Story Of Brinjal : हर सब्ज़ी का अपना अलग मज़ा है लेकिन सब्ज़ियों के राजा बेंगन की तो बात ही निराली सर पर ताज पहने गोल तो कभी पतले लम्बे बैगन न सिर्फ अपना आकार कई तरह का रखते हैं बल्कि इनके रंग भी बहोत से होते हैं ,जैसे – पर्पल या बैगनी जिसमें भी हल्का और गहरा रंग होता है उसमें भी कभी कभी सफेद धारियां दिखती हैं ,फिर मिलते हैं सफ़ेद ,हरे और पीले बैगन भी। और ख़ास बात ये है कि इनकी सब्ज़ी भी इनका रंग रूप देखकर ही बनाई जाती है ,जैसे भरवा बैंगन बड़े और गोल बैगन से बनाई जाती है तो वहीं कलौंजी गोल मगर छोटे बेंगन से बनाते हैं ,और वैसे बैगन तो बैगन है, इसे कैसे भी बनाओ ये स्वादिष्ट तो लगते ही हैं और हों भी क्यों न आख़िर ये भी तो हमारी तरह भारत वासी है तो इनका ज़ायका हर भारतवासी के मन को तो भायेगा ही। भारतवासी इसलिए क्योंकि इसकी उत्पत्ति भारत में हुई थी और इस लेहाज़ से ये भारत का मूल निवासी कहलाता है ये हम ऐसे ही नहीं कह रहे हैं , हड़प्पा की खुदाई से मिले एक व्यंजन ने इस बात की पुष्टि की है कि बैंगन उपमहाद्वीप की मूल सब्ज़ी है। इसके अलावा और भी पुरातात्विक खोजों से पता चलता है कि बैंगन का इतिहास 4000 ईसा पूर्व से शुरू होता है। प्राचीन भारत में इसे ‘वार्ताका’ या ‘वाटिंगना’ कहा जाता था और इसकी खेती प्राचीन काल से हो रही है। इसे फारसियों द्वारा अफ्रीका और अरबों द्वारा स्पेन में ले जाया गया, जहाँ से ये यूरोप में फैला।
बैंगन की उत्पत्ति और फैलाव /Origin and spread of eggplant :-
बैंगन की उत्पत्ति भारत के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से मानी जाती है।अगर आप इसे बिना पकाए चखें तो ये कुछ बेस्वाद सा लगता है लेकिन वहीं जब आप इसे नमक मिर्च के साथ पकाते हैं तो इसके कहने ही क्या फिर चाहे आप इसकी कलौंजी बनाएं बेगुन भाजा या भरता इसका कोई जवाब नहीं और बैंगन गूदे से भरी ऐसी सब्ज़ी है जिसका छिलका और बीज दोनों खा लिए जाते हैं, मतलब कुछ फेकना नहीं पड़ता , किसी भी सब्ज़ी के साथ इसे मिक्स करो ये सबके साथ अच्छा लगता है और फिर बैगन राजा खनिजों, विटामिनों और फॉस्फोरस, कैल्शियम, आयरन और अन्य महत्वपूर्ण विटामिन जैसे पोषक तत्वों का खज़ाना तो है ही। स्पेन के लोग इसे ‘बेरेनजेना’ कहते थे, जिसे बाद में पड़ोसी देश पुर्तगालियों ने अपना लिया और इसका नाम ‘बेरिंगेला’ रख दिया। दुनिया भर की यात्रा करने के बाद भी , बैंगन पुर्तगालियों के साथ जब फिर भारत आया तो इसे ‘बैंगन’ ही पुकारा गया।
फारसियों ने इसे भारत से अफ्रीका और अरबों ने इसे स्पेन में पहुँचाया, जिसके बाद ये पूरे यूरोप में फैल गया। चीन में इसकी खेती 1500 साल से भी पहले से हो रही है। ये भारत से होकर धीरे-धीरे दुनिया के अन्य हिस्सों में फैला। बैगन का पहला लिखित रिकॉर्ड 544 सीई के एक प्राचीन चीनी कृषि ग्रंथ किमिन या ओशू में ही पाया जाता है। आज, दुनिया के गर्म भागों में बैंगन की कई किस्में पाई जाती हैं। चीन और भारत अब भी इसके बड़े उत्पादक हैं।
