सिंधु जल समझौता (Indus Water Treaty) एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में आ गया है। इस बार घमासान सीमा पर नहीं, बल्कि अमेरिका की धरती पर दो देशों के शीर्ष राजनयिकों के बीच चल रहा है। वॉशिंगटन में पाकिस्तान के राजदूत रिजवान सईद शेख ने अमेरिकी पत्रिका ‘न्यूजवीक’ (Newsweek) में एक लेख लिखकर भारत पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं।
पाकिस्तानी राजदूत का यह लेख असल में अमेरिका में भारत के राजदूत विनय क्वात्रा द्वारा लिखे गए एक पूर्व लेख का जवाब था, जिसमें भारत ने सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान के दोहरे रवैये और सीमा पार आतंकवाद के समर्थन की पोल खोली थी। भारत के इस कड़े कूटनीतिक प्रहार से छटपटाए पाकिस्तान ने अब अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने खुद को पीड़ित दिखाने का कार्ड खेलना शुरू कर दिया है।
अमेरिका में छिड़ा कूटनीतिक युद्ध: विनय क्वात्रा बनाम रिजवान सईद शेख
यह पूरा मामला तब गरमाया जब अमेरिकी मीडिया प्लेटफॉर्म पर भारतीय राजदूत विनय क्वात्रा ने एक विश्लेषणात्मक लेख के जरिए वैश्विक मंच पर भारत का रुख साफ किया। उन्होंने रेखांकित किया कि 1960 में हुई सिंधु जल संधि एक असमान और भारत की ओर से दी गई अत्यधिक रियायतों वाली व्यवस्था थी, जिसका पाकिस्तान ने लगातार दुरुपयोग किया है।
भारतीय राजदूत ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) पर भारत द्वारा निर्मित की जा रही न्यायसंगत और वैध जलविद्युत (Hydroelectric) परियोजनाओं में लगातार तकनीकी और कानूनी अड़ंगे डालता रहा है। इसके साथ ही, भारत ने बार-बार दोहराया है कि ‘खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते।’
इस कूटनीतिक वार का जवाब देते हुए पाकिस्तानी राजदूत रिजवान सईद शेख ने ‘न्यूजवीक’ में लिखा कि भारतीय दूतावास की ओर से मनगढ़ंत बातें फैलाकर संधि के इतिहास और उद्देश्यों को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है।
पाकिस्तानी राजदूत की दलील: ‘IWT कोई भारत का अहसान नहीं’
पाकिस्तान के राजदूत रिजवान सईद शेख ने अपने लेख में दलील दी कि सिंधु जल समझौता कोई भारत की उदारता या पाकिस्तान को दी गई कोई रियायत नहीं थी। उन्होंने लिखा:
“IWT एक बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय समझौता है, जो वर्ल्ड बैंक की मदद से दशकों तक चली जटिल बातचीत के बाद 1960 में अस्तित्व में आया था। यह सोच-समझकर तैयार किया गया कानूनी ढांचा था, जिसका मकसद अपस्ट्रीम (भारत) में मनमाने फैसलों की जगह स्पष्ट और बाध्यकारी अधिकारों-दायित्वों को लाना था।”
पाकिस्तान का आरोप है कि भारत अप्रैल 2025 से संधि को लेकर जो कड़ा रुख अपना रहा है और इसे स्थगित या संशोधित करने की बात कर रहा है, उसका कोई कानूनी आधार नहीं है। पाकिस्तान इसे भारत की ‘एकतरफा कार्रवाई’ बताकर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर कानूनी दुहाई दे रहा है।
भारत का स्पष्ट संदेश: ‘खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते’
भारत का रुख इस मुद्दे पर अत्यंत व्यावहारिक और सख्त रहा है। भारत का मानना है कि कोई भी अंतर्राष्ट्रीय संधि सद्भावना और विश्वास के माहौल में ही काम कर सकती है। जब पाकिस्तान लगातार भारत के खिलाफ सीमा पार आतंकवाद को पोषित कर रहा है, तो भारत से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह एकतरफा तरीके से संधि के नियमों का पालन करता रहे।
