Death Anniversary Of Lyricist Indeevar: हमारे दिल के जज्बातों को ज़ुबाँ देते हैं हमारी ही बोली में , इन लफ्जों में घुल जाता है हर एहसास गीतों की रंगोली में। हम बात कर रहे हैं श्यामलाल बाबू राय की जिन्हें हम , इंदीवर के नाम से जानते हैं वो 1960 के दशक के प्रमुख हिंदी फिल्म गीतकारों में से एक थे।
इंदीवर उत्तर प्रदेश के झाँसी ज़िले के बरुआ सागर में 1 जनवरी 1924 को पैदा हुए थे वो जैसे-जैसे बड़े हुए लफ़्ज़ों से खेलने लगे,जो भी अल्फाज़ उनकी कलम से निकलते नायाब कलाम बन जाते यूं लगता बस तरन्नुम में बयाँ होने की देर है ,अपने इस हुनर को वो जल्दी ही पहचान गए और नग़मा निगार बनने की चाह में श्यामलाल बाबू “आज़ाद ” के नाम से ही बतौर गीतकार शुरुआत करते हुए उन्होंनें आज़ादी के संघर्ष के दौरान देशभक्ति गीत लिखे थे लेकिन जब फिल्मों में आए तो अपना नाम “इंदीवर” रखा जिसका मतलब होता है “नील कमल ” जो कि एक रेयर फूल माना जाता है और सुन्दर आँखों के लिए इसकी उपमा दी जाती है। इंदीवर बहोत छोटे थे तब ही उनके माता -पिता गुज़र गए थे जिससे उन्हें ग़म और तन्हाई ने घेर लिया और उनकी क़लम से निकले लफ़्ज़ों ने बेशक़ीमती नग़मों की शक्ल इख़्तेयार कर ली।
इस वक़्त कुछ सूफी संत भी उन्हें मिले जिनका भी असर उन पर ऐसा हुआ कि बड़ी बहन को फ़िक्र होने लगी कि इंदीवर बैरागी न बन जाएं तो उन्होनें उनकी ज़बरदस्ती शादी करा दी पर ये उपाय भी कारगर साबित नहीं हुआ और वो काम की तलाश में फिर मुंबई चले गए। दो साल वहीं की गलियों में भटकने के बाद क़रीब बाइस साल की उम्र में उन्हें फ़िल्म “डबल फेस’ मिली जिसमें उन्होंने पहली बार फिल्मों में गीत लिखे मगर बदक़िस्मती से फ़िल्म नहीं चली और गीतों ने भी किसी का ध्यान नहीं खींचा फिर भी उन्होंनें हार नहीं मानी इसके बाद कुछ और B/C ग्रेड की फिल्मों में गीत लिखने के बाद ही अपने गाँव लौटे और अपनी पत्नी के पास पहुँचे जो मानो वनवास काट रही थीं उनकी ये तपस्या देखकर इंदीवर का दिल पिघल गया और धीरे -धीरे दोनों ऐसे एक हुए कि अब इंदीवर की पत्नी ने उनका सपना पूरा करने के लिए उन्हें खुद मुंबई जाने को कह दिया।
इंदीवर: जिनके गीत हमें जिंदगी जीना सिखाते हैं
इस बार आखिरकार उन्हें 1951 में फिल्म ‘मल्हार’ से पहचान मिल गई , जिसमें उन्होंने “बड़े अरमानों से रक्खा है बलम तेरी क़सम” गीत लिखा, जिसे रोशन ने संगीत दिया था। उन्होंने अपने चार दशकों से अधिक लंबे करियर में 300 से अधिक फिल्मों में एक हज़ार से ज़्यादा गाने लिखे। इंदीवर ने मशहूर पॉप जोड़ी नाज़िया हसन और ज़ोहैब हसन के लिए भी गाने लिखे । नाज़िया हसन के मशहूर गीतों ,” आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आए तो बात बन जाए “, “बूम बूम”, “मेहरबानी”, और “दिल की लगी ।से वो काफी मक़बूल ओ मारूफ हो गए।