नाम का इतिहास :
शुरुआत में दक्षिण-पूर्व एशिया से आए लोगों ने जब बैंगन को उगाया , तो इसे संस्कृत में ‘वार्ताका’ कहा गया। प्राचीन भारत में, ‘वार्ताका’, ‘वतिंगना’ या ‘वर्तकू’ भी कहा जाता था। जिसका अर्थ है “वायु को हटाने वाला”। ये नाम इसके औषधीय उपयोग से जुड़ा था। जिसके शाब्दिक अर्थ को समझने की कोशिश करें तो संस्कृत शब्द वातिन-गण का अर्थ है ‘वायु-विकार को दूर करने वाला वर्ग’ क्योंकि माना जाता था कि ये भी पेट फूलने का इलाज करता है।
बैंगन नाम भारत के साथ कई और दूसरे देशों में भी प्रचलित है, सफ़ेद रंग के बैगन , के पौधे को (Eggplant) भी कहते हैं क्योंकि ये अंडे के आकार और रंग के होते हैं। 1763 में पहली बार दर्ज किया गया, शब्द “बैंगन” मूल रूप से सफेद किस्मों के लिए ही प्रयोग किया गया था, जो मुर्गी के अंडे की तरह दिखते हैं। बैंगन की सफेद किस्मों को ‘ईस्टर सफेद बैंगन ‘नाम से भी जाना जाता है। इंग्लिश में इसे मिलते जुलते नाम Brinjal ब्रिंजल से पुकारा जाता है , ये शब्द अरबी और संस्कृत से ही आया है। भारतीय शब्द वती-गण जब फ़ारसी में गया तो ‘बादिंगान ‘ हो गया और अरबी में पहुँचा तो इसे ‘बादिनजान ‘कहा गया। बैंगन अमेरिका में आज भी बहोत पसंद किया जाता है लेकिन वहाँ इसे ‘ऑबर्जिन’ कहा जाता है। इसे दक्षिण एशिया में ‘ब्रिंजल’, इटली में ‘मेलानज़ाना’, स्पेन में ‘बेरेनजेना’ नाम से जाना जाता है। यही ‘ऑबर्जिन’ जब पुर्तगाल पहुँचा था तो इसे ‘बेरेन्गेला ‘कहा गया तो वहीं कश्मीर में इसे वांगुन कहते हैं।
सांस्कृतिक महत्व
उडुपी, कर्नाटक में, एक खास किस्म के बैंगन को ‘गुल्ला’ कहा जाता है और इसका अपना एक धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। प्रागैतिहासिक काल से ही इसे खाया जाता रहा है, इसकी खेती की बात करें तो इसे बोन की शुरुआत भारत और श्रीलंका से हुई थी। बैंगन का उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में लगभग पाँचवीं शताब्दी में मिलता है।बैंगन कई सब्ज़ियों के साथ घुल मिल जाता है इसलिए इसने बौद्ध भिक्षुओं का ध्यान भी अपनी और आकर्षित किया और उनके साथ दुनिया भर की यात्रा करते हुए काफ़ी लोकप्रिय हुआ। बौद्ध और जैन ग्रंथों सहित कई धर्म ग्रंथों में इसका उल्लेख है।
आयुर्वेद क्या कहता है :–
आयुर्वेद में भी बैंगन को इसके गुणों के कारण राजसिक भोजन माना जाता है, क्योंकि इसकी प्रकृति तामसिक है इसलिए इसके सेवन से पेट में अग्नि, आक्रामकता आदि को उत्तेजित करता है। इसके इन्हीं गुणों के कारण योद्धाओं के लिए युद्ध से पहले विशेष तौर पर बेंगन खाने और खिलाने की शिफारिश की जाती थी।
वैज्ञानिक तथ्य :-