भारत ने औपचारिक रूप से पाकिस्तान को सिंधु जल समझौता में संशोधन (Notice to Modify) के लिए नोटिस भेजा है। भारत की मुख्य चिंताएं निम्नलिखित हैं:
- जनसंख्या और ऊर्जा की जरूरतें: 1960 के बाद से भारत की जनसांख्यिकी और ऊर्जा आवश्यकताओं में भारी बदलाव आया है।
- स्वच्छ ऊर्जा का विकास: भारत अपनी पश्चिमी नदियों पर पर्यावरण-अनुकूल जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण करना चाहता है, जिसमें पाकिस्तान अनावश्यक रुकावटें पैदा करता है।
- आतंकवाद पर रोक: आतंकवाद और कूटनीतिक सहयोग एक साथ नहीं चल सकते।
सिंधु जल समझौता (1960) क्या है? इतिहास और संरचना
सिंधु जल संधि दुनिया के सबसे पुराने और लंबे समय तक टिके रहने वाले नदी जल समझौतों में से एक मानी जाती है। 19 सितंबर 1960 को कराची में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने इस पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें विश्व बैंक (World Bank) ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी।
| पहलू | पूर्वी नदियां (Eastern Rivers) | पश्चिमी नदियां (Western Rivers) |
| नदियां | रावी, ब्यास, सतलुज | सिंधु, झेलम, चिनाब |
| नियंत्रण | भारत | पाकिस्तान |
| जल आवंटन | ~20% (कुल जल का) | ~80% (कुल जल का) |
पूर्वी और पश्चिमी नदियों का बंटवारा
इस समझौते के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों को दो हिस्सों में बांटा गया:
- पूर्वी नदियां (Eastern Rivers): रावी, ब्यास और सतलुज। इनका नियंत्रण और पूर्ण जल उपयोग का अधिकार भारत को मिला।
- पश्चिमी नदियां (Western Rivers): सिंधु, झेलम और चिनाब। इनका अधिकार मुख्य रूप से पाकिस्तान को दिया गया।
विश्व बैंक की मध्यस्थता और संधि के नियम
इस संधि के तहत भारत को कुल सिंधु नदी प्रणाली का केवल 20% जल मिला, जबकि 80% जल का प्रवाह पाकिस्तान की ओर जाने दिया गया। भारत को पश्चिमी नदियों पर गैर-उपभोग्य (Non-consumptive) उपयोग जैसे कि रन-ऑफ-द-रिवर (Run-of-the-river) बिजली परियोजनाओं के निर्माण का सीमित अधिकार दिया गया था।
भारत को संधि में बदलाव की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?
पिछले छह दशकों में परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। भारत का मानना है कि 1960 में बना यह ढांचा 21वीं सदी की भू-राजनीतिक और पर्यावरणीय वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता।
1. सीमा पार आतंकवाद और रणनीतिक सुरक्षा
भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज करके जल कूटनीति नहीं चलाई जा सकती। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के चलते भारत अब इस संधि की समीक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से देख रहा है।
2. जलविद्युत परियोजनाएं और पाकिस्तान का अड़ंगा
भारत की किशनगंगा (330 MW) और रातले (850 MW) जलविद्युत परियोजनाओं पर पाकिस्तान ने लगातार विश्व बैंक और हेग स्थित मध्यस्थता अदालत (Court of Arbitration) में आपत्तियां उठाई हैं। भारत का तर्क है कि पाकिस्तान की यह जिद तकनीक-विरोधी है और संधि की मूल भावना को बाधित करती है।
क्या भारत एकतरफा कार्रवाई कर सकता है? अंतर्राष्ट्रीय कानून का पहलू
अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत, किसी भी संधि को बनाए रखने के लिए ‘रेबस सिक स्टैंटिबस’ (Rebus sic stantibus) का सिद्धांत लागू होता है। इसका अर्थ है कि यदि संधि के समय मौजूद बुनियादी परिस्थितियों में मूलभूत परिवर्तन आ जाता है, तो पक्षकार संधि से पीछे हट सकते हैं या उसमें बदलाव की मांग कर सकते हैं।
