Indian film mother roles Model Mother-Leela Mishra : 18 साल में”मां”बनीं,जिसने नैतिक साहस से सिनेमा में रचा इतिहास-हिंदी सिनेमा में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिन्हें देखकर दर्शकों को अभिनय नहीं, अपनापन महसूस होता है। ऐसा ही एक नाम है – लीला मिश्रा। ‘शोले’ की मौसी जी के रूप में भले ही वे जनमानस में अमर हुईं, लेकिन उनका जीवन और फिल्मी सफर केवल हास्य या सहायक भूमिकाओं तक सीमित नहीं था। यह कहानी है नैतिक दृढ़ता, स्त्री स्वाभिमान और उस दौर के सिनेमा की, जब एक अभिनेत्री ने समझौतों से इनकार कर अपनी पहचान खुद गढ़ी। अवध की रियासत जायस में जन्मी अभिनेत्री लीला मिश्रा का जीवन संघर्ष, नैतिकता और सिनेमा के इतिहास में चरित्र भूमिकाओं की प्रतिष्ठा की प्रेरक कहानी है। ‘शोले’ की मौसी से लेकर ‘नानी माँ’ तक उनका सफर जानिए।
जन्म और परिवार और प्रारंभिक जीवन
लीला मिश्रा का जन्म 1 जनवरी 1908 को अवध की मशहूर रियासत जायस में हुआ, जो आज ज़िला अमेठी, उत्तर प्रदेश में स्थित है। महज 12 वर्ष की उम्र में उनका विवाह राम प्रसाद मिश्र से हो गया। 17 वर्ष की होते-होते वे दो बेटियों की मां बन चुकी थीं। उनका ससुराल अंतू, प्रतापगढ़ के कमलदीपुर में था और बाद में वे बनारस में रहने लगीं।
सिनेमा में प्रवेश-अभिनेत्रियों की कमी और संयोग
लीला मिश्रा का फिल्मों में प्रवेश किसी फिल्मी प्रेमकथा जैसा नहीं, बल्कि परिस्थितियों की उपज था। दादासाहेब फाल्के की नासिक सिनेटोन से जुड़े मामा शिंदे ने उनके पति को राज़ी किया कि लीला फिल्मों में काम करें। उस समय फिल्मों में अभिनेत्रियों की भारी कमी थी। इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शूटिंग के दौरान जहां उनके पति को 150 रुपये महीना, वहीं लीला मिश्रा को 500 रुपये मिलते थे। हालांकि कैमरे के सामने दोनों सहज नहीं हो पाए और अनुबंध जल्द ही समाप्त हो गया।
नैतिकता बनाम सिनेमा जिसके चलते दो बार निकाली गईं लेकिन नहीं डिगा जीवन जीने का सिद्धांत
लीला मिश्रा को दो बार फिल्मों से सिर्फ़ इस वजह से निकाल दिया गया क्योंकि उन्होंने हीरो को गले लगाने से इनकार कर दिया। क्योंकि उनका स्पष्ट कहना था की. …गले में बाहें तो बस अपने ख़सम यानि पति के ही डालेंगे, किसी दूसरे के नहीं…
इस तरह कभी भी उन्होंने अपने आदर्शों को किसी लालसा में आकर डिगने नहीं दिया बल्कि एक नहीं बल्कि दो बार- फिल्म “भिखारिन” और बाद में “होनहार” में भी यही स्थिति बनी।
18 साल में “मां” का किरदार और इतिहास
फिल्म “होनहार” में लीला मिश्रा को साहू मोडक के साथ नायिका के रूप में लिया गया था। पटकथा में आलिंगन का दृश्य था, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया लेकिन कंपनी कानूनी कारणों से उन्हें निकाल नहीं पाई, इसलिए उन्हें हीरो की मां-जो उनसे तक़रीबन दोगुनी उम्र का था उसकी माता का किरदार दे दिया गया जो उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर उसी शिद्दत से अपना किरदार निभाया-परिणामतः यहीं से इतिहास बदल गया और विशेष यह की सिर्फ़ 18 साल की उम्र में लीला मिश्रा “मां” के रोल में सिनेमा इंसरसति में हमेशा के लिए स्थापित हो गईं।
फिल्मी सफर और यादगार भूमिकाएं
पांच दशकों के करियर में लीला मिश्रा ने 200 से अधिक हिंदी फिल्मों में काम किया जिसमें उनकी प्रमुख फिल्मों में
अनमोल घड़ी-(1946),आवारा-(1951),लाजवंती-(1958),कान फिल्म फेस्टिवल में नामांकित,गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो (1962)-पहली भोजपुरी फिल्म में काम किया जो सुपर डुपर हिट रहा। शोले-(1975),मौसी जी,गीत गाता चल,नदिया के पार, अबोध,अमर प्रेम, बातों बातों में उनके किरदार-मां,मौसी,बुआ,चाची या खलनायिका,हर रूप में भरोसेमंद लगे।
फ़िल्म “नानी मां” बनी ,करियर की ऊंचाई
1981 में आई फिल्म “नानी मां” उनके करियर का शिखर मानी जाती है। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला, जो चरित्र भूमिकाओं के लिए दुर्लभ सम्मान था।
अंतिम वर्षों का योगदान और व्यक्तित्व
सई परांजपे की फिल्म “चश्मे बद्दूर”-(1981) में उनका काम विशेष रूप से सराहा गया। सई परांजपे के शब्दों में वो बात कहि जाए जो उन्होंने कही तो वो यानि लीला मिश्रा – “प्रोफेशनलिज़्म की मिसाल थीं। पढ़ी-लिखी नहीं थीं, पर सिनेमा की हर बारीकी को न सिर्फ समझती थीं बल्कि उस समझ के साथ काम करती थीं।”
विशेष – निधन-लीला मिश्रा का निधन 17 जनवरी 1988 को मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ।
निष्कर्ष-लीला मिश्रा सिर्फ़ “शोले’ की मौसी नहीं थीं, वे उस दौर की अभिनेत्री थीं जिन्होंने समझौते नहीं, सिद्धांत चुने। जहां सिनेमा उनसे कुछ और चाहता था, वहां उन्होंने अपनी शर्तों पर काम किया और वही उनकी सबसे बड़ी जीत बनी। तब से लेकर आज तक जब पर्दे पर कोई सख़्त-सी मगर अपनापन लिए बुज़ुर्ग महिला दिखती है, तो कहीं न कहीं लीला मिश्रा की परछाईं नज़र आती है।