वैज्ञानिक बैंगन को केवल पौष्टिक सब्ज़ी नहीं , फल या बेरी भी मानते हैं और इसे “नाइटशेड परिवार” की श्रेणी में रखते हैं , जो सोलनेसी यानी फूल वाले पौधों का परिवार होता है जिसमें बैंगन के अलावा 2,700 प्रजातियाँ शामिल हैं और सब्ज़ियों में इसमें आलू, बैंगन, टमाटर और मिर्च भी आते हैं, बैंगन के पौधे को औपचारिक रूप से ‘सोलनम मेलोंगेना ‘के नाम से जाना जाता है।
कई दुखों का है एक इलाज :-
बैंगन को औषधीय गुणों वाला इसलिए माना जाता है क्योंकि ये कई तकलीफों में हमें राहत देता है, इसमें एनाल्जेसिक और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं। बैंगन से ब्लड शुगर कंट्रोल रहता है और दिल की बीमारियों में भी ये लाभदायक है विशेषज्ञ कहते हैं – अगर कान में दर्द हो तो बैगन के पौधे की जड़ को साफ़ करके उसके रस की 1-2 बूँद कान में डालने से कान का दर्द और सूजन भी कम हो जाती है. पेशाब करते समय जलन एवं दर्द महसूस हो तो बैंगन के जड़ के रस की 5 मिली मात्रा का सेवन करें। तो वहीं बैंगन की जड़ का का पाउडर दांतों पर रगड़ने से दांतों का दर्द दूर हो जाता है. पेट की समस्याओं के लिए तो बैगन को मुफीद माना ही गया है ,जिसमें पेट फूलना, अपच और भूख ना लगने ,जी मचलाना ,जैसी परेशानियों के अलावा उलटी रोकने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है वो भी बस ऐसे कि 5 मिली बैंगन की पत्तियों के रस में 5 मिली अदरक का रस मिलाकर पीना है और पेट की समस्या ग़ायब। यही नहीं ये बवासीर जैसी गंभीर बीमारी की भी दवा है,इसके लिए बैंगन के पत्तों को महीन पीसकर उसमें जीरा और शक्कर मिलाकर खाएँ तो ब्लीडिंग और दर्द से जल्द राहत मिल जाएगी। जोड़ों में दर्द हो तो बैंगन को भूनकर उसे पीस लें और दर्द वाली जगह पर कपड़े में लपेटकर बांधें, इससे दर्द मिट जाएगा ,अगर अचानक कोई चोट लग जाए तो बैंगन को भूनकर उसमें हल्दी व प्याज़ मिलाकर चोट वाली जगह पर बांधें, दर्द भी हो रहा हो तो भुने हुए बैंगन के 10-15 मिली रस में थोड़ा गुड़ मिलाकर खा लें। बैंगन की जड़ के चूर्ण को पानी में उबालकर और फिर ठंडा करके घाव को धोने से घाव भी जल्दी ठीक हो जाता है। खुजली की समस्या में बैंगन के पत्तों और फलों को कुचलकर उसमें शक्कर मिलाकर खुजली वाली जगह पर लगाने से खुजली मिट जाती है। अनिद्रा की बीमारी हो तो बैंगन को रोज़ अपनी डाइट में शामिल करें।
ज़्यादा खा लिए तो पागल हो जाएँगे :-
बेंगन हैं तो फायदेमंद और मज़ेदार पर ज़्यादा खा लिए तो पागल होने का डर भी है ये हम नहीं बल्कि 13वीं सदी के इतालवी पारंपरिक लोककथाएँ कहती हैं। 19वीं सदी के मिस्र की झुलसा देने वाली गर्मी में जब किसी का पागलपन सर चढ़कर बोला तो कहा गया..ये बैगन खाने का असर है। इसे खाने से ही शरीर की गर्मी बढ़कर सर में चढ़ गई है। जहाँ इसका सीमित इस्तेमाल पेट की समस्याओं से निजात दिलाता हैं वहीं ज़्यादा खा लेने से बैंगन गैस बनाने का काम भी करता है इसलिए इसे बादी भी माना जाता है।