भारत का पक्ष है कि 1960 की तुलना में आज जलवायु परिवर्तन, जल संकट, जनसंख्या वृद्धि और आतंकवाद जैसी चुनौतियां बिल्कुल भिन्न हैं। इसलिए सिंधु जल समझौता में संशोधन करना समय की मांग है। पाकिस्तान का यह दावा कि यह भारत की ‘गैर-कानूनी कार्रवाई’ है, भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं के आगे टिकता नजर नहीं आ रहा है।
निष्कर्ष
अमेरिका के मंच पर भारतीय और पाकिस्तानी राजदूतों के बीच हुआ यह वाकयुद्ध यह स्पष्ट करता है कि सिंधु जल समझौता अब केवल पानी का बंटवारा नहीं रहा, बल्कि यह भारत-पाकिस्तान संबंधों का मुख्य कूटनीतिक हथियार बन चुका है। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने पीड़ित कार्ड खेलकर यथास्थिति बनाए रखना चाहता है। वहीं दूसरी ओर, भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं, राष्ट्रीय सुरक्षा और बदली हुई भू-राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर संधि में बड़े बदलावों के लिए दृढ़ संकल्पित है। पाकिस्तान को यह समझना होगा कि आतंकवाद का समर्थन करते हुए द्विपक्षीय समझौतों के पूर्ण लाभ की उम्मीद रखना व्यावहारिक नहीं है।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
Q1: सिंधु जल समझौता (Indus Water Treaty) क्या है?
Ans: सिंधु जल समझौता 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ एक जल-बंटवारा करार है। विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुए इस समझौते के तहत पूर्वी नदियों (रावी, ब्यास, सतलुज) का पानी भारत को और पश्चिमी नदियों (सिंधु, झेलम, चिनाब) का पानी मुख्य रूप से पाकिस्तान को दिया गया था।
Q2: अमेरिकी मीडिया में पाकिस्तान के राजदूत ने क्या आरोप लगाए हैं?
Ans: वॉशिंगटन में पाकिस्तानी राजदूत रिजवान सईद शेख ने आरोप लगाया कि भारत सिंधु जल संधि को एकतरफा तरीके से निलंबित करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने दलील दी कि यह समझौता भारत का कोई अहसान नहीं, बल्कि विश्व बैंक के तहत हुआ एक बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय कानूनी अनुबंध है।
Q3: भारत सिंधु जल समझौते में संशोधन क्यों चाहता है?
Ans: भारत का मानना है कि 1960 के बाद से जनसांख्यिकी, जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा जरूरतों में बड़े बदलाव आए हैं। इसके अलावा, पाकिस्तान द्वारा लगातार सीमा पार आतंकवाद को बढ़ावा देने और भारत की वैध जलविद्युत परियोजनाओं में कानूनी अड़ंगे डालने के कारण संधि की समीक्षा जरूरी है।
Q4: ‘खून और पानी साथ नहीं बह सकते’ का क्या अर्थ है?
Ans: यह बयान भारत सरकार का रणनीतिक रुख दर्शाता है। इसका तात्पर्य है कि पाकिस्तान एक तरफ भारत के खिलाफ आतंकवाद को प्रायोजित करे और दूसरी तरफ भारत से जल समझौते के तहत पूर्ण सहयोग की उम्मीद रखे, यह दोनों बातें एक साथ संभव नहीं हैं।
Q5: क्या पाकिस्तान भारत की जलविद्युत परियोजनाओं को रोक सकता है?
Ans: नहीं, सिंधु जल संधि के तहत भारत को पश्चिमी नदियों पर ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ परियोजनाओं के जरिए बिजली बनाने का कानूनी अधिकार प्राप्त है। हालांकि, पाकिस्तान अक्सर डिजाइन और तकनीकी मानकों का हवाला देकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन परियोजनाओं में देरी कराने का प्रयास करता है।
अधिक जानकारी के लिए, आज ही Shabdsanchi के सोशल मीडिया पेजों को फ़ॉलो करें और अपडेटेड रहें।
- Facebook: shabdsanchi
- Instagram: shabdsanchiofficial
- YouTube: @shabd_sanchi
- Twitter: shabdsanchi

