि हमने शादी आसान करली,मज़ा लेने के लिए बहोत महँगी भी कर ली पर वो आनंद नहीं ले पाए जो पहले की सादगी में थे क्यों ? ये एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब हमें ही ढूँढना है।

शॉर्ट में की गई शादी के नुकसान :-

नए अंदाज़ में फटाफट शादी तो हो जाती है लेकिन दूल्हा – दुल्हन एक दूसरे के अलावा और किसी को नहीं पहचानते ,क़रीबी रिश्तेदार भी वर -वधू को दुआएँ ,आशीर्वाद देकर चले जाते हैं लेकिन ज़्यादा वक़्त साथ न बिताने की वजह से नए रिश्तेदारों को याद रखना उनके लिए मुश्किल हो जाता है।

रिश्तेदारों के परिचय का रिवाज छूटा :-

पहले शादी में रिश्तेदारों की भी अहम् भूमिका रहती थी उनसे जुड़े कुछ रीत रिवाज भी निभाए जाते थे ये याद करके कि ये रस्म बहन या बहनोई की है या फिर साली या देवर के लिए है लेकिन शादी को छोटा करने की कोशिश में रस्में तो रहीं हैं रिश्तेदार भी तार्रुफ़ को तरसते रह जाते हैं जबकि पहले बाक़ायदा परिचय कराया जाता था।

प्रकृति का आभार पूजन भी हुआ कम :-

हमारी विवाह परम्पराओं में प्रकृति को निमंत्रण से लेकर उनका आभार प्रकट करने तक वर्णन हैं और पहले लोग इन्हें बड़े उत्साह से नाच गाकर मनाते भी थे नदियों ,कुओं को पूजते थे लेकिन अब न आसानी से नदियाँ मिलतीं न कुएं तो लोग आधुनिक नल या हैंडपंप को पूजकर काम चला लेते हैं ,ऐसे में शादी का मज़ा तो कम होना ही है। मड़वा के नीचे सालेय व उमर के पेड़ की डगाल लगाई जाती थी ताकि विवाह के ये पौधे भी साक्षी बनें पर अब तो आम का पेड़ मिलना भी मुश्किल हो जाता है।

मिट्टी भी नहीं मिलती :-

हमारे यहाँ मिट्टी का भी बड़ा महत्व है क्योंकि इसी से चूल्हे बनाए जाते हैं जिनपर शादी वाले दिन भोजन बनता है, उसके लिए महिलाएं नाचते गाते हुए मिटटी लाती थी फिर अपनी परम्परा के अनुसार गिनके मड़वे के पास चूल्हे बनातीं, इसे माटी मागर कहते हैं जिसमें इन्हीं चूल्हों में शादी के एक दिन पहले रौ छौकने की रस्म होती है इन्हीं में लावा भूंजने के बाद परोसने की रस्म भी निभाई जाती लेकिन सिमटी सी शादी में ये संभव कहाँ।

लोकगीत भी क़रीब लाते थे अपनों को :-

यहाँ गाने नाचने का मतलब सिर्फ धूम धड़ाका करना नहीं है बल्कि इनके ज़रिये भी हम अपनों का ,रिश्तों का महत्व समझते हैं क्योंकि इनमें कई रिश्तों का ज़िक्र बड़ी खूबसूरती से किया जाता है यहाँ तक की गाली भी बड़े प्यार से दी जाती है जो ज़िंदगी भर इन पलों की खुशबू बनकर याद रहती है जिसमें नेग भी मिलता है और गारी न गाने पर दूल्हे के घर वाले दुल्हन के घर वालों से नाराज़ भी हो जाते हैं ,समधी साधन के बीच के गाने इसी तरह फिल्मों में भी लोकप्रिय हुए हैं। शादी की इन रस्मों के लिए दूल्हा -दुल्हन का छोटा -मोटा काम करने वाले नाउन,नाई को भी नेग मिलता है उनसे भी हमारा सम्बन्ध बताया जाता है।

धोबिन और नाई तक का महत्व :-

शादी की इन रस्मों के लिए दूल्हा -दुल्हन का छोटा -मोटा काम करने वाले नाउन,नाई या धोबिन की भी अहम भूमिका होती है और उनको भी नेग मिलता है , समाज ,के सब लोगों से हमारा सम्बन्ध समझाया जाता था नई पीढ़ी को ,पंडित जी ही नहीं बल्कि इनके बिना भी विवाह पूर्ण नहीं माना जाता है।

