भारतीय न्यायपालिका पर बोझ इतना बढ़ गया है कि सुप्रीम कोर्ट से लेकर निचली अदालतों तक 5 करोड़ 49 लाख से ज्यादा मामले लंबित पड़े हैं। (India Court Backlog Crisis) ये आंकड़े 8 दिसंबर 2025 तक के हैं, जो NJDG (National Judicial Data Grid) से लिए गए हैं। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने इसे सबसे बड़ी चुनौती बताया है। (CJI Sanjiv Khanna Successor Challenge) कई पीढ़ियां गुजर जाती हैं, लेकिन केस निपटते नहीं। आइए जानते हैं इस बैकलॉग की पूरी डिटेल
निचली अदालतों पर सबसे ज्यादा दबाव
कुल 5 करोड़ 49 लाख से ज्यादा केसों में से ज्यादातर निचली अदालतों में अटके हैं। (Supreme Court Pending Cases)
- सुप्रीम कोर्ट: 90,897 मामले। ये संख्या हाल ही में 90 हजार को पार कर चुकी है।
- 25 हाई कोर्ट: 63 लाख 63 हजार 406 मामले। हाई कोर्ट में औसतन 3 साल 1 महीने लगते हैं निपटाने में।
- निचली अदालतें (ट्रायल कोर्ट): 4 करोड़ 84 लाख 57 हजार 343 मामले। यहां औसत समय 6 साल है। (High Court Case Disposal Time)
ये आंकड़े दिखाते हैं कि ज्यादातर विवाद जिला स्तर पर ही अटक जाते हैं, जहां संसाधनों की कमी सबसे ज्यादा है।
साल दर साल बढ़ता बोझ, 2016 से ही अलार्मलंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। (Historical Court Pendency India) 2016 में स्टडी दक्ष की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में केस निपटाने में औसतन 13 साल लग सकते हैं। तब से स्थिति और बिगड़ी है। CJI सूर्यकांत ने कहा, “देश में 5 करोड़ से ज्यादा लंबित केस न्यायपालिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं।” (CJI Suryakant Statement) कई बार तो लोगों की उम्र खत्म हो जाती है, मुकदमा नहीं। ये ट्रेंड 1980s से चला आ रहा, जब लॉ कमीशन ने चेतावनी दी थी।
जजों की कमी से वकीलों की तलाश तकइस पहाड़ के पीछे कई वजहें हैं। (Reasons for Judicial Backlog India)
- जजों की भारी कमी: 1987 में लॉ कमीशन ने सिफारिश की थी कि हर 10 लाख आबादी पर 50 जज होने चाहिए। लेकिन दिसंबर 2024 तक केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि अभी सिर्फ 21 जज प्रति 10 लाख आबादी हैं। (Judge Vacancy Per Million India)
- वकीलों की अनुपलब्धता: जिला अदालतों में 61 लाख 66 हजार से ज्यादा मामले इसलिए लंबित हैं क्योंकि इनके लिए वकील ही नहीं मिल रहे। NJDG डेटा के मुताबिक, ये सबसे बड़ा कारण है।
- अन्य फैक्टर: मामलों की जटिलता, सबूतों की प्रकृति, वकीलों-जांच एजेंसियों-गवाहों का सहयोग न मिलना, और अदालतों में पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर व स्टाफ की कमी। CJI ने कहा, “मैं इस बात में नहीं जा रहा कि यह कैसे हुआ, कौन जिम्मेदार है। हो सकता है लिस्टिंग बढ़ गई हो।”
सरकार और न्यायपालिका की पहलें: मीडिएशन को ‘गेम चेंजर’
CJI सूर्यकांत ने अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट की हैं।
- बैकलॉग निपटान: सुप्रीम कोर्ट में लंबित केसों को कम करना पहली चुनौती। उन्होंने कहा, “मेरी पहली और सबसे बड़ी चुनौती ये लंबित केस हैं।”
- मीडिएशन को बढ़ावा: विवाद सुलझाने का आसान तरीका, जो गेम चेंजर साबित हो सकता है। इससे कोर्ट का बोझ कम होगा।
- रिपोर्टिंग सिस्टम: हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट से पेंडेंसी की डिटेल रिपोर्ट मंगवाई जाएगी, खासकर उन केसों की जिन पर टॉप कोर्ट की कॉन्स्टिट्यूशन बेंच फैसला सुना रही।
- उदाहरण सफलता: दिल्ली के लैंड एक्विजिशन विवाद से जुड़े 1,200 मामले एक ही फैसले से निपट गए। (Land Acquisition Case Resolution Delhi)
‘न्याय मिलना ही काफी नहीं, समय पर मिलना चाहिए’
CJI सूर्यकांत ने जोर दिया कि न्याय में देरी न्याय का हनन है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटलीकरण (e-Courts) और वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) से ही राहत मिलेगी। लेकिन बिना जजों की संख्या बढ़ाए ये सपना अधूरा है। रिपोर्ट में कहा गया कि अगर यही रफ्तार रही, तो बैकलॉग 6 करोड़ को पार कर जाएगा। (F
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