वो कहते थे की मेरे गीतों में मिली जुली भाषा होती है क्योंकि ये ज़्यादा लोगों को समझ में आती है और यही हमारी फिल्मों में भी सुनने मिलती है जिसमें न ख़ालिस उर्दू होती है न हिंदी पर कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो या तो सिर्फ उर्दू में अच्छे लगते हैं या फिर हिंदी में। जिन्हें हम आसानी से बोल और समझ सकते हैं जैसे , गीत ,’छोड़ दे सारी दुनिया किसी के लिए ये मुनासिब नहीं आदमी के लिए….’, इसमें मुनासिब शब्द उर्दू हैं पर हमारी आमबोलचाल की भाषा में शामिल है ,कई भाषाओं के ज्ञाता इंदीवर ने कभी कभी ख़ालिस हिंदी में भी गीत लिखे जिनमें ‘चंदन सा बदन चंचल चितवन….’, को हम याद कर सकते हैं।
उनके गंभीर दिल में उतर जाने वाले गीतों ने कई दिलों को ढाढस बंधाया ,तो कई दिलों ने प्यार की दुनिया में पहला क़दम भी रखा, ‘तेरा आंचल है तो पतवार भी दरकार नहीं …’ जैसे अल्फाजों ने जिंदगी का नया नज़रिया नया फलसफा पेश किया हमारे बीच , तो वहीं भाई बहन के दिल के जज़्बात भी बयाँ किए ,’मेरी प्यारी बहनियाँ बनेगी दुलहनियाँ…’ और ‘बहना ने भाई की कलाई पर. ..’ जैसे गीत लिख कर जो आज भी पुर असर और अनमोल हैं।
Indeevar: Whose songs teach us how to live life
कहीं दुआ है तो कहीं प्रेम का अथाह सागर जिसमें कोई सज़ा नही है जैसे -‘रौशन तुम्ही से दुनिया रौनक तुम्ही जहाँ की. …’ ,या ‘कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे. …’ , इन गीतों को सुनके यूं लगता है कि उनके शब्दों को आत्मसात करके हम भी महान बन सकते हैं या इतनी सलाहियत अपने अंदर पैदा कर सकते हैं कि हम भी किसी से कुछ सीख सकें , किसी की खुशी के लिए खुद को थोड़ा बदल सकते हैं।
हर नग़्मा बेशकीमती नगीनें सा मालूम होता है जो परत दर परत जिंदगी के नए राज़ खोलता जाता है। शब्दों के इसी बेशकीमती इंतेखाब और ताने बाने के लिए फिल्म अमानुष के गीत ‘दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा बर्बादी की तरफ ऐसा मोड़ा…’ लिखने के लिए उन्होंने फिल्म फेयर में सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार जीता था।
उनके कुछ और दिलकश नग़्मों को हम याद करें तो ये फेहरिस्त थोड़ी लम्बी हो जायेगी, फिर भी ज़रा मुखड़ों को गुनगुना लीजिए- ‘ये बंधन तो प्यार का बंधन है. ..’, ‘तुम से बढकर दुनिया में. ..’, ‘नीले नीले अम्बर पर. ….’, ‘पास बैठो तबियत बहल जायेगी…’, ‘हमने तुझको प्यार किया है जितना…’, ‘वक़्त करता जो वफ़ा …’, ‘कसमे वादे प्यार वफ़ा …’, ‘फूल तुम्हें भेजा है ख़त में. …’,’ताल मिले नदी के जल में. ..’, ‘है प्रीत जहाँ की रीत सदा. …’, ‘यूं ही तुम मुझसे बात करती हो. ..’, ‘ज़िंदगी का सफर. ….’, ‘जीवन से भरी तेरी आँखें…’, ‘हम थे जिनके सहारे…’, ‘नदिया चले चले रे धारा…’, ‘जो तुम को हो पसंद…..’, , , ‘रूप तेरा ऐसा दर्पण में ना. …’, ‘समझौता ग़मो से कर लो. …’, ‘तेरे चेहरे में वो जादू है. ..’, ‘मधुबन खुशबू देता है. ..’,’ हम तुम्हें चाहते हैं ऐसे. …’, ‘होठों से छू लो तुम. …’, ‘दुश्मन न करे दोस्त ने. ..’, और ‘जब कोई बात बिगाड़ जाए. ..’ जैसे दिलकश नग़्में ये वो खज़ाना है जो उनके चाहने वालों के दिलों में हमेशा उनकी याद बनके रहेगा और हमारे दिलों से यही सदा आएगी कि काश, ये दिलनशीं कारवाँ न गुज़रता तो अच्छा होता ,वो आज भी दिखाते हमें कलम की जादूगरी तो अच्छा होता पर 27 फरवरी 1997 को वो इस फानी दुनिया को अलविदा कह गए और पीछे छोड़ गए अपने नायाब नक्श ए क़दम।इस साल उन्होंने ‘कोयला’ फिल्म के दिलकश गीत कलमबद्ध किये थे।
मेरे हमसफर ,मेरे हमसफ़र…..गीत की कहानी :-
इंदीवर की क़लम इतनी पुरअसर थी कि उनके लिखे गीत दशकों बाद भी संगीत प्रेमियों के मन पर गहरा असर छोड़ रहे हैं और इन्हीं में से एक गीत है ‘मेरे हमसफर’ फिल्म का टाइटल सॉन्ग , “किसी राह में, किसी मोड़ पर मुझे चल न देना तू छोड़कर मेरे हमसफर ,मेरे हमसफ़र…..” जो आज यानी अपने रिलीज़ के 55 साल बाद भी हमारे दिलों में सदाबहार बनके बसा हुआ है। फिल्म ‘मेरे हमसफर’ 13 नवंबर 1970 को रुपहले पर्दे पर जगमगाई और ये गीत न केवल इसका शीर्षक गीत बना बल्कि इतनी खूबसूरती से इस फिल्म की कहानी और सिचुएशन को बयाँ करने का ज़िम्मा उठाया कि फिल्म की जान बन गया।
फिल्म की स्थिति के हिसाब से इतने सुन्दर और सटीक बोलों का इंदीवर के मन में आना उनके लिए भी किसी आश्चर्य जैसा था क्योंकि एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि इस गाने के बोल रिमझिम बारिश को देखते हुए रात क़रीब बारह बजे उनके मन में आए अचानक आए और महज़ 20 मिनट में उन्होंने ये गाना तैयार कर लिया।
कहा जाता है कि शूटिंग के समय जब जितेन्द्र और शर्मिला टैगोर पर ये गीत फिल्माया गया, तो पूरे सेट में सन्नाटा छा गया और सब लोग मंत्रमुग्ध होकर सुनने लगा और फिल्म के रिलीज़ होने के बाद तो इस गाने की पॉपुलेरिटी पूछिए मत लोग दीवाने हो गए,रेडियो सिलोन और विविध भारती पर महीनों तक ये गाना रोज़ बजता रहा।
कौन सा था पसंदीदा शब्द :-
हर लेखक और गीतकार के कुछ पसंदीदा शब्द होते हैं जो जाने अनजाने उनकी रचना का हिस्सा बन जाते हैं और इसी तरह इंदीवर का पसंदीदा शब्द था – “क्या” जिसे उन्होंने मुख़्तलिफ़ अंदाज़ में अपने गीतों में उतारा जैसे – ‘कसमें वादे प्यार वफ़ा सब बातें हैं बातों का क्या…,’ ‘एक तू न मिला सारी दुनिया मिले भी तो क्या है. ..’, ‘क्या देखते हो सूरत तुम्हारी … ‘,’क्या ख़ूब लगती हो बड़ी सुन्दर दिखती हो. .., ‘तू मिले दिल खिले और जीने को क्या चाहिए…’।
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