विदाई भी रात में नहीं देते थे :-

आजकल बेटी की विदाई देर रात में होती है जिससे सभी रिश्तेदार मौजूद नहीं रह पाते पर पहले इस क्षण को बेहद ख़ास और बेटी की मायके में आख़री रात मानते हुए अगले दिन विदाई दी जाती थी ताकि बेटी को सभी मायके वालों का आशीर्वाद प्राप्त हो सके इस वक़्त लोग बेटी को उपहार भी देते थे जो उसे भावी जीवन में काम आए और उनकी याद भी ताज़ा रहे।

सहयोग भी हुआ ख़त्म :-

पहले आस पड़ोस किसी के घर शादी हो तो न केवल लोग बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते थे बल्कि उन से जो बन पड़ता था वो सहयोग भी करते थे मेहमानों का स्वागत करने में भी पीछे नहीं रहते थे क्योंकि किसी के भी घर की बेटी -बहू को लोग अपने घर की बेटी जैसी ही इज़्ज़त देते हुए उसके मान सम्मान का ख्याल रखते थे। जिससे किसी ग़रीब को भी शादी करना अखरता नहीं था पर अब लोग आते तो हैं लेकिन सिर्फ मीन मेक निकलने मदद करने नहीं ,यहाँ तक कि परिवार को लोग भी हाँथ बाँधे खड़े रहते हैं अपने आपसी मन मुटाव का इतना ख्याल रखते हैं कि मेहमान भी बाँट लेते हैं।

भेाजन कराने में भी पम्परा का साथ छूटा :-

पहले शादियों में खाने की वेराइटी भले ही इतनी न हो लेकिन आराम से बैठाकर खाना खिलाया जाता था, बारातियों को तो पैर-हाँथ धुलाकर पंगत में बैठाकर भेाजन कराया जाता था पर अब बफर सिस्टम के चलते ऐसा नज़ारा कम ही देखने को मिलता है खाने में भी लोग जल्दबाज़ी देखते हैं और थाली सजा तो लेते हैं लेकिन खाने के लिए नहीं टेस्ट करने के लिए जिससे खाना भी बर्बाद होता है क्योंकि खाना उन्हें खुद ही लेना पड़ता है न कोई परोसने आता है न पहचानने की कौन आया है कौन नहीं।

मर्ज़ी से दिया जाने वाला दहेज बना मजबूरी :

सभी लोग अपनी मर्ज़ी से बेटी को दहेज़ में देने के लिए काफी पहले से उपहार जोड़ने लगते थे और शादी में दे देते थे लेकिन अब बाक़ायदा वर पक्ष से माँग की जाती है कि उन्हें दहेज़ में क्या -क्या चाहिए और मजबूरी में लड़की वालों को ये सब देना पड़ता है। ये कहना ग़लत नहीं होगा कि ये लेनदेन शादी का सौंदर्य और प्रेम समाप्त कर इसे बिज़नेस बना रहा है ,इसी के चलते जो रस्में बाक़ी है वो भी कि जितना दिया है उतना वापस पाने की चाह में चल रही हैं यानी नेग भी ज़्यादा इसीलिए लिया जाता है।

घर ढूंढता है घर वालों को :-

घर – आंगन से दूर शादी करने से न अब पहले जैसे घर से बारात निकलती है न घर से बेटी की विदाई होती थी इसलिए जनवास में दोनों परिवारों के मिलने और मौज -मस्ती करने का चलन भी ख़त्म हो रहा है जबकि पहले यहाँ कवित्र होता था , वधू पक्ष की महिलाएं वर पक्ष के लोगों से रंग-गुलाल भी खेलती थीं , वही अब महँगे कपड़े न ख़राब हो जाएँ इस डर से लोग संभल – संभल कर चलते हैं खेलना तो बहोत दूर की बात है फिर ऐसे में शादी वाले दिन कहीं दूर शहनाई बजे भी तो क्या हुआ घर तो सूना ही रह जाता है अपने अंदर बसने वालों को ढूढ़ता रहता है।

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