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भारत का सबसे बड़ा श्मशान घाट, 24 घंटे धधकती है आग, लाशों के कान में पूछा जाता है सवाल

वाराणासी। उत्तर-प्रदेश के वाराणासी में गंगा के तट पर स्थित मणिकर्णिका घाट में हर दिन मोछ की कामना को लेकर लोग पहुचते है। यह ऐसा घाट है जंहा 24 घंटे चिताएं जलती है। यह दुनिया के उन चुनिंदा श्मशान घाटों में शामिल है, जहां दिन-रात, हर वक्त 365 दिन आग धधकती रहती है और चिताएं जलती रहती हैं।

मणिकर्णिका घाट की नही बुझती आग?

मणिकर्णिका घाट से जुड़ी पौराणिक कथाएं इसे और भी रहस्यमयी बनाती हैं। एक मान्यता के अनुसार, देवी पार्वती का कान का कुंडल (मणि-कर्णिका) इसी स्थान पर गिर गया था। भगवान शिव और पार्वती ने काफी देर तक इसे खोजा, लेकिन जब कुंडल नहीं मिला तो देवी पार्वती ने इस स्थान को श्राप दे दिया कि यहां की आग कभी नहीं बुझेगी। तभी से यह घाट 24 घंटे, 365 दिन जलता रहता है।

जन्म-मरण से मिलती है मुक्ति

मान्यता है कि जो व्यक्ति यहां अंतिम सांस लेता है या जिसका अंतिम संस्कार इस घाट पर होता है, उसे जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है। यही कारण है कि मणिकर्णिका घाट को ‘मोक्ष का द्वार’ भी कहा जाता है। यह दुनिया के उन चुनिंदा श्मशान घाटों में शामिल है, जहां दिन-रात, हर वक्त चिताएं जलती रहती हैं। यहाँ अंतिम संस्कार से जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिलती है।

नामकरण का रहस्य

एक कथा के अनुसार, शिव-पार्वती के एकांत में माता पार्वती का कर्णफूल (कान की बाली) इस कुंड में गिर गया था, और शिवजी उसे ढूंढ नहीं पाए, जिससे इसका नाम मणिकर्णिका पड़ा। एक अन्य कथा में, विष्णु भगवान शिव की तपस्या कर रहे थे, और तपस्या के दौरान उनके कान की मणि (मणिकर्णिका) इस कुंड में गिर गई थी।

अग्नि की निरंतरता

कहा जाता है कि माता पार्वती के श्राप के कारण इस घाट पर चिता की अग्नि कभी बुझती नहीं है, जो जीवन-मृत्यु के चक्र का प्रतीक है।

मोक्ष और तारक मंत्र

मान्यता है कि मणिकर्णिका घाट पर दाह संस्कार होने वाले व्यक्ति को जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति (मोक्ष) मिलती है, क्योंकि शिवजी स्वयं यहाँ तारक मंत्र का उपदेश देते हैं। मन्यता है कि माता सती के देह का अग्नि संस्कार इसी घाट पर हुआ था, इसलिए इसे महाश्मशान भी कहते हैं और यह शक्तिपीठ भी है।

मसान होली

होली के दिन यहाँ चिता की राख से श्मसान होली खेली जाती है, जो मृत्यु पर विजय का प्रतीक है और महादेव को समर्पित है।
मणिकर्णिका घाट वाराणसी में मृत्यु को जीवन के अंत के रूप में नहीं, बल्कि मोक्ष के द्वार के रूप में देखता है, जहाँ जीवन और मृत्यु का चक्र निरंतर चलता रहता है।

यहां बिक गए थें राजा हरिश्चंद्र

प्राचीन कथाओं में राजा हरिश्चंद्र को इसी घाट पर चांडाल (श्मशान का स्वामी) द्वारा खरीदा गया था, और वे यहाँ श्मशान की चिताओं से कर वसूलते थे।

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